Tuesday, 9 June 2026

जुमलों का विकास

​विकास या विनाश 


देश को आगे बढ़ाने के जुमले दिए थे,
जनता को मारकर के वो विकास कर रहे,
साहब कहते थे अंधेरा घर-घर का मिटाएंगे
अब फसल जला कर के वो प्रकाश कर रहे।

​सुबह शाम विरोधीयों से लड़ते थे जो बात-बात पर,
साहब ने उनका भी घर तोड़ दिया आम बात पर,
व्यापारीयों मानते थे मसीहा, मनाया जश्न था,
हैं दुकानों के गेट चुनवा रहे, है ये आम बात पर।

​रोजगार के वायदे पे हमने वोट दिया था,
आज छीन लिया वो, जो पहले से हाथ था,
मायने रखता है जनता का दुःख दर्द साहब को ?
रोते-बिलखतों को कब किसका साथ था???

​शिक्षकों पे थोप दी 'TET' की अनिवार्यता यहाँ,
नेताओं की डिग्री का पर मिलता कोई पता कहाँ?
अनपढ़ बनकर जो देश का मुकद्दर लिखते हैं,
वो गुरुओं से माँग रहे योग्यता का प्रमाण यहाँ!




कागजों पर आंकड़े चमका कर मुस्कुराते हैं,
महंगाई की मार से रसोई को रुलाते हैं,
जो टैक्स के बोझ तले घुट-घुट के जी रहा,
उस गरीब की थाली से निवाला भी उठाते हैं।

​सब बेच दिया कौड़ियों के दाम 'मित्रों' को,
धुंधला कर दिया देश के सुनहरे चित्रों को,
अग्निवीर बना कर युवाओं को चार साल का,
मजबूर कर दिया भटकने को वीर-चरित्रों को।

​सच्चाई पर पहरा है, और गोदी में अखबार है,
सवाल जो पूछे कोई, तो वो देशद्रोही गद्दार है,
जुमलों की चाशनी में जहर ऐसा घोला है,
अब तो विकास ही जनता पर सबसे बड़ा प्रहार है!

अनिल आर्य...

Thursday, 4 June 2026

पीला पंजा और हरा ज्ञान

'पीला पंजा' और 'हरा ज्ञान'

विश्व पर्यावरण दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! विशेष रूप से हमारे सेक्टर के उन जांबाज निवासियों को, जिन्होंने सरकारी कागजों की सूखी 'ग्रीन बेल्ट' को अपने खून-पसीने (और पानी के बिल) से सींचकर एक असल, जिंदा पार्क में तब्दील कर दिया था।

​लेकिन साहब, सरकार को 'हरा रंग' सिर्फ तभी पसंद आता है, जब वह रीलों (Reels) में दिखे या उनके विज्ञापनों में चमके। जमीन पर हरा रंग देखने की आदत तंत्र को नहीं है।

​'पीले पंजे' की अनोखी नीति
​जैसे ही सेक्टर वालों के घरों के सामने तितलियां मंडराने लगीं और हवा में थोड़ी ऑक्सीजन घुली, सरकार की सोई हुई आत्मा अचानक जाग गई। उसने अपनी सबसे प्रिय और 'सशक्त' प्रजाति को मैदान में उतारा—जेसीबी का पीला पंजा!

​नीति का नया गणित:

"पर्यावरण बचाने के लिए पहले पर्यावरण को उजाड़ना जरूरी है।" शायद सरकारी फाइलों में यही लिखा है।
​तर्क देखिए:
​जनता खुद पेड़ लगाए, तो वह 'अतिक्रमण' है।
​सरकार करोड़ों का बजट पास करके कागजी पौधे लगाए (जो अगली बारिश में बह जाएं या बिना पानी सूख जाए), तो वह 'पर्यावरण संरक्षण' है।

'पीला पंजा' और 'हरा ज्ञान'

​कागजों पर उग रही थी जो, वो हरियाली नहीं थी,
सेक्टर वालों की वो किस्मत, इतनी भी तो खाली नहीं थी।
सरकार ने तो छोड़ी थी बस, सूखी 'ग्रीन बेल्ट' यहां,
हमने खून पसीना देकर, एक सुंदर बाग उगाया वहां।

​तितलियां मंडराने ही लगी थीं, हवा भी कुछ सुधर रही थी,
कि अचानक तंत्र की आत्मा, कुंभकर्णी नींद से जग रही थी।
दौड़ा चला आया 'पीला पंजा', जैसे कोई जंग जीतनी हो,
उजाड़ दिया वो सुंदर पार्क, जैसे कोई पुरानी दुश्मनी हो।

​कैसी ये नीति है साहब, कैसा ये विधान है?
जनता लगाए तो अतिक्रमण, सरकार उजाड़े तो महान है!
​सुबह जिसने रौंदा था, पौधों को अपने भारी बूटों से,
दोपहर को वही साहब, ज्ञान बांट रहे थे यू-ट्यूबों से।

एसी कमरे में बैठकर, वो पर्यावरण का मंत्र पढ़ाते हैं,
"एक पेड़ मां के नाम लगाओ", का पावन संदेश सुनाते हैं।
​अरे! कितनी बेशर्म है ये सरकार, और कितना अद्भुत ये ज्ञान है,
एक हाथ में कुल्हाड़ी है, और दूसरे हाथ में संविधान है।

पेड़ तो हम फिर लगा लेंगे साहब, पर ये राज जरा खोल दो,
इस बुलडोज़र के 'बाप' से कैसे बचाएं, बस इतना हमको बोल दो!

अनिल आर्य...

Thursday, 21 May 2026

जनगणना एक अग्निपरीक्षा: "वेदरप्रूफ" शिक्षक

शिक्षकों को समर्पित :

तपती धरती, जलता अंबर, चारों ओर अंगारे हैं,
इस भीषण गर्मी में देखो, निकले भाग्य के मारे हैं।
गले में लटका पास प्रशासन का, हाथों में कुछ कागज हैं,
लू के थपेड़े सहता जाता, फिर भी कदम अग्रसर हैं।

​बिन छतरी के झुलस रही है, उसकी काया बेचारी,
बिन लाठी के गली-गली में, कुत्तों से आफत भारी।
एक हाथ में भारी बस्ता, दूजे हाथ से पसीना पोंछे,
ड्यूटी की मजबूरी ऐसी, जो सारे अरमान नोचे।

​खटखटाता रहा वो दरवाजा, कोई अंदर से बोला नहीं,
बंद किवाड़ों के पीछे से, किसी ने मुखड़ा खोला नहीं।
दूजे दर पर दस्तक दी तो, फटा अचानक कोई बम,
उबलता हुआ बाहर आया, जैसे खौलता हो तेल गरम।

​मुँह पर ही दरवाजा बंद हुआ, अपमान का घूँट पिया उसने,
इस जलते हुए जहान में, कैसा ये फर्ज जिया उसने।
सोच रहा वो घर पर मेरे बच्चे राह देखते होंगे मेरी,
जेठ की सारी छुट्टियां देखो, इस गिनती ने कैसे फेरी।

​जब थककर उसने कदम रोके, तो भीतर का शिक्षक जागा,
वो याद आया जो धूप-धूल से, कभी न पीछे भागा।
गर्मी तो सबके लिए यहाँ, हर कोई बिलख रहा रहकर अंदर,
पर शिक्षक तो 'वेदरप्रूफ' है, सह लेता है हर बवंडर!

​गर्मी से चक्कर सा आया, आँखों के आगे अंधकार सा छाया,
बैठा छज्जे के नीचे, थैले से गर्म पानी पिया, कुछ नहीं खाया।
बोला "दरवाजे बंद करो या दिल में गुस्सा पालो तुम,
मैं फिर भी तुमको गिनूँगा, चाहे जितना गुस्सा उठालो तुम!"

​"मैं राष्ट्र-निर्माता हूँ साहब, मौसम से हार नहीं मानूँगा,
तुम अंगारे बरसाओगे, मैं शांत भाव से गिन जाऊँगा।
मेरी छुट्टियों की राख से ही, कल नया सवेरा महकेगा,
मैं जलूँगा इस तपती धूप में, तब ही तो देश चहकेगा!"

​अनिल आर्य...

Wednesday, 6 May 2026

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना था,
जो आँखों में पलता रहा,
रात की चादर में चुपके से जलता रहा।
वो कहता, "चल, उड़ते हैं,
जहाँ डर की दीवारें नहीं।"

एक हकीकत थी,
जो सुबह दरवाज़े पर मिलती रही,
चाय के कप में, बस की भीड़ में, थकी हथेलियों में।
वो कहती, "रुक, पहले चलना सीख,
फिर उड़ान भरना।"

सपना पूछता है "क्यों नहीं?"
हकीकत पूछती है "कैसे?"
और मैं,
इन दो सवालों के बीच
रोज़ अपना जवाब गढ़ता हूँ।

एक दिन मैंने देखा,
सपना हकीकत का हाथ पकड़ रहा था।
न वो हवा में था, न वो ज़मीन पर,
दोनों साथ चल रहे थे।

तब समझा,
सपना बिना हकीकत के सिर्फ़ धुंध है,
हकीकत बिना सपने के सिर्फ़ बोझ है।
जब दोनों मिलते हैं,
तभी एक कहानी बनती है,
जिसे हम ज़िंदगी कहते हैं।

अनिल आर्य...

जेन जी

सुबह आँख खुलती नहीं, स्क्रीन जलती है।
अंगूठा पहले जागता है, आदमी बाद में।

देशभक्ति अब पंद्रह सेकंड की रील है,
ज्ञान व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में पैक है,
डॉक्टर गूगल है, वकील यूट्यूब कमेंट है,
और भगवान भी ट्रेंड करे तो ही भगवान है।

हम स्टोरी में पेड़ लगाते हैं,
AC सोलह पर चला कर पर्यावरण बचाते हैं,
दिल्ली की धुंध में मास्क ढूंढते हैं,
पर AQI से ज्यादा फॉलोअर्स गिनते हैं।

EMI पर फोन, EMI पर जूते,
EMI पर वो मुस्कान जो किस्तों में हँसती है।
बच्चा कोटा में है, बाप कोटा में नहीं,
पर दोनों एक ही रेस में थके हुए हैं।

मोहब्बत अब बायो में अपडेट होती है,
'इन अ रिलेशनशिप' से शुरू, 'मूव ऑन' रील पर खत्म।
डेट पर दो लोग, तीन फोन,
एक उसका, एक मेरा, एक फोटो खींचने वाला।
सुबह 'गुड मॉर्निंग जानू', रात 'तुम बदल गए हो',
वफा फुल चाहिए, पर ऑप्शन भी खुले रखने हैं,
ब्रेकअप अब दुख नहीं, कंटेंट है।

शादी अब फंक्शन नहीं, प्रोडक्शन है,
प्री-वेडिंग में प्यार, हल्दी में ड्रोन,
मेहमान कम, कैमरामैन ज्यादा,
और आशीर्वाद की जगह 'टैग कर देना भैया'।

माँ-बाप व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं,
बेटा इंस्टा का टॉपर है,
दोनों एक दूसरे को ज्ञान भेजते हैं,
दोनों ही ब्लू टिक के बाद भी अनरीड हैं।

ऑफिस में हम हसल करते हैं,
लिंक्डइन पर ग्रेटफुल लिखते हैं,
बॉस को स्टोरी से हाइड करते हैं,
और सैलरी को महीने के आखिर में ढूंढते हैं।

खबर अब खबर नहीं, सीरियल है,
एंकर चीखता है, हम चाय पीते हैं,
देश हर रात टीवी पर बचता है,
सुबह मेट्रो में फिर धक्के खाता है।

सच को फैक्ट-चेक चाहिए,
झूठ को बस अच्छा बैकग्राउंड म्यूजिक।
हर कोई आहत है, हर कोई आहत करता है,
हर कोई सलाह देता है, सुनता कोई नहीं।

ये है 2026 का आदमी,
जेब में दुनिया, हाथ में पावरबैंक,
दिल में सन्नाटा, और टाइमलाइन पर शोर,
खुद से अनफॉलो, दुनिया को फॉलो।

अनिल आर्य...

Monday, 27 April 2026

वर्षगाँठ

पच्चीस वर्षों का यह साथ,

केवल समय नहीं, एक साधना है।

दो अलग रास्तों का मिलकर

एक सुंदर मार्ग बन जाना है।


मामा, आपसे हमने सीखा,

कैसे धैर्य से जिम्मेदारी निभाई जाती है।

और मामी, आपकी मुस्कान ने बताया,

कैसे घर को खुशियों से महकाया जाता है।


कभी संघर्षों की धूप रही, तो कभी खुशियों की छाँव,

पर आप दोनों के कदम कभी डगमगाए नहीं।

एक-दूजे पर विश्वास की वह अटूट डोर ही थी,

जिसने परिवार के आँगन को बिखरने दिया नहीं।


आज इस खास पड़ाव पर,

हम बस इतना ही कहना चाहते हैं,

आप दोनों हमारा अभिमान हैं, हमारा संबल हैं,

इस घर की प्रतिष्ठा और संस्कारों का कलश हैं।


यह साथ चाँदनी की तरह शीतल बना रहे,

माथे का सिंदूर और चेहरे का तेज अमर रहे।

हमारी दुआओं में बस आपका ही नाम है,

आपकी जोड़ी को हमारा सादर प्रणाम है।


पच्चीस वर्ष का यह सफ़र, पावन हुआ अनुष्ठान है,

मामा-मामी का यह प्रेम , कुल का बढ़ाता मान है।

अक्षय रहे अनुराग यह, गंगा-सदृश निर्मल बहे,

सौभाग्य का यह सूर्य अब, नभ में निरंतर ही रहे।


​मामा बने संबल सदा, मामी बनीं रहें ममतामयी,

संसार की हर सुख-छटा, आँगन खड़ी हो नयी-नयी।

प्रतिष्ठा और विश्वास का, स्तंभ यह अविचल रहे,

सद्भाव और सत्कार की, सरिता सदा कल-कल बहे।


​अर्पण हमारा प्रेम है, चरणों में सादर वंदना,

हो पूर्ण जीवन की सभी, मन की मधुरतम कल्पना।

रजत प्रभा यह स्वर्ण बन, चहुँ ओर नित बिखरा करे,

ईश की करुणा-कृपा, इस युगल पर सदा बरसा करे।


​शादी की 25वीं वर्षगाँठ पर आप दोनों को अनंत शुभकामनाएँ, आपका पुत्र : अनिल आर्य...


