Sunday, 22 February 2026

मोनिका

साली साहिबा मोनिका,
हँसी की चलती फ़ैक्टरी,
जहाँ खड़ी हो जाएँ आप,
शुरू हो जाए कॉमेडी की कैटेगरी।

आपकी मुस्कान में शरारत,
बातों में मीठा तीर,
ऊपर से भोली सूरत,
अंदर से पूरी वीर।

काम में ऐसी तत्पर,
मानो बिजली की रफ़्तार,
रसोई हो या ज़िम्मेदारी,
सब पर मोनिका का अधिकार।

पर भाई साहब को छेड़ने में,
आपका अलग ही है विभाग,
कभी कहें – “गंभीर बहुत हैं”,
कभी करें परिहास।

और फेशनेबल भी हैं पूरी,
कभी जूडा, कभी पिन लगाती हैं बाल में,
और इनसे बचके रहना भाई साहब,
झाड़ा लगवाने भी जाएँ-तो चाकू रखती हैं शॉल में।

घर की रौनक आपसे,
हँसी का चलता व्यापार,
रजनी भी मुस्काए चुपके,
देखे अपने जीजा की हार।

पर सच यह भी है मोनिका जी,
दिल आपका है खरा सोना,
सभी अपनों के लिए जीती हैं,
नहीं यह किसी और से होना।

जन्मदिन पर शुभकामनाएँ,
सपनों को मिले उड़ान,
हँसी आपकी यूँ ही गूँजे,
और बढ़े आपका मान-सम्मान।

और हाँ, एक बात आख़िरी,
भाई साहब को ज़्यादा न सताइएगा,
वरना अगली बार कविता नहीं,
पूरी कहानी लिखवाईयेगा।

जन्मदिन मुबारक हो साली साहिबा!

सप्रेम : अनिल आर्य...

Saturday, 14 February 2026

शिवरात्रि

शिव:रात्रि, नहीं जागरण

यह रात्रि नहीं, है जागरण,
चेतना का गहन विस्तार है।
जहाँ दृश्य और अदृश्य के बीच
भेद का अंतिम द्वार है।

न जटा, न गंग, न नीलकंठ,
न आकार, न कोई अलंकार।
जो है, वही शिव का स्पंदन,
जो नहीं, वही उनका विस्तार।

जब “मैं” पिघलता है मौन में,
और “तू” भी ध्वनि से उतर जाता,
द्रष्टा–दृश्य का खेल सिमटकर
एक ही बिंदु में ठहर जाता।

न पूजक, न पूजा शेष,
न अर्पण, न स्वीकार,
जहाँ अनुभव भी छूट जाए,
वहीं प्रकटे शिव निर्विकार।

शिवरात्रि की यह गहन घड़ी,
निद्रा नहीं, जागरण है,
अहंकार की अंतिम राख से,
उदित आत्मा का दर्पण है।

जो शून्य में पूर्ण देख ले,
जो पूर्ण में शून्य उतार दे,
जो स्वयं को स्वयं में खो दे,
वही शिव को अंतर में आकार दे।

न निर्गुण अलग, न सगुण पृथक,
न साधक कोई, न साध्य हो,
एक ही चेतन लहर अनंत,
वही शिव, वही अद्वैत आराध्य हो।

वायु-सा छू ले हर उर-तार,
पर रहे स्वयं से भी पार,
जहाँ हर श्वास बने शिव का स्वर,
हम वहीं पाए शिव का विस्तार।

अनिल समीर-सा बहता रहे,
शिव-नाम सुवास में कहता रहे,
लेखक भी, साधक भी बनकर,
अंतर का आकाश गहता रहे।

अनिल आर्य...



