Thursday, 22 May 2014

कर्म

कर्मयोगी को
परवाह
भला क्या
कर्म प्रवाह में बहा चले,
चाहे ढह जाये
मिट्टी सा
या खंडहर सा
निःशेष रहा चले,
पाषाण हृदय
जर्जर शरीर संग
अनथक
धूप के माँह चले,
न चंचलता
हृदय की
न फल कि चिंता
कातर चितवन
यहाँ कहाँ चले,
जो हो
निरा ज्ञानी
नहीं
उसकी सानी
हरदम तलाश वो
छाँह चले,
मैं अज्ञानी
जीवन पानी
अनजाने अनंत कि
गहराइयों के
माँह चले...

अनिल आर्य...

Monday, 19 May 2014

शाश्वत नींद

ये भयानक है
कि पलकें भी
बंद हैं
और
नींद नहीं आती...
बेहतर हो
पलकें
तो
खुली रहें
और
मैं सो जाऊँ...
अनिल आर्य...

यथार्थ

मेरी जो
कमजोरी कहते हो
ताकत है
दिखला दूँगा,
अपने भुजबल कि
ताकत से
पत्थर को
पिघला दूँगा...
मनोबल
तपोबल
और बाहुबल
वीरों का ये गहना है,
इससे
पीछे नहीं हटूंगा
मैंने
हँसकर पहना है...
जीवन
अजस्र प्रवाह
स्नेह का,
मैं स्नेह सरिता
बहा दूँगा,
खाली बातों
पर मत जाना
मैं
साबित कर के
दिखा दूँगा...

अनिल आर्य...

Sunday, 18 May 2014

इंसानियत

जो मैं
करता कहता
सुनता सहता हूँ
इसे मेरी
कमजोरी न जानो.
ये तो
इंसानियत की
ताक़त दिखा रहा हूँ मैं...
इंसान बनाया है
मुझे
मेरे बनाने वाले ने
बस
इंसानियत
निभा रहा हूँ मैं...

अनिल आर्य...

Saturday, 10 May 2014

मेरी माँ…

वह 
शान्त, स्नेहमयी 
समय आने पर
मेरी रक्षार्थ  
बन जाये दुर्गा 
लड़ जाए ज़माने से 
भिड़ जाये खुदा से 
बिन किए अपनी परवाह 
मेरी माँ… 

वह 
जो मेरे जीवन 
का आधार 
मुझको करती 
असीमित प्यार 
मेरे इर्द-गिर्द घूमता 
है जिसका सारा संसार 
सब से ज्यादा 
करती है मेरी परवाह 
मेरी माँ...



वह 
हजारों 
जन्म लेकर भी 
जिससे उऋण 
न हो पाऊँ 
हो जाता हूँ 
गदगद 
जब उसका 
अंश कहाऊँ 
करती जग में 
सबसे ज्यादा 
है मेरी परवाह 
मेरी माँ… 

वह 
जिसके प्राण पीकर 
मैंने पाया ये रूप 
जिसकी आँखों से 
देखा जग का स्वरूप 
जिसकी शिक्षा से 
सभ्यता मैने पाई 
जिसके सानिध्य में 
जीने की कला आई 
आज भी मुझे 
छोटा जानकर 
करती बड़ी परवाह 
मेरी माँ…

        अनिल आर्य… 

Wednesday, 7 May 2014

आर्यव्रत कि नारी....

आप सभी विनीत मित्रों कि विशिष्ट मंडली को 
ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना अर्थात  ' नारी '
के बारे में, मैं अपने कुछ विचार सादर समर्पित 
करता हूँ… 
जानता हूँ अभिव्यक्ति थोडी कठिन है, किन्तु 
भाव ग्रहण एवं आत्मसात करके कृतार्थ करें… 

  आर्यव्रत कि नारी


अंतर-तारक धूल विनिर्मित
स्वाभाविक आकर्षण सुसज्जित
मृदुल-मेखला आवरण केश
स्नेह-सिंचित व्यवहार विशेष
विश्वनीयता ज्यों ज्वलंत ज्वाला
नयनो में विश्रांत मधुशाला
सहृदयता समग्रता शाश्वत साभार
अनुपम अदभुत ईश्वरीय उपहार
मंत्रमुग्ध पांडित्य पराजित
स्निग्ध सौम्य शालीन परिमार्जित
सह-आस्तित्व का यथार्थ संवेग
निस्सृत ज्वाल दमित-उद्वेग
प्रजनन-पोषण वर्धन दायित्व
पाषाण-खण्ड सम अखंड स्थायित्व
अन्तर्मन-आलोकित उजियारा
भस्मीभूत करती अँधियारा
मौत से पा चुकी ये पार
पतिव्रता की शक्ति अपार
उज्ज्वल प्रदीप्त छवि अति प्यारी
यही तो है आर्यव्रत कि नारी....


             











           अनिल आर्य… 

Thursday, 1 May 2014

जिंदगी में खुशियाँ-खुशियाँ, संभलती नहीं संभाले...

हर कोई नहीं होता
जो करे बेशुमार मुहब्बत
बर्बादियों कि चाहत
हर किसी को नहीं होती…

बेचैनी हर घड़ी कि
पाले तो कौन पाले
जट्ट को फ़िक्र कहाँ सब
हर आफ़त गले लगा ले…

ज़िस्म रूह से हो जुदा जब
तकलीफ़ तो होती होगी
तुम से जुदाई मेरी
कोई मौत को बुला ले…

तुम फफ़क के रो पड़ोगी
जो मैं गम का बस्ता खोला
हैरानगी है होती
जो मेरी हँसी पे आँख नम हैं....

जिंदगी में खुशियाँ-खुशियाँ
संभलती नहीं संभाले ,
ग़मों कि पड़ी कमी है
हर सितमगर से कह दो
जट्ट को वो आजमा लें…


अनिल आर्य…