Monday, 20 April 2026

भ्रातृ-वन्दन एवं भावपूर्ण विदाई

 भ्रातृ-वन्दन एवं भावपूर्ण विदाई

आदरणीय भ्राता वीरेंद्र आर्य जी,

​शब्द मौन हैं, हृदय भाव-विह्वल है और पलकें स्मृतियों के स्नेह से भीगी हुई हैं। आज आपकी इस गौरवशाली सेवानिवृत्ति के अवसर पर, मैं स्वयं को एक विचित्र द्वंद्व में पा रहा हूँ। एक ओर आपके यशस्वी कार्यकाल की पूर्णता का गर्व है, तो दूसरी ओर आपके सान्निध्य के उस अनमोल अध्याय के औपचारिक समापन की टीस।

​आदरणीय आर्यश्रेष्ठ,

​आपने राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों को केवल कक्षाओं में नहीं पढ़ाया, बल्कि अपने जीवन के व्यवहार में उतारकर दिखाया। आपकी अक्षुण्ण सत्यनिष्ठा और हिमोज्ज्वल श्वेत चरित्र मेरे लिए सदैव एक पवित्र प्रकाश-स्तंभ रहे हैं। "आर्य" नाम की जो गरिमा आपने अपने अनुपम परिश्रम से बढ़ाई है, वह हम सबके लिए कुल-गौरव है।

भीगी पलकों से कुछ शब्द:

विदाई की यह वेला है, पर स्नेह का बंधन अटूट है,

कर्तव्यों से निवृत्ति है, पर आत्मीयता की कहाँ छूट है?

राजनीति के हर शास्त्र को, आपने आचरण से संवारा है,

हे अग्रज! आपके व्यक्तित्व ने, हर हृदय को पुकारा है।


​संस्थान के गलियारों में आपकी उपस्थिति, वह अनुशासित मुस्कान और हर कार्य के प्रति आपकी वह अद्वितीय कर्मपरायणता... इन सबकी कमी को कोई भर नहीं पाएगा। आपने केवल सेवा नहीं की, आपने हम सबके भीतर 'श्रेष्ठता' के बीज बोए हैं।

मंगलकामना:

​मैं (अनिल आर्य) ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि निवृत्ति के पश्चात का यह नूतन सवेरा आपके जीवन में असीम शांति, उत्तम स्वास्थ्य और चिर-आनन्द लेकर आए। आप जहाँ रहें, अपनी ज्ञानमयी दीप्ति से हमें आलोकित करते रहें।

विदाई तो एक औपचारिकता है, आप तो सदैव मेरे हृदय के सिंहासन पर विराजमान रहेंगे।

अश्रुपूरित नेत्रों एवं सजल श्रद्धा के साथ,

आपका अनुज,

अनिल आर्य

Saturday, 4 April 2026

धनखड़

विदाई अभिनंदन: एक युग का समापन
​शब्दों के जादूगर, अनुशासन की पहचान, धनखड़ जी, आप हैं इस उपवन की शान। अंग्रेजी की बारीकियों को आपने सहज बनाया,
साहित्य के सागर को हर दिल में है बसाया।

​किताबों के पन्नों से निकलकर, जीवन जीना सिखाया, कठिन रास्तों पर भी चलना, हमें आपने बताया। एक कुशल प्रशासक और एक कोमल मन के स्वामी,
आपके नेतृत्व में मिली, इस संस्थान को नई सलामी।

​वो शेक्सपियर की पंक्तियाँ और वो ग्रामर का सार, आपकी क्लास में दिखता था, ज्ञान का अपरंपार भंडार। कभी डांटा पिता की तरह, कभी दोस्त बन हाथ बढ़ाया,
हर छात्र ने आपमें, एक सच्चा मार्गदर्शक पाया।

​आज विदाई की इस बेला में, आँखें थोड़ी नम हैं, पर आपकी दी हुई सीख, खुशियों का मरहम है। सूरज कभी ढलता नहीं, बस नई सुबह लाता है,
आपका ये नया सफर, सुख-समृद्धि की गाथा सुनाता है।

​स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, यही हमारी दुआ है, आपकी मेहनत से ही, ये गुलशन आज खिला है। सुरेंद्र धनखड़ जी, आपका नाम गर्व से लिया जाएगा,
ये स्कूल, ये गलियारे, इनकी महक और आपकी मेहनत से, हर छात्र अपनी समृति में आपको पाएगा।

अनिल आर्य...

Wednesday, 25 March 2026

रुद्रा: साहस, स्नेह और सत्य

रुद्रा नाम में अग्नि-सी ज्वाला,
मन में निर्मल गंगाजल धारा।
नन्हे कदमों में अद्भुत शक्ति,
हृदय में प्रेम भरा है सारा।

हँसी तुम्हारी जैसे प्रभात,
अंधियारा पल में हर लेती।
मासूम आँखों की गहराई,
हर थकान को दूर कर देती।

तुममें झलके वीरता की छाया,
भगवान शिव का अंश समाया।
कभी बनते हो तुम शीतल चंद्र,
कभी प्रलय-सा तेज दिखाया।

हर कदम पे हो विजय तुम्हारी,
हर सपना साकार बने।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाओ,
हर दिन तुम्हारा उपहार बने।

माता-पिता का गौरव बनो,
कुल का उज्ज्वल मान बनो।
धरती पर तुम दीपक बनकर,
सबके जीवन की पहचान बनो।

जन्मदिवस की हार्दिक वंदना,
गूगा तुम यूँ ही खिलते रहो।
साहस, स्नेह और सत्य के संग,
हर पल आगे बढ़ते रहो।

अनिल आर्य...

Friday, 20 March 2026

नवचेतना का नवरात्र

नवचेतना का नवरात्र

नहीं आडंबर, नहीं बाह्य आकर्षण,
सत्याग्नि में हो आत्मावलोकन।
अंतर की मलिनता आज पिघले,
विचार सुधरें, संस्कार निकले।
आत्म-शुद्धि का यह पावन काल,
मन बने निर्मल, बुद्धि निष्कलुष विशाल।
व्रत न केवल उपवास का नाम,
इंद्रिय-निग्रह ही उसका प्राण।
ऋतु परिवर्तन का सूक्ष्म संकेत,
संयम से साधो तन-मन का क्षेत्र।
सात्त्विक आहार, प्रकृति का वरदान,
शरीर हो शुद्ध, जागे दिव्य ज्ञान।
माँ नहीं मूर्ति, न सीमित आकार,
वह चेतना-शक्ति, व्यापक विस्तार।
उसको जागृत करना ही साधन,
यही है सच्चा देवी-आराधन।
जब चित्त निर्मल, संकल्प प्रखर,
तभी उठता है जीवन उत्तम स्वर।
इच्छाओं पर संयम का अनुशासन,
संकल्प बनें फिर दृढ़ हो वाचन।
व्रत से उपजे धैर्य अपार,
अंतर में जगे सत्य का सार।
नवरात्रि का यह वैदिक संदेश,
स्वयं को जानो, यही उपदेश।
वेद-विहित जीवन, यज्ञमय विचार,
इसी में निहित है उत्कर्ष अपार।
जब अंतर में जागे दिव्य ज्योति-प्रकाश,
तभी सार्थक होता है नवरात्रि का उल्लास।

अनिल आर्य...

Wednesday, 18 March 2026

नवसंवत्सर

वसन्त आया,
जर्जर देह में
फिर जागा स्पन्दन।

सूनी डालों पर
फूटे अंकुर,
मौन धरा में
जागा जीवन।

यह तिथि नहीं,
समय का आवाहन है,
जागो!
भीतर सुप्त अग्नि को
फिर प्रज्वलित करो।

जब भगवान ब्रह्मा ने
प्रथम रश्मि से
रचा विस्तार,
तब से हर वर्ष
एक ही पुकार,
ह्रदय से नव हो जाओ!

नवरात्रि का व्रत,
अंतर में उतरता,
शक्ति बनता,
अहं को गलाता।

जग हँसता है
क्षणिक उन्माद में;
पर मनुष्य!
तू ठहर,
स्वयं के साध,
तम से बाहर आ।

नवसंवत्सर
दीप नहीं केवल,
अग्नि है,
जला दे जड़ता,
गढ़ दे चेतन।

त्याग कर क्लेश,
संशय, मोह,
उठ,
और चल
प्रकाश-पथ पर।

नव हो विचार,
नव हो व्यवहार,
नव हो संकल्प,
यही सच्चा उत्सव।

चल,
स्वयं से आगे,
स्वयं में उतर,
कर,
यहीं से नव आरम्भ।

तभी 
और केवल तभी 
हमारा नववर्ष
सजेगा,
जब अंतर का 
तम मिटेगा,
हर-उर प्रकाश जगेगा।

अनिल आर्य...

Sunday, 15 March 2026

घर की अदृश्य नींव...पिता

घर की अदृश्य नींव...पिता

घर की छत दिखती है,
दीवारें भी नज़र आती हैं,
खिड़कियों से आती धूप
आँगन को रोशन करती है।

पर एक चीज़ ऐसी भी होती है
जो दिखाई नहीं देती
पर उसी पर
पूरा घर टिका होता है।
वह है नींव।

पिता भी कुछ ऐसे ही होते हैं।
वे छत की तरह
आँचल फैलाकर नहीं ढकते,
न फूलों की तरह
खुशबू बनकर महकते हैं।

वे तो बस
नींव की तरह
चुपचाप नीचे खड़े रहते हैं।

उनकी हथेलियों की कठोरता में
दिन भर की धूप होती है,
और आँखों की थकान में
परिवार के सपनों की रखवाली।

उन्होंने कभी नहीं कहा
“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”
बस चुपचाप
अपनी इच्छाएँ मोड़ कर रख दीं।

जब तुम छोटे थे,
तो तुम्हें ऊँचा उठाने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा और झुकना सीख लिया।

जब तुम बड़े हुए,
तो तुम्हें आगे बढ़ते देखने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा पीछे रहना स्वीकार लिया।

तुम्हें शायद याद न हो,
पर कई रातें ऐसी थीं
जब घर सो चुका था
और पिता जाग रहे थे।

कभी हिसाब करते हुए,
कभी भविष्य सोचते हुए,
कभी बस
तुम्हारी चिंता करते हुए।

पिता का प्रेम
नदी की तरह शोर नहीं करता,
वह धरती की तरह
सब कुछ सहता है।

वह प्रेम
न माँगा जाता है,
न दिखाया जाता है,
बस निभाया जाता है।

और सच तो यह है,
जब तक पिता साथ होते हैं,
हम समझ ही नहीं पाते
कि हम कितने सुरक्षित हैं।

क्योंकि
जिस प्रेम ने हमें थाम रखा है
वह दिखता नहीं।

वह तो बस
घर की अदृश्य नींव की तरह
चुपचाप कहता है,
“तुम बस खड़े रहो ऊँचे होकर…
मैं नीचे से
तुम्हें गिरने नहीं दूँगा।”

अनिल आर्य...

बंद कमरा

बूढ़ा पिता और बंद कमरा

घर बड़ा था,
कमरे भी बहुत थे,
पर एक कमरा ऐसा था
जो हमेशा बंद रहता था।

उस कमरे में
एक बूढ़ा पिता रहते थे।
सुबह खिड़की से
थोड़ी धूप आती,
दीवारों पर चुपचाप
सरक जाती।

पिता उसी रोशनी में
पुरानी तस्वीरें देखते,
और कभी-कभी
धीरे से मुस्कुरा देते।

एक तस्वीर में
नन्हा सा बच्चा था
कंधों पर बैठा हुआ,
हँसता हुआ।

पिता उँगली फेरते हुए
कहते
“मेरा बेटा…”
फिर दरवाज़े की ओर देखते,
शायद कोई आएगा।

बाहर
घर में रौनक थी,
हँसी थी,
टीवी की आवाज़ थी,
मेहमानों की बातें थीं।
पर वह कमरा
अक्सर बंद ही रहता था।

कभी-कभी
बहू खाना रख जाती,
कहती—
“बाबूजी, खा लेना।”
पिता मुस्कुरा कर कहते
“हाँ बहू, रख दो।”

और फिर
थाली से ज़्यादा
दरवाज़े को देखते रहते।
एक दिन
उन्होंने धीरे से पूछा
“बहू, बेटा घर पर है क्या?”
बहू ने कहा
“हैं तो…
पर बहुत व्यस्त हैं।”

पिता ने सिर हिलाया,
जैसे जवाब पहले से जानते हों।
फिर खिड़की से बाहर देखते हुए बोले
“जब छोटा था ना…
तो मेरे कमरे से बाहर ही नहीं जाता था।
रात को भी
मेरी उँगली पकड़कर सोता था…”
बात यहीं रुक गई।

शाम ढली,
कमरे में अँधेरा उतर आया।
पिता ने
धीरे से दरवाज़े की ओर देखा
और फुसफुसाए
“कोई बात नहीं…
बच्चे बड़े हो जाते हैं।”

कुछ दिनों बाद
वह कमरा खुला।
लोग अंदर आए,
चादरें बदलीं,
सामान हटाया।
चारपाई खाली थी।

दीवार पर
वही पुरानी तस्वीर टंगी थी
जिसमें एक छोटा बच्चा
पिता के कंधों पर हँस रहा था।
और तस्वीर के नीचे
टेबल पर एक कागज़ रखा था।

उस पर बस इतना लिखा था
“कमरा बंद नहीं था बेटा…
बस दरवाज़ा
तुमने कभी खोला नहीं।”

अनिल आर्य...

