Sunday, 2 December 2012

Waqt Main Or Tum

इक लम्हा वक़्त का पैमाना है ...
लम्हा-लम्हा होता दिल दीवाना है...
वक़्त तेरा रुका-रुका थमा-थमा...
उसको जमाने से तेज चलना है...


तुझे रखे कोई भरे बाज़ार...
मेरे जीते कब हो पाना है...
कोई लगा के तो देखे बोली,
चल जाएँगी गोली...
जान पे खेल जाना है...


वो जो था शिकवे शिकायत का दौर,
बीत गया...
अब उसको भूल जाना है...
महकेंगे फूल गुलशन-गुलशन...
वीरानियाँ भी झूमे-गाएँगी...
बस नया जहाँ बसाना है...


अब ओर क्या कहूँ यार के बस...
इतना ही समझाना है...
चाहे कीमत हो कुछ भी,
ये सपना खरीद के लाना है...
तू सिर्फ़ तेरा नही,
तुझको ये अहसास कराना है...
छाया घोर अंधेरा नही,
ये सूरज से कहलवाना है...
ओर मुझपे बस मेरा नही,
अब हो जाए आर-पार के बस...


अब चल निकला है जाट सूरमा,
क्या कहूँ क्या होगा रण का हाल के बस...
तू बस देख,
मैं दिखाता चलूं...
दुश्मन के सिर गिनाता चलूं,
तू मेरी जंग लगी तलवार को लगा ज़रा सी धार के बस...


अनिल के प्रवाह को रोकेगा कौन....
कौन मोडेगा समय की गति को...
की वो कृष्णा भी बीत गया,
जिसने थाम दिया था समय चक्र...
अब अमर-समर मैं,
प्रश्न नही रहा मात्र हार-जीत...
अब समय वो की बदला जाएगा अतीत....
प्रश्ना गरिमा का...
सुन सखी,
अब ओर कहूँ क्या यार के बस...
यही निकला अनायास के बस...
ना टूटे कोई विश्वास के बस...
बस इतना जान के बस,
नही तू बेबस...
तेरे साथ तेरा कल है...
भविष्यत ये अटल है...
महल नही खंडहर सही,
आत्मिक प्राबलय ही एक उपचार है बस...
जीवन को दे आधार के बस...
समझ थोड़े मैं ज़्यादा,
मीरा को राधा,
आधे को पूरा,
पुरे मैं आधा,
मैं करता रहता यही विचार के बस...

                                  अनिल आर्य