Tuesday, 10 February 2026

रजनी

“रजनी”
रजनी…
तू मुस्कुराती है तो
शब्द शर्म से झुक जाते हैं,
हुस्न को भी डर लगता है
कि कहीं तुझसे हार न जाए।
तेरे चेहरे पर
सादगी का ऐसा नूर है
कि आईना भी रोज़
खुद को ठीक करने लगता है।
तेरी आँखें—
जैसे बिना बोले ही
मेरी सारी थकान पूछ लेती हों,
और पलक झपकते ही
मेरी दुनिया समेट लेती हों।
तेरा स्वभाव…
हाय, वही तो मेरी सबसे बड़ी दौलत है,
जहाँ प्यार शोर नहीं करता,
बस चुपचाप
मेरे हर ग़लत दिन को
सही बना देता है।
और जब तू नाचती है रजनी…
तो ज़मीन ताल नहीं देती,
वक़्त थम जाता है,
मैं भूल जाता हूँ
कि दुनिया देखनी भी थी—
क्योंकि उस पल
सिर्फ़ तू ही काफ़ी होती है।
तेरी हर अदा
बिना सिखाए क़ायदा बन जाती है,
तेरी हर हँसी
मेरे नाम की दस्तख़त लगाती है।
मैं अनिल…
तेरा होना ही
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है,
और तेरा प्यार—
मेरी ज़िंदगी की
सबसे ख़ूबसूरत आदत।
अगर मोहब्बत का
कोई पता होता,
तो उस घर का नाम
“रजनी” ही होता…
और दरवाज़े पर लिखा होता—
यहाँ अनिल बसता है। 💞

अनीता -शक्ति

अनीता–शक्ति : प्रेम का छन्द

अनीता दीप, शक्ति बाती,
इन दोनों से उजियारा है।
साथ जले जीवन का दीपक
जैसे सचमुच का कोई तारा है॥

हँसते-रोते, चलते-चलते,
बरसों का ये मान हुआ।
हर कठिनाई आकर चली गई,
इनको और महान किया॥

आँगन में जब रुद्रा आया,
खिल उठी हर एक दिशा।
माँ की ममता, पिता का साहस,
बन गई उसकी परिभाषा॥

रुद्रा हँसा तो घर मुस्काया,
मौन भी उत्सव बन जाता।
इस छोटे से नन्हे स्वर में,
भविष्य गीत सुनाता॥

साल नहीं, संस्कार गिनते,
बंधन को वरदान कहें।
अनीता-शक्ति साथ रहें यूँ,
युग-युग तक पहचान रहें॥

वैवाहिक वर्षगाँठ की
हृदय से शुभकामनाएँ 
रुद्रा संग जीवन
सदा प्रेम से भरता जाए...

अनिल आर्य...

Monday, 9 February 2026

फेयरवेल

प्रिय बच्चों,
आज तुम्हारी फेयरवेल है,
और हमारी भी...

क्योंकि अब कॉपी जाँचने के बहाने
तुम्हारी लिखावट पर डांटने का मौका नहीं मिलेगा 😄
आजसे ना होमवर्क का डर,
ना सर की डाँट…
(और ना ही “कॉपी निकालो आज टेस्ट है ” की आवाज़ 😜)
फिर भी तुम्हे पढना है,
जिम्मेदारी लेनी है।

12वीं तक आते-आते
तुम सबने एक बात अच्छे से सीख ली है—
“सर, ये चैप्टर तो बहुत आसान है”
(और अगले दिन वही सबसे मुश्किल निकलता है)

किसी ने हिन्दी से दोस्ती निभाई,
किसी ने इंग्लिश से दूरी बनाए रखी,
और कुछ बच्चे ऐसे भी थे
जो पूरे साल यही सोचते रहे—
“ये बोर्ड में आएगा या नहीं?”

मोबाइल तुम सबका सबसे सच्चा मित्र रहा,
जो क्लास में भी साथ था,
और घर पर पढ़ाई के वक्त भी…
(हालाँकि पढ़ाई उससे कभी मिली नहीं 😜)

तुम सब छुप-छुप कर मोबाईल लाते रहे या जो भी कुछ करते रहे वो सब हमें पता होता था,

(तुम समझते हो छुपा लिया,
पर हमें सब पहले से पता है,
छात्र की चाल, आँख की भाषा-
ये किताब से पहले पढ़ा है।

सब सोचते हैं दाल में काला है,
हम हँस कर यही कहते हैं-
बेटा, यहाँ तो
पूरी दाल ही काली है! 😄

हमें सब पता है,
पहले से ही
तुम सोचते हो,
बात छुपा ली है...)

एग्ज़ाम में
पेपर देखकर माथा खुजाया,
फिर बगल वाले को देखा
और सोचा—
“इसको आता है तो मैं भी पक्का पास!” 😆
ऐसा मत करना, अपनी तैयारी रखना
ताकि रिजल्ट आने के बाद न हो 
उदासी का अहसास।, 😒

रिज़ल्ट के बाद
एक डायलॉग सबका सेम—
“सर, बस दो नंबर से रह गए…”
हाँ भई, वही दो नंबर
हर साल सबके रह जाते हैं 😜
पर अबकी बार मत रहने देना...