Tuesday, 10 March 2026

पावनी — जीने की नया फलसफ़ा

पावनी — जीने की नया फलसफ़ा 

नन्ही-सी पावनी, पर मन का आकाश अपार,
हँसी में उसकी झिलमिल करता जीवन का सार।
स्वभाव में ऐसी कोमल स्नेहिल मधुरता बसी,
जिससे मिलते ही हर दुःख स्वतः बन जाए खुशी।

दिल से दिल जोड़ लेना उसकी सहज प्रवृत्ति है,
मिलनसार मुस्कान ही उसकी मधुर सम्पत्ति है।
जहाँ खड़ी हो, वहाँ प्रसन्नता का बसंत उतर आए,
जैसे सूने आँगन में चुपके से कुसुम खिल जाएँ।

मन की धुन पर चलना उसकी सुमधुर नीति है,
बंधन से परे अपनी लय में जीना उसकी प्रीति है।
जो रुचिकर लगे उसे साहस से वह अपनाती है,
छोटी-सी आयु में भी जीवन-पथ समझाती है।

अपनी शर्तों पर जीना कोई इससे सीखे,
निर्मल मन में जैसे स्वच्छ गगन ही दीखे।
सच में पावन जीवन का पावन रस्ता बतलाती है,
जीवन की मधुरतम रीति सरलता से सिखालाती है।

हँसो खुलकर, दिल से जुड़ो, मन की सुनो सदा,
अगर खुलकर जीना जो चाहो बांधो ये फलसफ़ा।
करो वही जो सहज बुद्धि कहती है, कोई हो फिर ख़फ़ा,
जियो ऐसे जैसे पावनी जीती है हर जगह हर दफा।

जन्मदिन पर आशीर्वचन
पावनी, तुम्हारी हँसी सदा मधुमय गान बने,
तुम्हारा चंचल मन सबके लिए वरदान बने।
जहाँ तुम्हारे चरण पड़ें, वहाँ भी स्नेह के सुमन खिलें,
और जो जीवन तुम्हारे संग रहें उन्हें भी सदा मुस्कान मिलें।

अनिल आर्य...

बंधन

बंधन का उलटा अर्थ

पुरुष बड़ा स्वतंत्र कहा जाता है
बस इतना कि नौकरी छोड़ने का विचार भी
रोटी से अनुमति लेकर ही आता है।
दिन भर दुनिया की धूप में झुलसकर
जब वह घर की ओर लौटता है,
मन बस यही चाहता है
थोड़ी छाँव, दो घड़ी शांति।
उसे लगता है
घर ही उसका विश्राम है,
और बाहर की दुनिया
एक लंबा अनिवार्य बंधन।
पर उधर
वही घर किसी और के लिए
दीवारों का घेरा है।
औरत बरसों से
उसी चौखट के भीतर
दिनों को सिलती रहती है,
और सोचती है
कभी तो बाहर का आकाश देखूँ।
जब नौकरी का दरवाज़ा खुलता है,
उसे लगता है
मानो स्वतंत्रता की हवा मिल गई।
पर अनजाने ही
वह एक नया बंधन
मुस्कुराकर अपना लेती है,
जिसे वह
खुशी से आज़ादी का नाम दे देती है।
जिस रास्ते को पुरुष
अपनी मजबूरी मानता है,
उसी को स्त्री
स्वतंत्रता का द्वार समझती है।
और जिस घर में
पुरुष शरण ढूँढता है,
उसी घर को स्त्री
कभी-कभी बंधन मान बैठती है।
विडम्बना देखिए
दरवाज़ा एक ही है,
बस दिशाएँ बदल जाती हैं।
एक थककर भीतर आना चाहता है,
दूसरी उम्मीद लेकर बाहर जाना चाहती है।
शायद जीवन का सबसे गहरा व्यंग्य यही है
मनुष्य अक्सर
दूसरे के बंधन को ही
अपनी स्वतंत्रता समझ बैठता है।
और सच तो यह है
स्वतंत्र कोई नहीं,
बस हर किसी की जंजीर का
नाम अलग-अलग है।

अनिल आर्य...

Sunday, 8 March 2026

महाशक्ति वंदना

आर्यव्रत की नारी — महाशक्ति वंदना (नारी दिवस)

ऋतम्भरा निमित्त चेतना से निर्मिता,
अंतरिक्ष-रज कण-कण संचित-संहिता।
प्रकृति-प्राण की दिव्य अभिव्यक्ति-अभिव्यक्ता,
सृष्टि-सार की मूर्त परिणति- परिणीता।

ललाट-दीप्ति ज्यों उषा-प्राची,
वाणी सरस्वती-सी सव्या साची।
मृदुल-मेखला मर्यादा-आवृत
सौम्य-सुषमा शील-सुसज्जित।

नयनों में नव-नीलाकाश
हृदय-दीप में वेद-विलास।
स्नेह-सिक्त संवेदना धारा
जीवन-वन की हरित क्यारा।

विश्वसनीयता ज्वलंत ज्वाला
धैर्य-धरा की दृढ़ रखवाला।
सह-अस्तित्व का सत्य संवेग
शांत-ज्वार, दमित उद्वेग।

यज्ञाग्नि-सा तप का विस्तार
ममता-सिन्धु अपरम्पार।
संघर्षों में वज्र-प्रहार
सौम्यता में चन्द्र-प्रसार।

प्रजनन-पोषण सृष्टि-विधान
जीवन-बीज का प्रथम विधान।
पाषाण-खण्ड सम अचल आधार
युग-निर्माण का मौन विस्तार।

अन्तर्मन आलोकित ज्वाला
तम-रजनी को करती काला।
दुर्गा-शक्ति, करुणा-धारा
जग-वंदिता मातृ-उजियारा।

मृत्यु-द्वार से करती पार
नव-जीवन का देती उपहार।
पतिव्रता-तप तेज अपार
धारण करती जग-आधार।

उज्ज्वल, प्रदीप्त, दिव्य विहारी
श्रद्धा-वेद की ज्योति पुजारी।
आर्य-संस्कृति की आधार-धारी
यही तो है आर्यव्रत की नारी।

मातृशक्ति को सप्रेम समर्पित,
अनिल आर्य...

Friday, 6 March 2026

वरदान

मन चाहे नभ के तारे,
दूर क्षितिज का मान;
चाहत अपनी राह बनाती,
रचती नित अभियान।

पर जीवन की रीति निराली,
सब कुछ कहाँ सुहाता;
जो माँगा वह दूर खड़ा,
कुछ और हाथ आ जाता।

क्षण भर मन खिन्न भी होता,
स्वप्नों का टूटे गान;
फिर अंतर से स्वर उठता
यह भी होगा कल्याण।

जो नहीं मिला वह इच्छा थी,
जो मिला वही प्रभु-दान;
प्रभु की गूढ़ व्यवस्था में
छिपा हुआ हित-ज्ञान।

संतोष जहाँ दीपक बनता,
मन पाता विश्राम;
हर प्राप्ति तब लगती जैसे
ईश्वर का शुभ नाम।

धीरे-धीरे ज्ञात यही
जीवन का पावन मान:
जो चाहा वह आवश्यक नहीं,
जो मिला वही कल्याण।

और यही सरल स्वीकार
देता गहन निदान
प्रभु जो देता प्रेम से,
वही होता है वरदान। 

वरदान क्या वह जो मन को भाए,
या जो हित में सिद्ध हो जाए?
क्षण का सुख अक्सर छल करता,
दूर का कल्याण ही सच बतलाए।

इसलिए जो प्रभु दे निस्संग भाव से,
उसे ही मानो सच्चा दान,
अच्छा लगे हितकर भी होगा?
जो हमें श्रेष्ठ हो - दो प्रभु वही वरदान।

अनिल आर्य...

वरदान

मन चाहे नभ के तारे,
दूर क्षितिज का मान;
चाहत अपनी राह बनाती,
रचती नित अभियान।

पर जीवन की रीति निराली,
सब कुछ कहाँ सुहाता;
जो माँगा वह दूर खड़ा,
कुछ और हाथ आ जाता।

क्षण भर मन खिन्न भी होता,
स्वप्नों का टूटे गान;
फिर अंतर से स्वर उठता
यह भी होगा कल्याण।

जो नहीं मिला वह इच्छा थी,
जो मिला वही प्रभु-दान;
प्रभु की गूढ़ व्यवस्था में
छिपा हुआ हित-ज्ञान।

संतोष जहाँ दीपक बनता,
मन पाता विश्राम;
हर प्राप्ति तब लगती जैसे
ईश्वर का शुभ नाम।

धीरे-धीरे ज्ञात यही
जीवन का पावन मान:
जो चाहा वह आवश्यक नहीं,
जो मिला वही कल्याण।

और यही सरल स्वीकार
देता गहन निदान
प्रभु जो देता प्रेम से,
वही होता है वरदान। 

प्रेम

प्रेम

प्रेम न केवल कोमल पंखुड़ी,
न क्षणिक संदेशों की भाषा;
यह जीवन की गहरी सरगम,
आत्माओं की मौन अभिलाषा।

दिन की चंचल भाग-दौड़ में भी
जब स्मृति सहसा मुस्काए,
मन के अंतरतम आँगन में
एक शीतल दीप जल जाए।

पिता का दृढ़, अडिग विश्वास
पथ को साहस से भर देता,
माता की ममता का आँचल
हर संताप हर लेता।

बहन की हँसी की उजली रेखा
आँगन में मधुमास घोल दे,
भाई का स्नेहिल संबल
जीवन को दृढ़ आधार दे।

और जब संध्या धीरे उतरे,
दिन की थकन नयनों में आए,
प्रिय की एक मृदुल दृष्टि
जीवन को फिर गीत बनाए।

बच्चों की किलकारी में
भविष्य का स्वर्णिम आकाश,
तब मन जान सके सहसा
प्रेम स्वयं एक मधुर निवास।

जहाँ संबंधों की वीणा पर
स्नेह के सुर झंकृत होते,
साधारण दिन उत्सव बनते,
और लय कभी न ख़ोते।

अनिल आर्य...

प्रेम : एक अनुभूति

प्रेम : एक अनुभूति

प्रेम न उच्चरित शब्द है,
न ही चंचल आकर्षण;
यह तो निःशब्द उपासना है,
हृदय से रूह तक का स्पंदन।

नयनों से इसका उद्गम नहीं,
न अधरों पर इसका निवास;
यह तो अंतःकरण की सुगंध है,
जो बन जाती है मधुर अनुभास।

कभी स्मृतियों की स्निग्ध छाया बन
मन-आँगन में उतर आता है,
कभी मृदुल हास की किरण बन
अंतरतम को आलोकित कर जाता है।

जहाँ वाणी मौन हो जाए
और मौन ही संवाद बने,
जहाँ वेदना भी मधुर लगे
वही प्रेम का परम प्रमाण बने।

जिसे एक बार रूह स्पर्श कर ले
वह बंधन कभी क्षीण नहीं होता,
प्रेम जहाँ हृदय में प्रतिष्ठित हो
वहाँ जीवन कभी शून्य नहीं होता।

अनिल आर्य...

Tuesday, 3 March 2026

फाग

फाग — रिश्तों की मिठास

फागुन जब देहरी पर आता है,
सिर्फ़ रंग से ही नहीं,
वो रिश्तों की सूखी डोर को 
पानी के प्रेम से तर कर जाता है।

हल्की सी गुलाल की छुअन,
बरसों की दूरी पिघला देती है,
एक मुस्कान और अनकही बातें,
मन की गाँठ सुलझा देती है।

जो मन में रूठा बैठा था,
रंग उसे बना दें रंगीला,
सूनी पड़ी जिंदगानी,
फाग बना देती सजीला।

न कोई ऊँच-नीच का पर्दा,
न अहंकार की दीवार रहे,
बस अपनापन ऐसे घुले
पिचकारी से प्यार बहे ।

भाई की हँसी में स्नेह घुले,
बहन के गालों पर सजे गुलाल,
शिवा सादगी में हल्दी से सजे,
भाभी -देवर दोनों हों लाल।

बड़ों के चरणों में आदर ग़ुलाल,
छोटों के संग खिलखिलाहट की बात,
रिश्तों की थाली में आज
प्रेम ही सबसे बड़ी सौगात।

फाग यही तो कहता है,
मन की उदासी को तोड़ो,
थोड़ा सा रंग लगाओ
और थोड़ा सा मन को भी जोड़ो।

ऐसा फाग रचे इस बार,
हर घर मधुमय हो जाए,
रंग उतर जाएँ चेहरे से,
पर मिठास सदा के लिए रह जाए। 

अनिल आर्य...

Sunday, 1 March 2026

होली

होली

फाल्गुन की पूर्णिमा जब
चन्द्र श्वेत शंख-सा नभ में बजता है,
तब आर्यभूमि की वाणी
फिर एक पुरातन गाथा कहती है।

जब अधर्म के मद में चूर
हिरण्यकश्यप ने सत्य को ललकारा था,
तब बाल-हृदय में दीप बनकर
प्रह्लाद अडिग खड़ा था।

वरदानों के आवरण में लिपटी
होलिका
जब अग्नि में प्रविष्ट हुई,
तो ज्वालाओं ने भी पहचान लिया
आर्य का सत्य न जलता है,
आर्य की श्रद्धा न झुकती है।

होलिका-दहन केवल लकड़ियों का दाह नहीं,
यह अनार्य वृत्तियों का परित्याग है;
यह भीतर के तम पर
धर्माग्नि का प्रज्वलित राग है।

और जब अग्नि की राख पर
नई प्रभा का स्पर्श उतरता है,
तब ब्रज में स्मृत होती है वह मधुर लीला
जहाँ कृष्ण की वंशी
फाग का वेद गाती थी,
और राधा की मुस्कान
अबीर-सी नभ में छा जाती थी।

वहाँ रंग उच्छृंखल नहीं थे,
वे संस्कारों के सुमन थे;
वहाँ हास्य उद्दंड नहीं था,
वह स्नेह की मर्यादा में बँधा स्पंदन था।

आर्यत्व का अर्थ है 
सत्य पर अडिग रहना,
बल में विनय रखना,
उत्सव में संयम रखना,
और भिन्नता में भी आत्मीयता देखना।

होली हमें यही स्मरण कराती है 
धर्म केवल ग्रंथों में नहीं,
वह आचरण में दीप्त होता है;
रंग केवल देह पर नहीं,
वे चरित्र पर भी चढ़ते हैं।

आओ, इस पावन अवसर पर
अधर्म, द्वेष और अहंकार को अग्नि में समर्पित करें,
और प्रेम, साहस, करुणा व शुचिता के रंगों से
अपने जीवन को आर्यमय करें।

आपका प्रत्येक विचार पावन हो,
प्रत्येक कर्म मर्यादित हो,
और प्रत्येक संबंध स्नेह से सिंचित हो।

आपको एवं आपके परिवार को आर्यत्व से आलोकित, मर्यादित और मंगलमयी होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। 
अनिल आर्य...

