मेरा ये ब्लॉग मेरे मन के कोमल उद्गारों से विरचित है , आप सब इस पर सादर आमंत्रित हैं , अगर कोई सलाह देना चाहें तो कृतार्थ करें , आपका साथी अनिल आर्य...
बदहजमी का है शिकार आदमी,
कर रहा है शिकार आदमी,
बरसा रहा है कहर आदमी,
उगल रहा है ज़हर आदमी।
हर आदमी भरा बैठा है,
अंतरात्मा से मरा बैठा है,
सबका टारगेट एक है,
वो भी बंदा नेक है।
मत बरसाओ उसपर कहर,
काम जल्दी निबटेगा,
उगलो मत,
खाने में मिला दो ज़हर...