लेकिन मज़ाक अपनी जगह,
तुम सबने स्कूल को
हँसी भी दी,
शोर भी दिया,
और ऐसी यादें साझा की,
जो सिलेबस में नहीं मिलतीं।

अब आगे की दुनिया
नक़ल व बहाने से नहीं,
ख़ुद के दम से ही चलेगी,
और आगे सब जगह तुम नहीं
तुम्हारा काम बोलेगा।

जाओ, बड़े बनो,
नाम कमाओ,
पर कभी ज़िंदगी
तुम्हारा पेपर मुश्किल कर दे-
तो याद रखना,
स्कूल में एक अनिल आर्य सर थे,
जो हर मुश्किल सवाल से पहले
आसानी से हँसा देते थे,
और मुश्किलें आसान हो जाती थी...

ऑल द बेस्ट, मेरे शेरों! 🐯
जाओ अब जंगल तुम्हारा है, राज करो...
अनिल आर्य...

Saturday, 7 February 2026

जिम्मेदारी

जिम्मेदारियों की आग में

वो हँसे तो लगता है, जैसे समय थम गया कहीं,
मैं अपने वक़्त के पहियों में, धूल सा उड़ता जा रहा हूँ।

उसकी आंखों में सुकून, मेरे दिल में बेचैनी,
मैं ख्वाबों की चाहत में, कसकर बंधता जा रहा हूँ।

वो कहे—"थोड़ा रुक जाओ, कुछ पल मेरे लिए,"
मैं "आगे बढ़ना ही है" के जाल में फँसता जा रहा हूँ।

उसकी बातें जैसे फूल, मेरे शब्द जैसे कांटे,
मैं जिम्मेदारियों की आग में, खुद ही झुलसता जा रहा हूँ।

उसकी बाहों की गर्मी, मेरे हाथों की ठंडक,
मैं कर्तव्यों की मशीन में, खुद को पीसता जा रहा हूँ।

मोहब्बत और ज़िम्मेदारी के इस अजीब समीकरण में,
मैं हर पल खुद को ढालता और बदलता जा रहा हूँ।

और फिर भी, हर रात उसके ख्यालों में खोकर,
मैं अपने अंदर की नर्मी को, धीरे-धीरे तलाशता जा रहा हूँ।

वो पास रहकर दूर सही, मगर उसकी दूर तक की यादें पास हैं,
मैं अपनी चाहत और फर्ज़ के बीच, धीरे-धीरे सुलगता जा रहा हूँ।

अनिल आर्य...

मामा का परिवार

मामा मज़ाकिया, हंसाए दिन भर सारा,
बोलते ही घर में छूट जाए हँसी का फुहारा,
मामी हँस-हँस के फूल गईं,
खाट पे बैठी, खाट भी झूल गईं।

मामी के बीमारी भी भारी,
अर मामी सब पे भारी,
होरी इसी जणु मोटा महंत,
करे हाथी की सवारी।

मामा हँसते-हँसते रहते हिलते,
हँसते-हँसते सबते मिलते,
हिलने की अब आदत बणगी
अब तो चलते-चलते भी हिलते।

आर्यन कमेरा मामा जिसा, होग्या मोटे ते पतला
खाना भी कम कर दिया, पहले खाता था एक तसला।
अब लड़का जिम्मेदारी लेने को तैयार,
नौकरी लगते ही, काम बाँध दो,
बस जाए परिवार।

सेजल पसरी रहती दिन-भर, आराम की दूकान,
कुछ भी लेण चले जाओ, खत्म मिले समान।
सोफे से दोस्ती दिन में, 
देर सुबह तक तकिए पे सपनों का शौर,
उठाने की कहो तो कहती 
“अभी सोने दो 10 मिनट और।”

अब शादी करणी से इसकी भी,
माहरे नहीं से कोए आँट,
पहले बैठे ज्यांगे तयारी कर कै,
बैरा सै, सुसराड़िया फोड़ेंगे माहरी टाँट।

सभी यहाँ हँसते-मिलते, घंटों सब बातों में झूमते,
हमारा यह परिवार, हँसी का असली ठिकाना,
जहाँ हर मज़ाक में छुपा प्यार, 
और हर हँसी में अपनापन अपार,
भगवान से दुआ, ऐसे ही हँसता रहे हमारा यह परिवार।

अनिल आर्य...