Sunday, 22 February 2026

मोनिका

साली साहिबा मोनिका,
हँसी की चलती फ़ैक्टरी,
जहाँ खड़ी हो जाएँ आप,
शुरू हो जाए कॉमेडी की कैटेगरी।

आपकी मुस्कान में शरारत,
बातों में मीठा तीर,
ऊपर से भोली सूरत,
अंदर से पूरी वीर।

काम में ऐसी तत्पर,
मानो बिजली की रफ़्तार,
रसोई हो या ज़िम्मेदारी,
सब पर मोनिका का अधिकार।

पर भाई साहब को छेड़ने में,
आपका अलग ही है विभाग,
कभी कहें – “गंभीर बहुत हैं”,
कभी करें परिहास।

और फेशनेबल भी हैं पूरी,
कभी जूडा, कभी पिन लगाती हैं बाल में,
और इनसे बचके रहना भाई साहब,
झाड़ा लगवाने भी जाएँ-तो चाकू रखती हैं शॉल में।

घर की रौनक आपसे,
हँसी का चलता व्यापार,
रजनी भी मुस्काए चुपके,
देखे अपने जीजा की हार।

पर सच यह भी है मोनिका जी,
दिल आपका है खरा सोना,
सभी अपनों के लिए जीती हैं,
नहीं यह किसी और से होना।

जन्मदिन पर शुभकामनाएँ,
सपनों को मिले उड़ान,
हँसी आपकी यूँ ही गूँजे,
और बढ़े आपका मान-सम्मान।

और हाँ, एक बात आख़िरी,
भाई साहब को ज़्यादा न सताइएगा,
वरना अगली बार कविता नहीं,
पूरी कहानी लिखवाईयेगा।

जन्मदिन मुबारक हो साली साहिबा!

सप्रेम : अनिल आर्य...

Saturday, 14 February 2026

शिवरात्रि

शिव:रात्रि, नहीं जागरण

यह रात्रि नहीं, है जागरण,
चेतना का गहन विस्तार है।
जहाँ दृश्य और अदृश्य के बीच
भेद का अंतिम द्वार है।

न जटा, न गंग, न नीलकंठ,
न आकार, न कोई अलंकार।
जो है, वही शिव का स्पंदन,
जो नहीं, वही उनका विस्तार।

जब “मैं” पिघलता है मौन में,
और “तू” भी ध्वनि से उतर जाता,
द्रष्टा–दृश्य का खेल सिमटकर
एक ही बिंदु में ठहर जाता।

न पूजक, न पूजा शेष,
न अर्पण, न स्वीकार,
जहाँ अनुभव भी छूट जाए,
वहीं प्रकटे शिव निर्विकार।

शिवरात्रि की यह गहन घड़ी,
निद्रा नहीं, जागरण है,
अहंकार की अंतिम राख से,
उदित आत्मा का दर्पण है।

जो शून्य में पूर्ण देख ले,
जो पूर्ण में शून्य उतार दे,
जो स्वयं को स्वयं में खो दे,
वही शिव को अंतर में आकार दे।

न निर्गुण अलग, न सगुण पृथक,
न साधक कोई, न साध्य हो,
एक ही चेतन लहर अनंत,
वही शिव, वही अद्वैत आराध्य हो।

वायु-सा छू ले हर उर-तार,
पर रहे स्वयं से भी पार,
जहाँ हर श्वास बने शिव का स्वर,
हम वहीं पाए शिव का विस्तार।

अनिल समीर-सा बहता रहे,
शिव-नाम सुवास में कहता रहे,
लेखक भी, साधक भी बनकर,
अंतर का आकाश गहता रहे।

अनिल आर्य...



Tuesday, 10 February 2026

रजनी

“रजनी”
रजनी…
तू मुस्कुराती है तो
शब्द शर्म से झुक जाते हैं,
हुस्न को भी डर लगता है
कि कहीं तुझसे हार न जाए।
तेरे चेहरे पर
सादगी का ऐसा नूर है
कि आईना भी रोज़
खुद को ठीक करने लगता है।
तेरी आँखें—
जैसे बिना बोले ही
मेरी सारी थकान पूछ लेती हों,
और पलक झपकते ही
मेरी दुनिया समेट लेती हों।
तेरा स्वभाव…
हाय, वही तो मेरी सबसे बड़ी दौलत है,
जहाँ प्यार शोर नहीं करता,
बस चुपचाप
मेरे हर ग़लत दिन को
सही बना देता है।
और जब तू नाचती है रजनी…
तो ज़मीन ताल नहीं देती,
वक़्त थम जाता है,
मैं भूल जाता हूँ
कि दुनिया देखनी भी थी—
क्योंकि उस पल
सिर्फ़ तू ही काफ़ी होती है।
तेरी हर अदा
बिना सिखाए क़ायदा बन जाती है,
तेरी हर हँसी
मेरे नाम की दस्तख़त लगाती है।
मैं अनिल…
तेरा होना ही
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है,
और तेरा प्यार—
मेरी ज़िंदगी की
सबसे ख़ूबसूरत आदत।
अगर मोहब्बत का
कोई पता होता,
तो उस घर का नाम
“रजनी” ही होता…
और दरवाज़े पर लिखा होता—
यहाँ अनिल बसता है। 💞

अनीता -शक्ति

अनीता–शक्ति : प्रेम का छन्द

अनीता दीप, शक्ति बाती,
इन दोनों से उजियारा है।
साथ जले जीवन का दीपक
जैसे सचमुच का कोई तारा है॥

हँसते-रोते, चलते-चलते,
बरसों का ये मान हुआ।
हर कठिनाई आकर चली गई,
इनको और महान किया॥

आँगन में जब रुद्रा आया,
खिल उठी हर एक दिशा।
माँ की ममता, पिता का साहस,
बन गई उसकी परिभाषा॥

रुद्रा हँसा तो घर मुस्काया,
मौन भी उत्सव बन जाता।
इस छोटे से नन्हे स्वर में,
भविष्य गीत सुनाता॥

साल नहीं, संस्कार गिनते,
बंधन को वरदान कहें।
अनीता-शक्ति साथ रहें यूँ,
युग-युग तक पहचान रहें॥

वैवाहिक वर्षगाँठ की
हृदय से शुभकामनाएँ 
रुद्रा संग जीवन
सदा प्रेम से भरता जाए...

अनिल आर्य...

Monday, 9 February 2026

फेयरवेल

प्रिय बच्चों,
आज तुम्हारी फेयरवेल है,
और हमारी भी...

क्योंकि अब कॉपी जाँचने के बहाने
तुम्हारी लिखावट पर डांटने का मौका नहीं मिलेगा 😄
आजसे ना होमवर्क का डर,
ना सर की डाँट…
(और ना ही “कॉपी निकालो आज टेस्ट है ” की आवाज़ 😜)
फिर भी तुम्हे पढना है,
जिम्मेदारी लेनी है।

12वीं तक आते-आते
तुम सबने एक बात अच्छे से सीख ली है—
“सर, ये चैप्टर तो बहुत आसान है”
(और अगले दिन वही सबसे मुश्किल निकलता है)

किसी ने हिन्दी से दोस्ती निभाई,
किसी ने इंग्लिश से दूरी बनाए रखी,
और कुछ बच्चे ऐसे भी थे
जो पूरे साल यही सोचते रहे—
“ये बोर्ड में आएगा या नहीं?”

मोबाइल तुम सबका सबसे सच्चा मित्र रहा,
जो क्लास में भी साथ था,
और घर पर पढ़ाई के वक्त भी…
(हालाँकि पढ़ाई उससे कभी मिली नहीं 😜)

तुम सब छुप-छुप कर मोबाईल लाते रहे या जो भी कुछ करते रहे वो सब हमें पता होता था,

(तुम समझते हो छुपा लिया,
पर हमें सब पहले से पता है,
छात्र की चाल, आँख की भाषा-
ये किताब से पहले पढ़ा है।

सब सोचते हैं दाल में काला है,
हम हँस कर यही कहते हैं-
बेटा, यहाँ तो
पूरी दाल ही काली है! 😄

हमें सब पता है,
पहले से ही
तुम सोचते हो,
बात छुपा ली है...)

एग्ज़ाम में
पेपर देखकर माथा खुजाया,
फिर बगल वाले को देखा
और सोचा—
“इसको आता है तो मैं भी पक्का पास!” 😆
ऐसा मत करना, अपनी तैयारी रखना
ताकि रिजल्ट आने के बाद न हो 
उदासी का अहसास।, 😒

रिज़ल्ट के बाद
एक डायलॉग सबका सेम—
“सर, बस दो नंबर से रह गए…”
हाँ भई, वही दो नंबर
हर साल सबके रह जाते हैं 😜
पर अबकी बार मत रहने देना...

लेकिन मज़ाक अपनी जगह,
तुम सबने स्कूल को
हँसी भी दी,
शोर भी दिया,
और ऐसी यादें साझा की,
जो सिलेबस में नहीं मिलतीं।

अब आगे की दुनिया
नक़ल व बहाने से नहीं,
ख़ुद के दम से ही चलेगी,
और आगे सब जगह तुम नहीं
तुम्हारा काम बोलेगा।

जाओ, बड़े बनो,
नाम कमाओ,
पर कभी ज़िंदगी
तुम्हारा पेपर मुश्किल कर दे-
तो याद रखना,
स्कूल में एक अनिल आर्य सर थे,
जो हर मुश्किल सवाल से पहले
आसानी से हँसा देते थे,
और मुश्किलें आसान हो जाती थी...

ऑल द बेस्ट, मेरे शेरों! 🐯
जाओ अब जंगल तुम्हारा है, राज करो...
अनिल आर्य...

Saturday, 7 February 2026

जिम्मेदारी

जिम्मेदारियों की आग में

वो हँसे तो लगता है, जैसे समय थम गया कहीं,
मैं अपने वक़्त के पहियों में, धूल सा उड़ता जा रहा हूँ।

उसकी आंखों में सुकून, मेरे दिल में बेचैनी,
मैं ख्वाबों की चाहत में, कसकर बंधता जा रहा हूँ।

वो कहे—"थोड़ा रुक जाओ, कुछ पल मेरे लिए,"
मैं "आगे बढ़ना ही है" के जाल में फँसता जा रहा हूँ।

उसकी बातें जैसे फूल, मेरे शब्द जैसे कांटे,
मैं जिम्मेदारियों की आग में, खुद ही झुलसता जा रहा हूँ।

उसकी बाहों की गर्मी, मेरे हाथों की ठंडक,
मैं कर्तव्यों की मशीन में, खुद को पीसता जा रहा हूँ।

मोहब्बत और ज़िम्मेदारी के इस अजीब समीकरण में,
मैं हर पल खुद को ढालता और बदलता जा रहा हूँ।

और फिर भी, हर रात उसके ख्यालों में खोकर,
मैं अपने अंदर की नर्मी को, धीरे-धीरे तलाशता जा रहा हूँ।

वो पास रहकर दूर सही, मगर उसकी दूर तक की यादें पास हैं,
मैं अपनी चाहत और फर्ज़ के बीच, धीरे-धीरे सुलगता जा रहा हूँ।

अनिल आर्य...

मामा का परिवार

मामा मज़ाकिया, हंसाए दिन भर सारा,
बोलते ही घर में छूट जाए हँसी का फुहारा,
मामी हँस-हँस के फूल गईं,
खाट पे बैठी, खाट भी झूल गईं।

मामी के बीमारी भी भारी,
अर मामी सब पे भारी,
होरी इसी जणु मोटा महंत,
करे हाथी की सवारी।

मामा हँसते-हँसते रहते हिलते,
हँसते-हँसते सबते मिलते,
हिलने की अब आदत बणगी
अब तो चलते-चलते भी हिलते।

आर्यन कमेरा मामा जिसा, होग्या मोटे ते पतला
खाना भी कम कर दिया, पहले खाता था एक तसला।
अब लड़का जिम्मेदारी लेने को तैयार,
नौकरी लगते ही, काम बाँध दो,
बस जाए परिवार।

सेजल पसरी रहती दिन-भर, आराम की दूकान,
कुछ भी लेण चले जाओ, खत्म मिले समान।
सोफे से दोस्ती दिन में, 
देर सुबह तक तकिए पे सपनों का शौर,
उठाने की कहो तो कहती 
“अभी सोने दो 10 मिनट और।”

अब शादी करणी से इसकी भी,
माहरे नहीं से कोए आँट,
पहले बैठे ज्यांगे तयारी कर कै,
बैरा सै, सुसराड़िया फोड़ेंगे माहरी टाँट।

सभी यहाँ हँसते-मिलते, घंटों सब बातों में झूमते,
हमारा यह परिवार, हँसी का असली ठिकाना,
जहाँ हर मज़ाक में छुपा प्यार, 
और हर हँसी में अपनापन अपार,
भगवान से दुआ, ऐसे ही हँसता रहे हमारा यह परिवार।

अनिल आर्य...

पिता

पिता...

वह
जो थक कर घर आता है,
और पूछता है—
सब ठीक है न?
कभी नहीं बताता
कि उसके भीतर
क्या-क्या टूटा है।

वह
जो अपने सपनों को
चुपचाप
मेरे नाम लिख देता है,
और फिर
उन्हें याद तक नहीं करता-
ताकि मैं
कभी बोझिल न हो जाऊँ।

पिता धूप नहीं,
धूप में खड़ा
एक साया है—
जो खुद जलता है,
पर बच्चों तक
आँच नहीं पहुँचने देता।

मैं जब रोया,
वह रोया नहीं,
मैं जब हारा,
वह टूटा नहीं।
उसने अपने आँसू
मेरी नींव में
गाड़ दिए—
ताकि मेरी इमारत
कभी डगमगाए नहीं।

उनके हाथ
कठोर थे,
पर उन्हीं हाथों में
मेरी नींद 
सबसे सुरक्षित रही।

उन्होंने मुझे
गोद में कम उठाया,
ज़िम्मेदारियों में ज़्यादा सिखाया,
शायद इसलिए
मैं गिरा कम,
समझदार जल्दी हो गया।

आज जब मैं
खुद पिता हूँ,
तब समझ आता है—
वह क्यों
हर बात पर
खामोश रहते थे।

कुछ प्रेम
कहे नहीं जाते,
सिर्फ जिए जाते हैं।

और पिता
वही प्रेम है—
जो कभी पूरा समझ नहीं आता,
पिता वह बरगद है,
जो प्राण-वायु भी देता है,
छाँव भी,
और अपना पानी
और भोग्य भी स्वयं ही
लेता है,
पाताल की किसी गहराई से।

अगर ऊपर वाले से
कुछ माँग सकूँ,
तो बस इतना—
मेरे पिता को
अब वो आराम दे देना
जो उसने
न कभी चाहा
और न ही कभी माँगा…

अनिल आर्य...

खुद से कनेक्शन

मेरे भीतर
कुछ यूँ हलचल होती रहती है,
जैसे दुआ
ख़ुद को ढूँढ रही हो,
मुकाम ख़ुदको खोज रहा हो,
सब अंदर ही घट रहा है,
स्वयं-सफुर्त,
अपनी ही लय में,
जैसे मैं खुद को माध्यम पाता हूँ,
जोड़ने का,
अंतर को बाहर से,
सत्य को सुन्दर से,
मैं
सुनता हूँ,
आत्म के मौन को, 
जानता हूँ 
शून्य के विस्तार को,
झाँकता हूँ अंतर में,
बहुत उथल-पुथल में,
ढूंढता हूँ एक शांत जगह,
जहाँ कुछ तो है,
समझ के स्तर के ऊपर का,
जीवन के उस पार का,
लाइब्रेरी जैसा सा कुछ है,
जिसमें पढ़ने-समझने जैसा कुछ नहीं,
सिर्फ जुड़ना पड़ता है,
बहना पड़ता है,
बहाव के साथ।

मैं जुड़ता हूँ,
यह जुड़ाव बहुत मुश्किल है,
बहता हूँ,
यह बहाव बहुत छोटा होता है,
और अनायास होता है,
जहाँ कुछ प्रयास करता हूँ,
डूब जाता हूँ।

इसमें कनेक्शन मैं,
मैं बोलता कम हूँ,
सुनता ज्यादा,
प्रश्न नहीं पूछता
उत्तर सुनता हूँ,
उस जगह पर,
मैं, मैं नहीं रहता,

मैं शब्द उस विस्तार को
सीमित कर देता है,
तब,
मैं वो जगह बन जाता हूँ,
जहाँ आदमी
अपनी परतें उतार देता है।

मैं सिर्फ आईना नहीं बनता,
मैं साक्षात्कार बनता हूँ-
स्वयं से,
जो चेहरों से ज़्यादा
नीयतें पकड़ लेता है।

लोग मुझसे होकर गुज़रते हैं,
मुलाक़ात के लिए नहीं,
अपने बोझ को
हल्का करने के लिए।

मैं उधेड़ता हूँ,
परत दर परत,
और फिर बुनता हूँ,
एक - एक सलाई,
तोड़ता हूँ गढ़-मठ सांचे,
तराशता हूँ-
अंतर्मन की सच्चाई।

वो खुद से रिश्ता है मेरा,
बहुत करीब का,
बिना रस्म,
बिना किसी ऐलान के।

और ऊपर वाले से
बस इतनी सी दरख्वास्त,
की इस दुनिया में
हर किसी को देते हो जगह आप,
तो मेरे अंदर भी
मुझे थोड़ी सी वही
जगह दे देना…
जहाँ मिलें आप के साथ,
सुकून के दो पल,
व इतनी हिम्मत की हाथ
कितने भी जख़्मी हों,
मैं तराश दूँ हिमालय...

— अनिल आर्य

नींद

दिन में वो घर में उलझी रहती है,
बच्चों की कॉपी, रसोई, ज़िम्मेदारियाँ,
थकान को भी फुर्सत नहीं देती,
खुद को कहीं आख़िर में रखती है।

रात को जब सब सो जाते हैं,
उसका मोबाइल उसका सुकून बन जाता है,
बिना स्क्रीन के उसे नींद नहीं आती,
शायद पहली बार
वो सिर्फ़ अपनी होती है।

और मैं…
मैं समझता हूँ ये सब,
उसकी थकान, उसकी चुप्पी,
उसका खुद के लिए
थोड़ा-सा वक्त।

पर सच ये भी है—
मुझे उसके बिना
नींद नहीं आती।

मैं चाहता हूँ वो आराम करे,
पर मेरी गोद में,
स्क्रीन की रोशनी में नहीं,
मेरी साँसों की लय में।

मैं चाहता हूँ
वो दिन भर सबका ख्याल रखे,
पर रात को
थोड़ी देर
मेरा भी रखे।

मोबाइल उसकी आदत है,
मैं उसकी ज़रूरत बनना चाहता हूँ।

वो अगर फोन रखकर
बस इतना कह दे—
“आज बहुत थक गई हूँ,”
तो यक़ीन मानो
मेरी सारी शिकायत
नींद बनकर उतर जाएगी।

क्योंकि
उसे मोबाइल के साथ
नींद आती है,
और मुझे
उसके साथ।

अनिल आर्य...

हक़

मैं शरीफ़ हुआ तो क्या…?
वो अपना हक़ छोड़ दे…?
मेरी पत्नी को मुझ पर शक भी है,
और शक करना एक औरत का हक़ भी है।

कमी थोड़ी रही होगी कोई मेरी,
पर याद नहीं क्या…?
और थोड़ा शक किया तो,
गलती उसकी क्या…?

हाँ, दोबारा गलती,
नहीं तुम्हारे साथ करेंगे,
आज के बाद किसी और-
औरत से नहीं बात करेंगे।

क्योंकि शक़ से घर में CCTV आँखें लग जाती हैं,
जो चुप्पी भी रिकॉर्ड कर लेती हैं,
मोबाइल की स्क्रीन नहीं,
नज़रें पहले चेक कर लेती हैं।

हँसी ज़्यादा आई तो सवाल तैयार,
“किसकी याद में इतना प्यार?”
चुप रहे तो इल्ज़ाम पक्का,
“देखो… मन में कुछ है यार!”

देर से आए तो कहानी चाहिए,
जल्दी आए तो शक का दायरा,
सच बोलो तो ड्रामा बनता है,
झूठ बोलो तो सीधा ट्रायल एरिया।

मैं कहूँगा —थक गया हूँ आज ज़रा,
वो बोले—“थकान किससे?”
मैं कहूँगा -“काम बहुत था ऑफिस में,”
वो बोले-“नाम बताओ… किससे?”

हक़ उसका है—पूछे हर बात,
हक़ उसका है—तौले हर साँस,
पति हूँ, कोई फाइल नहीं,
फिर भी रोज़ होगी, जाँच-पड़ताल खास।

पर मानता हूँ—ये व्यंग्य भी अधूरा है,
क्योंकि सच थोड़ा और गहरा है,
जिस औरत को इतना शक है मुझ पर,
वो शायद मुझसे … बेहिसाब जुड़ी है।

सच कहूँ तो मैं लड़ सकता हूँ दुनिया से,
पर तुमसे नहीं—कभी नहीं,
क्योंकि मेरी हर जीत का मतलब,
तुम्हारी मुस्कान से है, किसी और से नहीं।

तुम मेरा गुस्सा भी सह लेती हो,
मेरी ख़ामोशी भी ओढ़ लेती हो,
मैं टूटूँ तो बिना कहे,
मेरे टुकड़े चुन लेती हो।

अगर कह दूँ आज सब छोड़ दूँ,
ये भीड़, ये शोहरत, ये नाम,
हर किसी फीमेल से काम,
तो यक़ीन मानो—एक पल में,
तुम्हारे कदमों में रख दूँ हर शाम।

क्योंकि पत्नी सिर्फ़ शक नहीं होती,
वो आदत, ज़रूरत, साँस होती है,
दुनिया छोड़ने की बात मज़ाक नहीं,
जिस दिन वो रूठे—सारी दुनिया ख़ामोश होती है।

अनिल आर्य...

शादी ने बताया अपना कौन...?

अपना कौन...?

शादी के दिनों की रातें लंबी होती हैं,
नींद आँखों से पहले रिश्तों में अटक जाती है,
जिसे “अपना” कहा गया था बरसों से,
वो आज सिर्फ़ एन्जॉय करने आया है।

और जो सिर्फ इन्जॉय करने आया है,
उसके पास ब्याह बिगाड़ने के सब नुस्खे हैं,
वो चाय पे हंगामा करता है,
वो बिस्किट का बहाना धरता है,
और उसके पास,
अपनी बीमारी का एक नुस्खा भी नहीं है,
काम के वक़्त अचानक
कमर दर्द, घुटने की चोट,
पुराना सिर दर्द जाग जाता है,
कमाल की बात ये है कि,
एन्जॉय के वक्त ये सब भाग जाता है।

जैसे ही झाड़ू उठे-
ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है,
और प्लेट दिखे तो
डॉक्टर भी छुट्टी पर चला जाता है।

हाथ में प्लेट,
मुँह में ज्ञान,
बीमारी ऐसी
जो सिर्फ़ काम देखकर याद आए।

काम?
हाँ काम सै याद आया,
वो तो परिवार का संस्कार है-
मेहमानों का नहीं,
और कहने का परिवार,
कब मेहमान बन जाता है,
पता ही नहीं लगता।

कोई हँसते हुए फोटो खिंचवाता है,
कोई हर बात पर नुक्ता निकालता है,
शिकायतों की फेहरिस्त लंबी है,
पर हाथ… हाथ खाली हैं।

जो कुछ नहीं करते,
वही सबसे ज़्यादा थकान गिनाते हैं,
जो सिर्फ़ खाते हैं,
वही नमक कम ज़्यादा बताते हैं।

जो हर काम पे कह दे—
“मैं तो बीमार सूं,”
कमर टूट गई,
न चला जाता, न हिला जाताहै
पता नहीं कैसे,
नाचते हुए सबसे ज्यादा ठुमके लगाता है....
वो एन्जॉय में तो तगड़ा सै,
ज़िम्मेदारी में लाचार सै,
वो शरीर ते नहीं,
भाई वो तो
दिमाग़ ते बीमार सै।

और जो सच में अपने हैं—
वो बिना कहे, सुबह सबसे पहले उठते हैं,
बिना शोर किए काम सँभालते हैं,
डाँट भी खाते हैं,
ताने भी चुपचाप पी जाते हैं।

वो बीमार होकर भी दौड़ते हैं,
चाय ठंडी हो जाती है,
और ताने गरम झेलते हैं,
डाँट पहले उन्हें,
काम पहले उनसे,
और गलती भी उन्हीं की—
क्योंकि जिम्मेदारी उन्हीं की होती है।

न कोई ढिंढोरा,
न कोई शाबाशी की भूख,
बस एक मौन समझ—
“ये घर हमारा है,
इसे झुकने नहीं देंगे।”

उनकी खुशी,
सबके चेहरे की मुस्कान में घुल जाती है,
अपनी थकान
वो शादी की रौनक में दबा देते हैं।

यही तो फर्क है-
खून के रिश्ते और
पसीने के रिश्ते में।

खून का रिश्ता मान-सम्मान चाहता है,
और पसीने का रिश्ता डांट खाता है
और कहता है,
“जो करना है, मैं खुद कर लूँगा।”

जो ताने नहीं मारता,
जो काम गिनाता नहीं,
जो एन्जॉय से पहले ज़िम्मेदारी देखता है-
वही असली अपना है।

शादी में
खाना, गाना, फोटो सब होते हैं,
पर असली रिश्ता
थकान, नींद की कमी
और चुपचाप निभाए गए फ़र्ज़ में पहचाना जाता है।

निवेदन बस इतना है—
हर शादी में मेहमान कम,
ज़िम्मेदार इंसान ज़्यादा बनें।
अंत भला तभी हो सै भाई,
जब अपने लोग
काम भी करें,
डाँट भी खाएँ,
और फिर भी कहें—
“कोई बात ना, घर अपणा सै।”

अनिल आर्य...

Friday, 6 February 2026

रिश्ते

रिश्ते

रिश्ते आवाज़ नहीं करते,
पर जब चुप हो जाते हैं
तो भीतर
बहुत कुछ टूटने लगता है।

माँ सुदेश—
थकी आँखों में भी
जो हमें पहले देखती है,
खुद को बाद में।
उसकी हर खामोश दुआ में
हमारी उम्र से बड़ा
त्याग छुपा है।

पिता बिरेन्द्र सिंह—
जिन्होंने कहा कम,
संभाला ज़्यादा।
जब जीवन डगमगाया,
तो उनका मौन
मेरी सबसे मज़बूत दीवार बन गया।

अनीता-रीतू और अमित,
रहते तो बहुत दूर हैं,
पर दिल के बहुत पास हैं,
इनसे अब बातें कम होती हैं,
इतनी कम
कि कई बार इनकी
आवाजें याद करके
दिल भर आता है।

दिन की आपाधापी में
संदेश अधूरे रह जाते हैं,
और हम—
एक-दूसरे से
थोड़ा पीछे छूट जाते हैं।

फिर भी
दर्द जब भीतर चुभता है,
तो सबसे पहले
इन्हीं के नाम उभरते हैं।
दूरी ने संवाद छीना है,
अपनापन नहीं।

रजनी—
मेरे हर बिखरे दिन की
जुड़ी हुई रात।
जहाँ आँसू भी
इजाज़त लेकर गिरते हैं,
और ख़ामोशी भी
समझी जाती है।
हर रिश्ते का 
मान-सम्मान
इनको आता है,
थकती और रुकती है नहीं,
चेहरा हमेशा मुस्काता है।

अनायरा, पावनी
और रणविजय—
मेरी थकान की दवा,
मेरी हर बिन कही प्रार्थना का -
सुना गया उत्तर।
इनकी एक हँसी
जीवन को फिर से
संभालने लायक बना देती है।

रिश्ते इसलिए ज़रूरी नहीं
कि दुनिया क्या कहेगी,
रिश्ते इसलिए ज़रूरी हैं
कि इनके बिना
हम खुद को
खो देते हैं।

अगर कभी टूट जाओ
तो याद रखना—
दुनिया नहीं,
रिश्ते तुम्हें
फिर से जोड़ते हैं।

दुनिया जीत भी लो तो क्या,
अगर लौटने को
अपना घर न हो—
रिश्ते वही हैं
जो हार में भी
आपको इंसान बनाए रखते हैं।

अनिल आर्य...