पिता

पिता...

वह
जो थक कर घर आता है,
और पूछता है—
सब ठीक है न?
कभी नहीं बताता
कि उसके भीतर
क्या-क्या टूटा है।

वह
जो अपने सपनों को
चुपचाप
मेरे नाम लिख देता है,
और फिर
उन्हें याद तक नहीं करता-
ताकि मैं
कभी बोझिल न हो जाऊँ।

पिता धूप नहीं,
धूप में खड़ा
एक साया है—
जो खुद जलता है,
पर बच्चों तक
आँच नहीं पहुँचने देता।

मैं जब रोया,
वह रोया नहीं,
मैं जब हारा,
वह टूटा नहीं।
उसने अपने आँसू
मेरी नींव में
गाड़ दिए—
ताकि मेरी इमारत
कभी डगमगाए नहीं।

उनके हाथ
कठोर थे,
पर उन्हीं हाथों में
मेरी नींद 
सबसे सुरक्षित रही।

उन्होंने मुझे
गोद में कम उठाया,
ज़िम्मेदारियों में ज़्यादा सिखाया,
शायद इसलिए
मैं गिरा कम,
समझदार जल्दी हो गया।

आज जब मैं
खुद पिता हूँ,
तब समझ आता है—
वह क्यों
हर बात पर
खामोश रहते थे।

कुछ प्रेम
कहे नहीं जाते,
सिर्फ जिए जाते हैं।

और पिता
वही प्रेम है—
जो कभी पूरा समझ नहीं आता,
पिता वह बरगद है,
जो प्राण-वायु भी देता है,
छाँव भी,
और अपना पानी
और भोग्य भी स्वयं ही
लेता है,
पाताल की किसी गहराई से।

अगर ऊपर वाले से
कुछ माँग सकूँ,
तो बस इतना—
मेरे पिता को
अब वो आराम दे देना
जो उसने
न कभी चाहा
और न ही कभी माँगा…

अनिल आर्य...

खुद से कनेक्शन

मेरे भीतर
कुछ यूँ हलचल होती रहती है,
जैसे दुआ
ख़ुद को ढूँढ रही हो,
मुकाम ख़ुदको खोज रहा हो,
सब अंदर ही घट रहा है,
स्वयं-सफुर्त,
अपनी ही लय में,
जैसे मैं खुद को माध्यम पाता हूँ,
जोड़ने का,
अंतर को बाहर से,
सत्य को सुन्दर से,
मैं
सुनता हूँ,
आत्म के मौन को, 
जानता हूँ 
शून्य के विस्तार को,
झाँकता हूँ अंतर में,
बहुत उथल-पुथल में,
ढूंढता हूँ एक शांत जगह,
जहाँ कुछ तो है,
समझ के स्तर के ऊपर का,
जीवन के उस पार का,
लाइब्रेरी जैसा सा कुछ है,
जिसमें पढ़ने-समझने जैसा कुछ नहीं,
सिर्फ जुड़ना पड़ता है,
बहना पड़ता है,
बहाव के साथ।

मैं जुड़ता हूँ,
यह जुड़ाव बहुत मुश्किल है,
बहता हूँ,
यह बहाव बहुत छोटा होता है,
और अनायास होता है,
जहाँ कुछ प्रयास करता हूँ,
डूब जाता हूँ।

इसमें कनेक्शन मैं,
मैं बोलता कम हूँ,
सुनता ज्यादा,
प्रश्न नहीं पूछता
उत्तर सुनता हूँ,
उस जगह पर,
मैं, मैं नहीं रहता,

मैं शब्द उस विस्तार को
सीमित कर देता है,
तब,
मैं वो जगह बन जाता हूँ,
जहाँ आदमी
अपनी परतें उतार देता है।

मैं सिर्फ आईना नहीं बनता,
मैं साक्षात्कार बनता हूँ-
स्वयं से,
जो चेहरों से ज़्यादा
नीयतें पकड़ लेता है।

लोग मुझसे होकर गुज़रते हैं,
मुलाक़ात के लिए नहीं,
अपने बोझ को
हल्का करने के लिए।

मैं उधेड़ता हूँ,
परत दर परत,
और फिर बुनता हूँ,
एक - एक सलाई,
तोड़ता हूँ गढ़-मठ सांचे,
तराशता हूँ-
अंतर्मन की सच्चाई।

वो खुद से रिश्ता है मेरा,
बहुत करीब का,
बिना रस्म,
बिना किसी ऐलान के।

और ऊपर वाले से
बस इतनी सी दरख्वास्त,
की इस दुनिया में
हर किसी को देते हो जगह आप,
तो मेरे अंदर भी
मुझे थोड़ी सी वही
जगह दे देना…
जहाँ मिलें आप के साथ,
सुकून के दो पल,
व इतनी हिम्मत की हाथ
कितने भी जख़्मी हों,
मैं तराश दूँ हिमालय...

— अनिल आर्य

नींद

दिन में वो घर में उलझी रहती है,
बच्चों की कॉपी, रसोई, ज़िम्मेदारियाँ,
थकान को भी फुर्सत नहीं देती,
खुद को कहीं आख़िर में रखती है।

रात को जब सब सो जाते हैं,
उसका मोबाइल उसका सुकून बन जाता है,
बिना स्क्रीन के उसे नींद नहीं आती,
शायद पहली बार
वो सिर्फ़ अपनी होती है।

और मैं…
मैं समझता हूँ ये सब,
उसकी थकान, उसकी चुप्पी,
उसका खुद के लिए
थोड़ा-सा वक्त।

पर सच ये भी है—
मुझे उसके बिना
नींद नहीं आती।

मैं चाहता हूँ वो आराम करे,
पर मेरी गोद में,
स्क्रीन की रोशनी में नहीं,
मेरी साँसों की लय में।

मैं चाहता हूँ
वो दिन भर सबका ख्याल रखे,
पर रात को
थोड़ी देर
मेरा भी रखे।

मोबाइल उसकी आदत है,
मैं उसकी ज़रूरत बनना चाहता हूँ।

वो अगर फोन रखकर
बस इतना कह दे—
“आज बहुत थक गई हूँ,”
तो यक़ीन मानो
मेरी सारी शिकायत
नींद बनकर उतर जाएगी।

क्योंकि
उसे मोबाइल के साथ
नींद आती है,
और मुझे
उसके साथ।

अनिल आर्य...

हक़

मैं शरीफ़ हुआ तो क्या…?
वो अपना हक़ छोड़ दे…?
मेरी पत्नी को मुझ पर शक भी है,
और शक करना एक औरत का हक़ भी है।

कमी थोड़ी रही होगी कोई मेरी,
पर याद नहीं क्या…?
और थोड़ा शक किया तो,
गलती उसकी क्या…?

हाँ, दोबारा गलती,
नहीं तुम्हारे साथ करेंगे,
आज के बाद किसी और-
औरत से नहीं बात करेंगे।

क्योंकि शक़ से घर में CCTV आँखें लग जाती हैं,
जो चुप्पी भी रिकॉर्ड कर लेती हैं,
मोबाइल की स्क्रीन नहीं,
नज़रें पहले चेक कर लेती हैं।

हँसी ज़्यादा आई तो सवाल तैयार,
“किसकी याद में इतना प्यार?”
चुप रहे तो इल्ज़ाम पक्का,
“देखो… मन में कुछ है यार!”

देर से आए तो कहानी चाहिए,
जल्दी आए तो शक का दायरा,
सच बोलो तो ड्रामा बनता है,
झूठ बोलो तो सीधा ट्रायल एरिया।

मैं कहूँगा —थक गया हूँ आज ज़रा,
वो बोले—“थकान किससे?”
मैं कहूँगा -“काम बहुत था ऑफिस में,”
वो बोले-“नाम बताओ… किससे?”

हक़ उसका है—पूछे हर बात,
हक़ उसका है—तौले हर साँस,
पति हूँ, कोई फाइल नहीं,
फिर भी रोज़ होगी, जाँच-पड़ताल खास।

पर मानता हूँ—ये व्यंग्य भी अधूरा है,
क्योंकि सच थोड़ा और गहरा है,
जिस औरत को इतना शक है मुझ पर,
वो शायद मुझसे … बेहिसाब जुड़ी है।

सच कहूँ तो मैं लड़ सकता हूँ दुनिया से,
पर तुमसे नहीं—कभी नहीं,
क्योंकि मेरी हर जीत का मतलब,
तुम्हारी मुस्कान से है, किसी और से नहीं।