Monday, 2 February 2026

रूटीन

रूटीन

सुबह अलार्म नहीं,
मोबाइल जगाता है,
नींद से पहले भी
स्क्रीन ही सुलाता है।

हाथों में दुनिया है,
पर आँखों में थकान,
कैलेंडर भरा पड़ा है,
खाली रह गया इंसान।

चाय के संग खबरें नहीं,
अब नोटिफिकेशन हैं,
हर पल कुछ छूट रहा है—
यही हमारी पहचान है।

दौड़ है, मगर मंज़िल नहीं,
बातें हैं, पर संवाद नहीं,
भीड़ में रहते हैं सब,
फिर भी कोई साथ नहीं।

हँसी इमोजी में सिमट गई,
आँसू साइलेंट मोड में हैं,
भावनाएँ अपडेट चाहती हैं,
पर रिश्ते ऑफलाइन मोड में हैं।

फिर भी उम्मीद ज़िंदा है,
हर थके हुए इंसान में,
एक दिन वक़्त रुकेगा,
दिल लौटेगा पहचान में।

अनिल आर्य...

माहरा कुणबा

मामा नाचै नागिन बनके, साथ में बाजें ढ़ोल
मामी नाचे स्टेज तोड़ दे, होरी सें कती गोल।

मामा का लड़का-दूल्हे का साथी,
नाचे ईसा जनूँ छोटा हाथी।
शंगरी हांडे मामा की छोरी,
शौक-शौक में बौली होरी।

चाचा वैसे “सीधा-सादा”,
जेब में रखते हाफ़।
चाची चाह में हाथ तुडारी,
रील बनावै साफ़।

जीजा जी की ठसक निराली,
बातों करते तोल।
कदम-कदम पर समझदारी,
समझें रिश्तों का मोल।

बेबे माहरी समझदार से,
करे अकल की बात,
पढ़ने में भी नंबर वन,
संस्कार भी रहते साथ।

भाई खड़ा हर मोड़ पे,
ढाल बने हर हाल।
भाभी हँसी सहेज के रखै,
सभी का रखती ख्याल।

फूफा जी ज्ञानी भारी,
हर मुद्दे का हल दें गोल।
बुआ पे बात आए जब,
बदल जावै पूरा रोल।

बुआ का छोटला सनी देओल,
दारू में करे फ़ुल रोल,
दिल का छोरा पूरा साफ,
गलती करदयो उसकी माफ़।

साला हीरो चश्मे काले,
हर फोटो में स्टाइल।
साली बोले “सिंपल हूँ”,
फ़िल्टर बदले हर माइल।

मौसी माहरी पोर्टेबल से,
मौसा पूरा हाथी,
कुनबा माहरा घणा से बढ़िया,
सुःख दुःख के सब साथी।

दादी की डांट में कानून,
दादा मौन कमांड।
इन्हीं दोनों के डर से,
सीधा चलता खानदान।

चुटकी ली है जान के थोड़ी,
नियत बिल्कुल गोल।
जिसने दिल पे ले लिया,
उसका नंबर—नेक्स्ट रोल 😈

अनिल आर्य...

Sunday, 1 February 2026

शादी के नखरे

शादी में सबके नखरे, 
और दिखावा भारी,
घर-परिवार वाले हाँगा लारे,
कार रे पूरी तैयारी,
कुर्सी हिली, बात बढ़ी,
रिश्तेदारी में जाग पड़ी।

ताऊ बोले— मान ना राखी,
ताई ने अपनी डिंग हांकी,
चाचा बोले— व्यवस्था ना सीखी,
चाची की थाली आधी फीकी।

मामा बोले— स्वागत है ठंडा,
मामी बोली— ना चले यो फंडा,
फूफा बोले— दाल में पानी,
फूफी बोली— ये क्या कहानी!

बुआ रूठी— फोटो कट गई,
मौसी बोली— चाय फट गई,
बड़ी मम्मी का सूट ना सिला,
छोटी मम्मी को बिस्कुट ना मिला।

जीजा का ब्रश ना पाया,
साली हँसती - हिलती काया,
साला लेट करता हर काम,
सालन नहीं करती आराम।

दूल्हा बैठा सेहरा ओढ़े,
दुल्हन लहंगा संभाले खड़ी,
घर वाले गिनते करते जाएँ—
किसकी भौंह कहाँ चढ़ी।

शादी ना रह गई अब संस्कार,
पूरा बन गया मेगा-प्रचार,
नखरे कम हों, हँसी हो ज़्यादा—
कोई न कोई रूठे यह करो इरादा।

अनिल आर्य...

हुक्का

खेतों का राजा हुक्का,
हुक्का पंचायत की शान,
ज्ञान की चर्चा हुक्के पे होती,
हुक्का हरियाणे की पहचान।

आज-काल का यूथ बोले-
सूण के गाणे जोड़ तोड़ के,
अक भाई:

मूछयाँ ने मरोड़ के,
सांस ने जोड़ के,
छाती ने फूला के,
पेट ने भींच के,
मार घूँट खींच के,
तू मार घूँट खींच के...

और यो so कॉल्ड यूथ ईसा से,
जवान यो हुया नहीं,
चेहरे पे बुढ़ापा दीखे से,
और घर के दो काम बतादें,
ये करती हाना जीक्खें से।

अर चार कदम तेज चाल लें,
सांस कसूती फूल ज्या से,
गलती ते जै दौड़ना पड़ज्या,
ये सांस भी भूलज्याँ सें।

फेर आँख खूलें हॉस्पिटल में,
जीवन की इनकी आस नहीं,
खूब पीवें हुक्का महफ़िल में,
अर इन ने दारू ते आती बांस नहीं।

अनिल आर्य..

Saturday, 31 January 2026

चाय

आँखें मसलती चाय आई ,
बोली— मैं हूँ सुकून की रानी।
दो घूँट में सब जग जाएँ,
ऐसी मेरी कहानी।

दारू आई हँसती-डोलती,
कह गई दो खरी-खोटी,
बातें सच की ऐसी मारी,
ख़ामोशी भी हो गई छोटी।

छाती में मार के मुक्का,
मूंछ मरोड़ के बोला हुक्का,
मर्द बनो, मारो दो घूँट,
तुम्हे ऐटिटूड करता ये सूट,
चाय-दारू हुई खामोश,
हुक्के ने ली महफिल लूट...

फिर क्या था…
कड़वी दारू ख़फ़ा हो गई,
"मीठा" सच बोलकर सो गई,
हुक्का फिलॉसफी में खो गया,
थोड़ा चुप हो गया...

और चाय…
चाय को किसी ने पूछा ही नहीं,
ठंडी होकर बिस्कुट से लड़ गई,
नम्बर वन आने की जिद पे अड़ गईं।

सिसकी लेकर कप से बोली,
जो होनी थी वो होली,
पतीले से कहा,
ये अपमान मुझे नहीं स्वीकार,
चढ़ी टांड पर,
और मुँह छिपाकर,
सो-ली।

हुई सुबह,
सबने ढूँढा, चाय नहीं मिली,
मची चीख-पुकार,
सब-जन बिगड़ गए,
चाय पीने की,
जिद पे अड़ गए।

चाय अंदर से खुश,
पर तैश में आकर,
ऊपर से ही बोली,
हुक्का पी-लो,
मारो ना पेग।

हर कोई गलती माने,
कहे
बिना चाय बिस्तर न छोडूं,
अपना प्रण कभी न तोड़ूँ।
हुक्का हारा - दारू हारी,
अंततः चाय ने बाजी मारी।

नोट: एक चुस्की चाय,
केवल एक चुस्की चाय,
तन में जोश और
रिश्तों में गर्माहट लाए।

अनिल आर्य...

Friday, 30 January 2026

नीलू शर्मा जी

नीलू शर्मा जी
स्नेहमयी-अनुशासित

आज कक्षाएँ वही हैं,
घंटियाँ वही बजती हैं,
पर विद्यालय परिसर में,
एक परिचित सन्नाटा है।

बरसों की वह सहयात्रा,
जहाँ आप विज्ञान पढ़ाती रहीं,
और हम देखते रहे—
कैसे अनुशासन
स्नेह के साथ चल सकता है।

कभी प्रयोगशाला की तैयारी,
कभी परीक्षा की उलझन,
हर मोड़ पर
आपकी स्थिरता
हम सबके लिए भरोसा बनी।

आपके साथ काम करते हुए
यह समझ आया—
अध्यापक होना
सिर्फ पेशा नहीं,
एक सतत साधना है।

आज सेवानिवृति है,
पर यह विदाई नहीं लगती,
क्योंकि जिन मूल्यों को
आपने जिया,
वे इस विद्यालय की
दीवारों में बस चुके हैं।

सहकर्मी के रूप में
आपका साथ
सम्मान की पाठशाला रहा,
और एक वरिष्ठ साथी के रूप में
आपका होना
सौभाग्य।

नीलू शर्मा जी,
यह प्रणाम
केवल एक अध्यापक का नहीं,
एक अनुज का भी है—
जो आपकी शांत,
गरिमामयी उपस्थिति
हमेशा महसूस करता रहेगा।

आज आपकी कुर्सी भले खाली हो,
पर मार्गदर्शन अब भी साथ चलता रहेगा।
विद्यालय आपको विदा नहीं करता,
आपको अपने संस्कारों में सँजो लेता है।

अनिल आर्य...
🙏🏻 सादर नमन 🙏🏻

Gen-Z : प्यार इंस्टॉल, वफ़ा ट्रायल

Gen-Z : प्यार इंस्टॉल, वफ़ा ट्रायल

Gen-Z का प्यार
दिल में नहीं रहता,
फोन की मेमोरी में रहता है—
स्टोरेज फुल हुई
तो रिश्ता डिलीट।

इन्हें इश्क़ चाहिए
No effort,
वफ़ा भी चाहिए इतनी
की Password मिल जाए बस,
और ब्रेकअप चाहिए ऐसे
“कि तू बहुत अच्छा है,
बस मेरे टाइप का नहीं।”

ये लोग कहते हैं—
“हम deep हैं,”
और दो लाइन पढ़ते ही
बोर हो जाते हैं।

इनका दर्द भी
रील में होता है,
और हीलिंग
DP बदलने से।

लड़का बोले—
“मैं टॉक्सिक नहीं हूँ,”
पर हर तीस मिनट में
Online status चेक करता है।

लड़की बोले—
“मुझे space चाहिए,”
और space में
चार लोग already घूम रहे होते हैं।

Gen-Z का प्यार
इतना fragile है
कि एक
“OK”
पूरे रिश्ते को
ICU में डाल देता है।

इन्हें वफ़ा से डर लगता है,
क्योंकि वफ़ा में
सब्र चाहिए—
और सब्र
इनके syllabus में नहीं।

ये कहते हैं—
“Commitment overrated है,”
क्योंकि commitment में
भागने का ऑप्शन नहीं होता।

इनका forever
बस इतना होता है—
“जब तक कोई बेहतर न मिल जाए।”

और फिर ये पूछते हैं—
“आजकल प्यार टिकता क्यों नहीं?”
क्योंकि जिसने
इंतज़ार करना नहीं सीखा,
वो रिश्ता निभाने की
हिम्मत कहाँ से लाए?

इसलिए व्यंग्य की कटार
अब सीधा वार करती है—
रील में पला प्यार
असल ज़िंदगी में
पहली ज़िम्मेदारी पर
दम तोड़ देता है।

अनिल आर्य...

क्या होगा इनका

कक्षा में सिलेबस, दिमाग़ में PUBG

आज का छात्र
कक्षा में बैठा है,
पर दिमाग़—
PUBG के लैंडिंग ज़ोन में।

हाज़िरी लगी है स्कूल में,
पर मन
Free Fire की लॉबी में।

टीचर बोले— “ध्यान दो,”
और उँगली बोले—
“बस एक रील और।”

उसे इतिहास चाहिए—
जिसमें युद्ध हो,
पर किताब वाला नहीं,
मोबाइल वाला।

उसे गणित मुश्किल लगता है,
पर डैमेज परसेंट
पलक झपकते निकाल लेता है।

नेता बोले—
“युवा देश की ताक़त हैं,”
और उसी युवा को
नेट पैक देकर
चुप करा देता है।

नीति आई—
“डिजिटल शिक्षा,”
छात्र ने समझा—
“अब गेमिंग भी
रोज़गार है।”

माँ पूछे—
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”
छात्र बोले—
“टॉप फाइव में आया हूँ।”
माँ खुश—
पता बाद में चलता है,
वो गेम में था।

और बीच में अध्यापक—
जो आज भी
चॉक से
भविष्य लिख रहा है,
जबकि छात्र
स्क्रीन पर
जीवन मिटा रहा है।

वो कहता है—
“गेम खेलो,
पर ज़िंदगी मत हारो।”

पर कौन सुने—
जब क्लास साइलेंट में है,
और मोबाइल गेम
फुल वॉल्यूम पर।

क्योंकि आज—
छात्र ऑनलाइन है,
नेता पंच-लाइन मार रहा है,
और अध्यापक…
अब भी
देश को
री-स्टार्ट करने की
कोशिश में है।

अनिल आर्य...

Thursday, 29 January 2026

सादगी हो तो ऐसी...

दहेज़ नहीं...

दूल्हा भी कमाता है,
दुल्हन भी कमाती है,
दोनों कहते हैं—
“अब पिता का सहारा हम बनेंगे।”
ज़रूर बनेंगे…
बस पहले शॉपिंग पूरी हो जाए।

दूल्हा बोला— “सादगी से करेंगे विवाह”
फिर निकली सूची—
पाँच शेरवानी,
सात जूते,
तीन घड़ियाँ—
एक बारात के लिए,
बाक़ी रील के लिए।

हाँ DJ थोड़ा hi-fi चाहिए,
लाइट ज़रा-सी dim चाहिए,
Loud म्यूज़िक हो,
शादी नहीं—फिल्म चाहिए।

रथ हो युद्ध वाला,
घोड़ा सफ़ेद शुद्ध वाला,
तलवार हो शिवाजी की,
घोड़ा चले स्लो-मोशन में,
ड्रोन ऊपर से वार करे,
सात फेरे नहीं—
रील के लिए
सात एंगल तैयार करे।

दुल्हन बोली— “मेकअप तो नैचुरल रहेगा”
फिर आया आर्टिस्ट—
चेहरा नहीं,
पूरी पेंटिंग बनाई,
माँ पहचान न पाईं,
पड़ोसन ने पूछा—
“बेटी विदेश से आई क्या?”

हल्दी—थी पीली,
पर खर्च—हरा डॉलर वाला।
मेहँदी—हाथ में कम,
इंस्टाग्राम पर ज़्यादा चढ़ी।

फूल असली नहीं—
पर बिल बिल्कुल असली।
डेकोरेशन ऐसी—
कि मंडप नहीं,
म्यूज़ियम लगे।

दूल्हा-दुल्हन बोले—
“पैसा मायने नहीं रखता”
और पिता जी ने
चुपचाप ज़मीन के काग़ज़
अलमारी से बाहर रख दिए,
और रिटायर्मेंट का सोचना बंद कर दिया।

दुल्हन ने साफ कहा—
“दहेज़ नहीं लूँगी।”
सबने राहत की साँस ली।
फिर जब शादी की लिस्ट आई—
तो लगा,
दहेज़ ने बस
कपड़े बदल लिए हैं।

फर्नीचर मत भेजना,
बस टीवी बड़ा दे देना,
दहेज़ का नाम मत लेना—
बस कपड़ों में कमी न हो,
और गहनों में
कंजूसी न झलके।

सोने का रेट ऐसा—
कि ज्वेलर नहीं,
कार्डियोलॉजिस्ट चाहिए,
एक हार देखा—
पिता जी की धड़कन
डाउन पेमेंट माँगने लगी,
लड़की वाले पिता की
रिटायरमेंट दो साल पीछे।

उधर लड़के वाले पिता—
कहते हैं, “हमें कुछ नहीं चाहिए,”
और भीतर ही भीतर
पेंशन से
शगुन की गणना करते हैं।

रिश्तेदार दोनों तरफ—
सम्मान के नाम पर खर्च,
प्रतिष्ठा के नाम पर तुलना।
ना लेने का वादा,
ना कम करने की हिम्मत।

बेटी कहती है—
“मैं आत्मनिर्भर हूँ।”
बेटा कहता है—
“मैं सब संभाल लूँगा।”

और तब-
जब नव-दंपति कहते हैं,
“अब सब हम संभाल लेंगे,”
दोनों पिता
एक-दूसरे को देख
बस मुस्करा देते हैं।

ना ताना,
ना शिकायत—
बस अनुभव की हँसी।

क्योंकि वे जानते हैं—
इस शादी में
दहेज़ नहीं गया है,
गए हैं बस
रिटायरमेंट के कुछ साल।

अनिल आर्य...

Tuesday, 27 January 2026

मेरा शिव

सबका मालिक पालनहारा,

सृजन करता—करता संहारा,

सृष्टि के कण-कण में वो है,

मेरे पल क्षण-क्षण में वो है।


सृष्टि पालक, नियंता है शिव,

सृजक–विध्वंसक, अभियंता है शिव,

आस - उम्मीद, विश्वास है शिव,

मेरी प्राण-वायु, श्वास है शिव।


वो ही अनादि, वो ही अनंता,

साधु है वो, वो ही संता,

भाग्य लिखता, मेल मिलाता,

सृष्टि के हर, खेल रचाता।


न रूप उसका, न ही नाम विशेषा,

न कोई आदि, न कोई शेषा,

जो शून्य में पूर्ण समाया,

वही स्वयंभू-शिव कहलाया।


पकड़े तेरा-मेरा सबका हाथ,

तो मैं कहता, जगन्नाथ।

डूबे जब जीवन की हर बात,

याद है आता जगन्नाथ।


टूटे जब विश्वास की डोर,

छूटे अपने, छूटे छोर,

तू ही अनाथों का है नाथ,

जगन्नाथ, जगन्नाथ।


हर आदियोगी में, महादेव है,

नहीं किसी भोगी में, महादेव है,

हैं भांग-धतूरा जो कोई खाते,

महादेव को कभी न पाते।


नहीं कश खींचे महादेव,

अंतर का विष खींचे महादेव,

जगत का सारा, संताप-ताप,

अमृत से सीँचे महादेव।


जब आकर दस्तक - देता काल,

याद करता मैं महाकाल,

काल का भी बन जाता काल,

टाल देता - मृत्यु अकाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


भय जब मन में, भरता जाल,

स्मरण करता मैं महाकाल,

भस्म कर देते सब विकाल,

टूटे बंधन, मिटे जंजाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


अंधियारा हो या भूचाल,

साथ खड़े रहते महाकाल,

श्वास-श्वास में उनका भाल,

रक्षक बनते, बनते ढाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


शरण जो आया इनके लाल,

क्या बिगाड़े उनका काल,

भक्त के संग खड़े महाकाल,

काल के आगे अड़े महाकाल,

जय महाकाल, जय महाकाल।


अधर्म बढ़े, आतंकी पे - हो शक्ति,

तब मैं रूद्र रूप की - करता भक्ति,

मस्तक विभूति, आँखें लाल,

रूद्र-रूप से डरता-काल।


जब मर्यादा, लांघे अभिमान,

जब रोए धरती, रोए इंसान,

तांडव जागे, बजे कराल,

कंपे सिंहासन, कांपे काल।


डमरू नाद में न्याय पुकार,

भस्म हो जाए पापाचार,

त्रिनेत्र खुलते ही-तत्क्षण काल,

मरते दैत्य-असुर, झुकते सब भाल।


रूद्र में शिव और शिव में शांत,

विष में अमृत और में अंध में कांत,

जो रूद्र समझे, जाने शिव का मर्म,

वही पाए मोक्ष, जाने क्या है धर्म।


रूद्र न क्रोध, धर्म का बल,

संहार नहीं—नव सृजन-फल,

जहाँ अटक जाए समय की चाल,

वहीं खड़े हों रूद्र महाकाल।


जब फँस जाओ - याद करो तुम,

कान में हल फिर बोले बाबा।

तब मैं कहता-भोले बाबा, 

भोले बाबा, भोले बाबा।


भूत-भविष्य -बहुत भयंकर,

तब मैं याद करूँ शिव शंकर,

डर के साए छँटने लगते,

मन के बंधन कटने लगते।


कंकर-कंकर में है शंकर,

युद्ध के बंकर में है शंकर,

बिल्ली की म्याऊँ में शंकर,

मैं तो हर पल गाऊँ शंकर।


सन्नाटे की साँस में शंकर,

शोर भरे हर श्वास में शंकर,

न रोने की सिसकी में शंकर,

न रम की बोतल व्हिस्की में शंकर।


ज़ब राख हो जाए-हर अभिमान,

तब चरणों में-टिक जाए प्राण।

तब न नाम रहे, न रूप रहे,

याद शंकर का स्वरूप रहे।


जिस पल टूटे -सांसों का धागा,

होंठों पर हो—भोले बाबा,

मेरे शंकर बाबा,

भोले बाबा, भोले बाबा, भोले बाबा।


मैं कहता शिव और स्वयंभू,

हर-हर शम्भू, हर-हर शम्भू,

जो भी उसका नाम है ध्याता,

सो जीते जी मोक्ष को पाता।


न कोई आकार, न रंग-रेखा,

न जन्म-मरण का कोई लेखा,

न दीप-नैवैध, न पूजा-पाठा,

वो तो चेतन -मौन प्रभाता।


न वो मंदिर, न ही मस्जिद,

न ही काशी उसकी सरहद,

जहाँ विचार थक कर -रुक जाएँ,

वहीं पर शिव सामने आएँ।


अंबर में और बादल में शिव,

श्याने में और पागल में शिव,

लय में और ताल में है शिव,

बाल में, बाल की खाल में है शिव।


वो ही रुद्र, वो भोलेनाथ,

वो त्रिनेत्रधारी, गौरी के साथ,

जब “मैं” गलकर “तू” हो जाए,

तभी शिव का सत्य- बतलाए।


शिव ही सत्य, सुन्दर भी शिव,

काशी-काबा, मंदिर भी शिव,

ब्रह्मा है शिव, विष्णु भी शिव,

क्रांति है शिव, सहिष्णु भी शिव।


शिव बुद्ध में, दिगम्बर है शिव,

धरती और समंदर है शिव,

बाहर भी शिव, अंदर है शिव,

मन-मौजी मस्त -कलंदर है शिव।


मंगल में शिव, शिव में मंगल,

जंगल में शिव, शिव में जंगल,

गंगा में शिव, शिव में गंगा,

जपो नमः शिवाय-हो मन चंगा।


भस्म में शिव, शिव में-भस्म समाई

शिव में हर एक- रस्म समाई,,

मैं तो करता शिव की कमाई,

तुम भी करलो मेरे भाई।


शिव धूप में भी, छाँव है शिव,

जल में भी, और नावं है शिव,

नींद में सपना, सपने में शिव,

पराये और हर अपने में शिव।


डमरू में शिव, शिव में नाद,

मौन में शिव, शिव संवाद,

शून्य में शिव, शिव आकार,

अंत में शिव, शिव विस्तार।


शिव राह भी है, राहगीर भी शिव है,

हर एक निर्भय-वीर भी शिव है,

मंज़िल का पत्थर भी शिव है,

मेरा तो अब घर भी शिव है


साँप में और रस्सी में शिव है,

दूध दही लस्सी में शिव है,

खाने और पीने में शिव है 

और जीवन जीने में शिव है।


जीवन में लय - लय में शिव है,

जीवन की हर शय में शिव है,

"नेता बोले वोट में शिव है,

वोटर के लिए नोट में शिव है" ।


नागा बाबा—अघोरी में शिव है,

टिंडा, लौकी—तौरी में शिव है,

चीनी और नमक में शिव है,

आलू की बोरी में शिव है।


दलिये, खिचड़ी- भात में शिव है,

मेरी तो हर बात में शिव है,

ज्ञान-विज्ञान में शिव समाया,

प्रैक्टिकल-थ्योरी में शिव है।


चूल्हे की आग में शिव है,

रोटी की फुलौरी में शिव है,

हाट-बाज़ार, ठेले-पटरी में शिव,

माता की लोरी में शिव है।


राजा बोले—तख़्त में शिव है,

फकीर कहे—कंठी में शिव है,

ढोलक बोले, हँसे मंजीरा,

नंदी में- गौरी में शिव है।


जाकर ढूँढा,

जगन्नाथ, पूरी में,

आँख खुली तो मैंने जाना,

हलवे और पूरी में शिव है।


देखे जो हँसकर, पाए वही,

ढूँढे जो रोकर, दूर ही शिव है,

हर-हर बोले जो हँस करके,

उसकी हँसखोरी में शिव है।


सच्ची रिश्तेदारी में शिव है,

अपनी पत्नी प्यारी में शिव है,

नहीं पराई नारी में शिव है,

न ही अत्याचारी में शिव है।


बात जो समझो, सार में शिव है,

माँ - बापू के प्यार में शिव है,

नहीं तानों की तलवार में शिव है,

न रुखे व्यवहार में शिव है।


साँप में और रस्सी में शिव है,

दूध, दही और लस्सी में शिव है,

खाने में भी, पीने में शिव है,

और जीवन को जीने में शिव है।


जीवन में लय — उस लय में शिव है,

हर एक “शय” की शय में शिव है,

न पापी -आततायी में शिव है,

तेरी चाची–ताई में शिव है। 


भूखे की थाली में शिव है,

प्यासे की प्याली में शिव है,

नहीं डिग्री जाली में शिव है,

न बुरे शब्द-गाली में शिव है।


मेहनत की रोटी सादी में शिव है,

संतोष की नींद आधी में शिव है,

नहीं बुरी सोच वाले में शिव है,

न ही पाप कमाई गाढ़ी में शिव है।


हर एक जिम्मेदारी में शिव है,

हर गृहस्थ नर-नारी में शिव है,

जो भागा जिम्मेदारी से,

क्या उस भगवाधारी में शिव है ???


न झूठ की हिस्सेदारी में शिव है।

न स्वार्थ की होशियारी में शिव है,

जहाँ हक़ छीन कर बजें तालियाँ,

न उस झूठी गद्दारी में शिव है।


जहाँ भूखा देख कर मुँह मोड़ लें,

टूटे हुए को और तोड़ लें,

जहाँ करुणा बोझ लगे दिल को,

न उस दुनियादारी में शिव है।


जहाँ रिश्ते लाभ से जोड़े जाएँ,

स्वार्थो से हित मरोड़े जाएँ,

जहाँ भक्ति भी डर फैलाने को,

न उस पूजा विधि तैयारी में शिव है।


घर के आँगन, तुलसी थारी में शिव है,

बच्चे की किलकारी में शिव है,

माँ की डाँट, पिता की छाया,

हर रिश्ते की जिम्मेदारी में शिव है।


पसीने की बूँद, किसान की मेहनत,

हल की धार, क्यारी में शिव है,

सड़क किनारे बैठा साधु,

उसकी कुत्ते से यारी में शिव है।


फाइलों में दबा हो सच अगर,

तब न्याय की तैयारी में शिव है,

कोर्ट-कचहरी, कलम-काग़ज़,

क्या कानून की लाचारी में शिव है ???