तुम मेरा गुस्सा भी सह लेती हो,
मेरी ख़ामोशी भी ओढ़ लेती हो,
मैं टूटूँ तो बिना कहे,
मेरे टुकड़े चुन लेती हो।

अगर कह दूँ आज सब छोड़ दूँ,
ये भीड़, ये शोहरत, ये नाम,
हर किसी फीमेल से काम,
तो यक़ीन मानो—एक पल में,
तुम्हारे कदमों में रख दूँ हर शाम।

क्योंकि पत्नी सिर्फ़ शक नहीं होती,
वो आदत, ज़रूरत, साँस होती है,
दुनिया छोड़ने की बात मज़ाक नहीं,
जिस दिन वो रूठे—सारी दुनिया ख़ामोश होती है।

अनिल आर्य...

शादी ने बताया अपना कौन...?

अपना कौन...?

शादी के दिनों की रातें लंबी होती हैं,
नींद आँखों से पहले रिश्तों में अटक जाती है,
जिसे “अपना” कहा गया था बरसों से,
वो आज सिर्फ़ एन्जॉय करने आया है।

और जो सिर्फ इन्जॉय करने आया है,
उसके पास ब्याह बिगाड़ने के सब नुस्खे हैं,
वो चाय पे हंगामा करता है,
वो बिस्किट का बहाना धरता है,
और उसके पास,
अपनी बीमारी का एक नुस्खा भी नहीं है,
काम के वक़्त अचानक
कमर दर्द, घुटने की चोट,
पुराना सिर दर्द जाग जाता है,
कमाल की बात ये है कि,
एन्जॉय के वक्त ये सब भाग जाता है।

जैसे ही झाड़ू उठे-
ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है,
और प्लेट दिखे तो
डॉक्टर भी छुट्टी पर चला जाता है।

हाथ में प्लेट,
मुँह में ज्ञान,
बीमारी ऐसी
जो सिर्फ़ काम देखकर याद आए।

काम?
हाँ काम सै याद आया,
वो तो परिवार का संस्कार है-
मेहमानों का नहीं,
और कहने का परिवार,
कब मेहमान बन जाता है,
पता ही नहीं लगता।

कोई हँसते हुए फोटो खिंचवाता है,
कोई हर बात पर नुक्ता निकालता है,
शिकायतों की फेहरिस्त लंबी है,
पर हाथ… हाथ खाली हैं।

जो कुछ नहीं करते,
वही सबसे ज़्यादा थकान गिनाते हैं,
जो सिर्फ़ खाते हैं,
वही नमक कम ज़्यादा बताते हैं।

जो हर काम पे कह दे—
“मैं तो बीमार सूं,”
कमर टूट गई,
न चला जाता, न हिला जाताहै
पता नहीं कैसे,
नाचते हुए सबसे ज्यादा ठुमके लगाता है....
वो एन्जॉय में तो तगड़ा सै,
ज़िम्मेदारी में लाचार सै,
वो शरीर ते नहीं,
भाई वो तो
दिमाग़ ते बीमार सै।

और जो सच में अपने हैं—
वो बिना कहे, सुबह सबसे पहले उठते हैं,
बिना शोर किए काम सँभालते हैं,
डाँट भी खाते हैं,
ताने भी चुपचाप पी जाते हैं।

वो बीमार होकर भी दौड़ते हैं,
चाय ठंडी हो जाती है,
और ताने गरम झेलते हैं,
डाँट पहले उन्हें,
काम पहले उनसे,
और गलती भी उन्हीं की—
क्योंकि जिम्मेदारी उन्हीं की होती है।

न कोई ढिंढोरा,
न कोई शाबाशी की भूख,
बस एक मौन समझ—
“ये घर हमारा है,
इसे झुकने नहीं देंगे।”

उनकी खुशी,
सबके चेहरे की मुस्कान में घुल जाती है,
अपनी थकान
वो शादी की रौनक में दबा देते हैं।

यही तो फर्क है-
खून के रिश्ते और
पसीने के रिश्ते में।

खून का रिश्ता मान-सम्मान चाहता है,
और पसीने का रिश्ता डांट खाता है
और कहता है,
“जो करना है, मैं खुद कर लूँगा।”

जो ताने नहीं मारता,
जो काम गिनाता नहीं,
जो एन्जॉय से पहले ज़िम्मेदारी देखता है-
वही असली अपना है।

शादी में
खाना, गाना, फोटो सब होते हैं,
पर असली रिश्ता
थकान, नींद की कमी
और चुपचाप निभाए गए फ़र्ज़ में पहचाना जाता है।

निवेदन बस इतना है—
हर शादी में मेहमान कम,
ज़िम्मेदार इंसान ज़्यादा बनें।
अंत भला तभी हो सै भाई,
जब अपने लोग
काम भी करें,
डाँट भी खाएँ,
और फिर भी कहें—
“कोई बात ना, घर अपणा सै।”

अनिल आर्य...

Friday, 6 February 2026

रिश्ते

रिश्ते

रिश्ते आवाज़ नहीं करते,
पर जब चुप हो जाते हैं
तो भीतर
बहुत कुछ टूटने लगता है।

माँ सुदेश—
थकी आँखों में भी
जो हमें पहले देखती है,
खुद को बाद में।
उसकी हर खामोश दुआ में
हमारी उम्र से बड़ा
त्याग छुपा है।

पिता बिरेन्द्र सिंह—
जिन्होंने कहा कम,
संभाला ज़्यादा।
जब जीवन डगमगाया,
तो उनका मौन
मेरी सबसे मज़बूत दीवार बन गया।

अनीता-रीतू और अमित,
रहते तो बहुत दूर हैं,
पर दिल के बहुत पास हैं,
इनसे अब बातें कम होती हैं,
इतनी कम
कि कई बार इनकी
आवाजें याद करके
दिल भर आता है।

दिन की आपाधापी में
संदेश अधूरे रह जाते हैं,
और हम—
एक-दूसरे से
थोड़ा पीछे छूट जाते हैं।

फिर भी
दर्द जब भीतर चुभता है,
तो सबसे पहले
इन्हीं के नाम उभरते हैं।
दूरी ने संवाद छीना है,
अपनापन नहीं।

रजनी—
मेरे हर बिखरे दिन की
जुड़ी हुई रात।
जहाँ आँसू भी
इजाज़त लेकर गिरते हैं,
और ख़ामोशी भी
समझी जाती है।
हर रिश्ते का 
मान-सम्मान
इनको आता है,
थकती और रुकती है नहीं,
चेहरा हमेशा मुस्काता है।

अनायरा, पावनी
और रणविजय—
मेरी थकान की दवा,
मेरी हर बिन कही प्रार्थना का -
सुना गया उत्तर।
इनकी एक हँसी
जीवन को फिर से
संभालने लायक बना देती है।

रिश्ते इसलिए ज़रूरी नहीं
कि दुनिया क्या कहेगी,
रिश्ते इसलिए ज़रूरी हैं
कि इनके बिना
हम खुद को
खो देते हैं।

अगर कभी टूट जाओ
तो याद रखना—
दुनिया नहीं,
रिश्ते तुम्हें
फिर से जोड़ते हैं।

दुनिया जीत भी लो तो क्या,
अगर लौटने को
अपना घर न हो—
रिश्ते वही हैं
जो हार में भी
आपको इंसान बनाए रखते हैं।

अनिल आर्य...

Monday, 2 February 2026

रूटीन

रूटीन

सुबह अलार्म नहीं,
मोबाइल जगाता है,
नींद से पहले भी
स्क्रीन ही सुलाता है।

हाथों में दुनिया है,
पर आँखों में थकान,
कैलेंडर भरा पड़ा है,
खाली रह गया इंसान।

चाय के संग खबरें नहीं,
अब नोटिफिकेशन हैं,
हर पल कुछ छूट रहा है—
यही हमारी पहचान है।

दौड़ है, मगर मंज़िल नहीं,
बातें हैं, पर संवाद नहीं,
भीड़ में रहते हैं सब,
फिर भी कोई साथ नहीं।

हँसी इमोजी में सिमट गई,
आँसू साइलेंट मोड में हैं,
भावनाएँ अपडेट चाहती हैं,
पर रिश्ते ऑफलाइन मोड में हैं।

फिर भी उम्मीद ज़िंदा है,
हर थके हुए इंसान में,
एक दिन वक़्त रुकेगा,
दिल लौटेगा पहचान में।

अनिल आर्य...

माहरा कुणबा

मामा नाचै नागिन बनके, साथ में बाजें ढ़ोल
मामी नाचे स्टेज तोड़ दे, होरी सें कती गोल।

मामा का लड़का-दूल्हे का साथी,
नाचे ईसा जनूँ छोटा हाथी।
शंगरी हांडे मामा की छोरी,
शौक-शौक में बौली होरी।

चाचा वैसे “सीधा-सादा”,
जेब में रखते हाफ़।
चाची चाह में हाथ तुडारी,
रील बनावै साफ़।

जीजा जी की ठसक निराली,
बातों करते तोल।
कदम-कदम पर समझदारी,
समझें रिश्तों का मोल।

बेबे माहरी समझदार से,
करे अकल की बात,
पढ़ने में भी नंबर वन,
संस्कार भी रहते साथ।

भाई खड़ा हर मोड़ पे,
ढाल बने हर हाल।
भाभी हँसी सहेज के रखै,
सभी का रखती ख्याल।

फूफा जी ज्ञानी भारी,
हर मुद्दे का हल दें गोल।
बुआ पे बात आए जब,
बदल जावै पूरा रोल।

बुआ का छोटला सनी देओल,
दारू में करे फ़ुल रोल,
दिल का छोरा पूरा साफ,
गलती करदयो उसकी माफ़।

साला हीरो चश्मे काले,
हर फोटो में स्टाइल।
साली बोले “सिंपल हूँ”,
फ़िल्टर बदले हर माइल।

मौसी माहरी पोर्टेबल से,
मौसा पूरा हाथी,
कुनबा माहरा घणा से बढ़िया,
सुःख दुःख के सब साथी।

दादी की डांट में कानून,
दादा मौन कमांड।
इन्हीं दोनों के डर से,
सीधा चलता खानदान।

चुटकी ली है जान के थोड़ी,
नियत बिल्कुल गोल।
जिसने दिल पे ले लिया,
उसका नंबर—नेक्स्ट रोल 😈

अनिल आर्य...

Sunday, 1 February 2026

शादी के नखरे

शादी में सबके नखरे, 
और दिखावा भारी,
घर-परिवार वाले हाँगा लारे,
कार रे पूरी तैयारी,
कुर्सी हिली, बात बढ़ी,
रिश्तेदारी में जाग पड़ी।

ताऊ बोले— मान ना राखी,
ताई ने अपनी डिंग हांकी,
चाचा बोले— व्यवस्था ना सीखी,
चाची की थाली आधी फीकी।

मामा बोले— स्वागत है ठंडा,
मामी बोली— ना चले यो फंडा,
फूफा बोले— दाल में पानी,
फूफी बोली— ये क्या कहानी!

बुआ रूठी— फोटो कट गई,
मौसी बोली— चाय फट गई,
बड़ी मम्मी का सूट ना सिला,
छोटी मम्मी को बिस्कुट ना मिला।

जीजा का ब्रश ना पाया,
साली हँसती - हिलती काया,
साला लेट करता हर काम,
सालन नहीं करती आराम।

दूल्हा बैठा सेहरा ओढ़े,
दुल्हन लहंगा संभाले खड़ी,
घर वाले गिनते करते जाएँ—
किसकी भौंह कहाँ चढ़ी।

शादी ना रह गई अब संस्कार,
पूरा बन गया मेगा-प्रचार,
नखरे कम हों, हँसी हो ज़्यादा—
कोई न कोई रूठे यह करो इरादा।

अनिल आर्य...

हुक्का

खेतों का राजा हुक्का,
हुक्का पंचायत की शान,
ज्ञान की चर्चा हुक्के पे होती,
हुक्का हरियाणे की पहचान।

आज-काल का यूथ बोले-
सूण के गाणे जोड़ तोड़ के,
अक भाई:

मूछयाँ ने मरोड़ के,
सांस ने जोड़ के,
छाती ने फूला के,
पेट ने भींच के,
मार घूँट खींच के,
तू मार घूँट खींच के...

और यो so कॉल्ड यूथ ईसा से,
जवान यो हुया नहीं,
चेहरे पे बुढ़ापा दीखे से,
और घर के दो काम बतादें,
ये करती हाना जीक्खें से।

अर चार कदम तेज चाल लें,
सांस कसूती फूल ज्या से,
गलती ते जै दौड़ना पड़ज्या,
ये सांस भी भूलज्याँ सें।

फेर आँख खूलें हॉस्पिटल में,
जीवन की इनकी आस नहीं,
खूब पीवें हुक्का महफ़िल में,
अर इन ने दारू ते आती बांस नहीं।

अनिल आर्य..