हार के बाद जो हिम्मत जगे,

फिर उठने की तैयारी में शिव है,

टूटे सपने, सिले इरादे,

फिर से शुरू करने की बारी में शिव है।


जो कह दे—सब तेरा ही है,

उसकी दातारी में शिव है,

न माँगे, न तौले, बस बाँटे,

ऐसी हर यारी में शिव है।


सन में शिव है, मून में शिव है,

मेरी तो हर बोन में शिव है।

स्टेटस की भूख, फेम में नहीं,

साइलेंस वाले जोन में शिव है।


रील-लाइक्स, ट्रेंड में नहीं

रियलिटी की वॉइस में शिव है।

शोर भरे क्राउड में नहीं,

इंटरनल की नॉइस में शिव है।


डील और प्रॉफिट गेम में नहीं,

शो-ऑफ, झूठी फेम में नहीं,

गुनगुनाने के गुन में शिव है,

हार्ट की सच्ची धुन में शिव है।


चेयर के रेवोल्यूशन में नहीं,

नेता के एवोल्यूशन में नहीं,

यूनिवर्स के एवोल्यूशन में शिव है,

अर्थ के रेवोल्यूशन में शिव है।


पोस्ट की पोज़िशन में नहीं,

खोखली डेफिनिशन में नहीं,

कॉनशसनेस (चेतना ) की डायमेंशन में शिव है,

जीवन की ट्रांसफॉर्मेशन में शिव है।


डाटा की इंफ्लेशन में नहीं,

फेक की इंफॉर्मेशन में नहीं,

साइलेंस की वाइब्रेशन में शिव है,

अंतर की कैलिब्रेशन में शिव है।


लाइक्स की कंपटीशन में नहीं,

वायरल की ऑब्सेशन में नहीं,

सेल्फ की रियलाइजेशन में शिव है,

अहं की एलिमिनेशन में शिव है।


टाइम की रेस के-टेंशन में नहीं,

कल-परसों की -मेंशन में नहीं,

नाउ की प्रेज़ेंस में शिव है,

श्वास की एसेंस में शिव है।


शोर में भी शिव, मौन में भी शिव,

भीड़ में भी शिव, नीड में भी शिव,

नाम में शिव, धाम में शिव,

हर पहचान की पहचान में शिव।


नफ़रत में नहीं बसता है शिव,

आडंबर पे हँसता है शिव,

प्रेम की सच्ची बस्ती में शिव,

करुणा की हर कश्ती में शिव।


डर से नहीं चलता है शिव,

दिखावे में नहीं पलता है शिव,

साहस की शांत मस्ती में शिव,

सत्य की फेर-हस्ती में शिव।


शोर से नहीं गढ़ता है शिव,

झूठ से नहीं बढ़ता है शिव,

मौन की गहरी सृष्टि में शिव,

श्वास की सहज दृष्टि में शिव।


वो शान्ति है, क्रोध भी है शिव,

वो प्रश्न नहीं है, बोध ही है शिव,

जो भीतर की आँख जगाता,

वो निर्गुण ही शिव कहलाता।


मैं कहूँ कैसे, शब्द कहाँ हैं,

वो यहाँ-वहाँ है, सब जगहाँ है,

जो अंतर में दिखता शिव है,

क्या मूर्तियों में बिकता शिव है ???


मंदिर ढूँढे, मस्जिद सजाए,

नफ़रत में झंडे लहराए,

शिव न भाषण, न दंगाई में,

शिव तो मौन की सच्चाई में।


रटता गीता, दिल में द्वेष है,

हाथ में कुरान, ज़ुबाँ पे क्लेश है,

मंदिर ढूँढे पत्थर–माटी में,

पर शिव न मिले तेरी घाटी में।


न हिन्दू में, न मुसलमान में,

न नाम, झंडे या पहचान में,

न भगवा में, न हरी चादर में,

शिव बसता - मानवता के आदर में।


बंधन नहीं - मुक्त है शिव,

क्या मोह माया में लिप्त है शिव ???

हर कोई पूछता, शिव कहाँ है ???

जहाँ मैं मिटूँ, तू भी न रहे-

शिव वहाँ है… मेरा शिव वहाँ है।


अनिल आर्य...

Monday, 26 January 2026

मैं वैरागी वीतरागी...

मैं वैरागी वीतरागी

मैं वैरागी वीतरागी…
वैराग सही, वीतराग सही,
सन्मार्ग यही, शिव-तत्व यही,
उस चाल चलो, उस रंग ढलो,
जो पहुँचे हर को,
बदले मन के स्वर को।

मैं वैरागी वीतरागी…
नयन खुले, पर दृश्य शून्य,
चलता हूँ, पर राह नहीं,
ठहराव ही मेरा गंतव्य;
तन है नश्वर—जानो ईश्वर,
मोक्ष मन में उतरे, स्वर में निखरे,
गूँजे हर स्वर, हर-हर; हर-हर।

मैं वैरागी वीतरागी…
न चाह का शोर भीतर,
न भय की कोई परछाईं,
जो मिला, वह अर्पण हुआ,
जो छूटा, वह भी मेरा ही था;
मौन की धड़कन सुनता हूँ,
जहाँ शब्द स्वयं गल जाते हैं;
मैं सत्य वहाँ बुनता हूँ।

मैं वैरागी वीतरागी…
राग जला और द्वेष गला,
मोह को जल में विसर्जित किया,
जब “मैं” छूटा धीरे-धीरे,
अनंत ने मुझको थाम लिया;
न तृष्णा की अग्नि शेष रही,
न विरक्ति का कोई दंभ बचा;
तब मन ने नव संसार रचा।

मैं वैरागी वीतरागी…
समत्व की शांत धूप तले,
अंतर में हुई रौशनी उजली;
न त्याग का बोझ रहा कंधों पर,
न भोग की छाया मन पर टिकती —
मैं मुक्त हूँ…
क्योंकि अब,
उपेक्षा की परवाह नहीं,
अपेक्षा नहीं और चाह नहीं,
है यही राह सही, है यही राह सही...
मैं वैरागी वीतरागी… 

अनिल आर्य...

Sunday, 25 January 2026

26 जनवरी प्रथम त्यौहार

26 जनवरी - स्वराज का सिंहनाद

26 जनवरी कोई तारीख़ नहीं,
जन-स्वराज का सिंहनाद है।
मुकुट नहीं, सिंहासन नहीं,
भारत का स्वर-संविधान का नाद है।

स्याही नहीं थी, शपथ थी वह,
जिससे राष्ट्र का रूप गढ़ा।
अक्षरों में भविष्य धड़का,
भारत गणतंत्र बनकर हुआ खड़ा।

राजा नहीं, विधान यहाँ,
जन-इच्छा सर्वोच्च स्वर है।
न्याय, समता, बंधुत्व-
हर नागरिक का अधिकार प्रखर है।

सीमा पर अडिग प्रहरी बोले-
“संविधान मेरी तलवार है।”
हल थामे किसान कहे-
“यही मेरी धरती का आधार है।”

नारी मस्तक ऊँचा उठाए,
सम्मान यहाँ संस्कार बने।
शिक्षा जब शस्त्र बने हाथों में,
तब भारत नव-निर्माण रचे।

तिरंगा केवल ध्वज नहीं,
यह त्याग, तपस्या की गाथा है।
हर रंग में इतिहास जगा,
हर रेशा राष्ट्र की भाषा है।

26 जनवरी चेताए हमको-
स्वतंत्रता उपहार नहीं।
संविधान की रक्षा करना,
हर नागरिक रखे व्यवहार सही।

आओ, फिर प्रतिज्ञा दोहराएँ-
कर्तव्य को सिंहासन दें।
भारत तभी विश्व-नायक हो,
जब कर्म को ही शासन दें।

26 जनवरी-
एक दिवस नहीं, उद्घोष है।
लोकतंत्र की धड़कन,
भारत का आत्म-घोष है। 

अनिल आर्य...

Monday, 19 January 2026

अमित + रीतू = अमृत

अमित व रीतू — बड़े भाई का आशीर्वचन
(शुभ विवाह | 4 फ़रवरी)

कुछ क्षण
कहे नहीं जाते,
वे मन में उतरकर
आशीर्वाद बनते हैं।
आज
मेरे लिए
भी ऐसा ही क्षण है

अमित,
तुम्हें समय के साथ
जिम्मेदारी में
स्थिर होते देखा है—
शांत,
पर दृढ़।

रीतू,
यह घर
तुम्हारे स्वभाव से
और समृद्ध हो—
तुम्हारी समझ से
संवाद गहरे हों,
तुम्हारी शांति से
दिन सहज बनें,
और तुम्हारी उपस्थिति में
हर रिश्ता
अपनी जगह पाए।

यह विवाह
केवल रस्म नहीं,
जीवन को
साथ सँभालने का
सचेत संकल्प है।

अमित की दृढ़ता
और रीतू की सौम्यता
जब एक होंगी,
तो जीवन स्वयं
संतुलन पाएगा-
और हर किसी के 
जीवन से विष निकाल,
अमृत ही बसाएगा।

एक बड़े भाई का
आशीर्वाद है-
तुम्हारा साथ,
तुम्हारा रिश्ता
सिर्फ शब्दों से नहीं,
निभाने से पहचाना जाएगा।

आने वाला समय
सब कुछ बदलेगा,
पर विश्वास कभी न बदले;
जीवन
कठिन हो भी कभी,
पर एक-दूसरे का हाथ
कभी न छूटे।

ईश्वर करे—
तुम्हारा दांपत्य
शोर से दूर,
सार्थकता में गहरा
और संतोष में
सदैव स्थिर रहे।
अमित और रीतू,
सुखी रहो—
आज भी,
और हर आने वाले कल में।

अनिल आर्य...

ऋतुयोगी

रीतू ✦ योगी — बड़े भाई का आशीर्वाद 🌸
(शुभ विवाह | 3 फ़रवरी 2026)

आज …
समय भी ठहर गया है …
और यह क्षण …
धरती और आकाश के बीच …
इस पवित्र बेला का साक्षी बन गया है …

तुम दोनों को एक-साथ देखकर …
आज मैं यह जान गया हूँ …
कि प्रेम का यह बंधन …
सिर्फ़ शब्दों का नहीं …
बल्कि आत्मा के गहन स्वर का है …

रीतू …
तुम्हारी मृदुता …
जैसे सर्दियों की हल्की धूप …
हर दिन को गर्म करती है …
और हर रिश्ते को …
सुकून देती है …

योगी …
तुम्हारी स्थिरता …
जैसे पर्वत की नींव …
हर कदम को सहारा देती है …
और आने वाली...
हर सर्द हवा से,
दीवार बनकर...
परिवार की रक्षा करती है …

यह मिलन …
केवल फेरे मात्र का नहीं …
यह समझ, धैर्य और विश्वास का
गहन वचन है …
जो शब्दों से नहीं,
केवल आत्मा की गूँज से सुना जाता है …

जहाँ मतभेद आए …
वहाँ भी शांति बनी रहे …
जहाँ थकान हो …
वहाँ भी धैर्य बना रहे …
प्रेम सदैव इस बंधन का,
आधार रहे...
सूर्य सा रौशन,
पर्वत सा स्थिर...

ईश्वर करे …
तुम दोनों का यह बंधन …
सदा प्रेम, सम्मान और संतोष से …
प्रकाशमान रहे …
और जीवन के हर क्षण …
एक-दूसरे के लिए
उजले और सुरक्षित हों …

रीतू और योगी …
सदैव सुखी रहो … 

Tuesday, 13 January 2026

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

सूर्य दिशा बदलता है,
और जीवन की चाल बदल जाती है।

जो थमे थे ठंड की जड़ता में,
उनमें फिर से आग जल जाती है।

अंधकार से कह दो-हट जाए,
अब उत्तरायण का द्वार खुला।

मेहनत के दाने पकते हैं,
किसान का स्वप्न साकार फला।

तिल-गुड़ सा बनो जीवन में,
कटुता छोड़ो, मधुर बनो।

जो बीत गया, सो सीख बना,
नए संकल्प से आगे बढ़ो।

आज सूर्य नहीं,
हमारी सोच को ऊपर उठना है।

मकर संक्रांति कहती है—
अब गिरना नहीं, केवल चढ़ना है।

अनिल आर्य...

Monday, 5 January 2026

चुनाव

रजनी

तुम
मेरे मस्तक का शोर नहीं,
हृदय की स्थिरता हो।

जिस दिन ने
तुम्हें जन्म दिया,
उसी ने मुझे
दिशा दी।

तुम्हारे साथ
प्रेम प्रदर्शन नहीं,
निभाने की क्षमता बना।

और
लाल रंग-सा यह प्रेम-
जो दिखावा नहीं करता,
पर हर अँधेरे में
दीपक-सा रोशन रहता है।

आज
यह दिन
तुम्हारा भी है
और मेरे चुनाव का भी।

जन्मदिन की व वर्षगांठ की शुभकामनाएँ, रजनी
सदैव तुम्हारा अनिल आर्य...

15 जनवरी

15 जनवरी — सिर्फ़ तुम

रजनी,
तुम दिन नहीं हो—
तुम वह वजह हो
जिससे दिन मायने रखते हैं।

उसी तारीख़ ने
तुम्हें मुझे दिया,
और मुझे
जीवन को संभालना सिखाया।

सात साल, आठ साल…
गिनती नहीं करता,
क्योंकि हर सुबह
तुम्हारे साथ
पहला ही लगता है।

तुम्हारी चुप्पी
मेरे शोर को शांत कर देती है,
और तुम्हारा विश्वास
मुझे बेहतर इंसान बनाता है।

आज
तुम्हारा जन्मदिन भी है,
और मेरा सबसे सही फ़ैसला भी—
एक ही दिन में
दो जीवन बस गए।

अगर फिर से चुनना हो,
तो भी
बिना सोचे
सिर्फ़ तुम।

दोनों दिन सदैव शुभ हों, रजनी
और
हमेशा के लिए—तुम्हारा, अनिल...

Thursday, 1 January 2026

संकल्प लो...

अब समय है—खुद को सिद्ध करने का

नववर्ष कोई तिथि नहीं है,
यह आत्मा का आह्वान है—
उठो, सँभलो,
अब स्वयं को पहचानने का समय है।

बारहवीं केवल एक कक्षा नहीं,
यह जीवन का पहला मोड़ है—
जहाँ बहाने छूटते हैं,
और जिम्मेदारियाँ नाम लेकर बुलाती हैं।

कल की भूलें बोझ न बनें,
उन्हें सीख बनाकर आगे रखो—
गलती से मत डरना,
पर उसे दोहराने की हिम्मत मत करना।

लेखन में शुद्धता लाओ,
विचारों में अनुशासन भरो—
कलम तुम्हारा चरित्र लिखती है,
और उत्तर-पुस्तिका तुम्हारा भविष्य।

आज की गई मेहनत ही
कल का आत्मविश्वास बनेगी—
याद रखना,
भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है
जो स्वयं का साथ नहीं छोड़ते।

सिर्फ़ उत्तीर्ण नहीं होना है तुम्हें,
उदाहरण बनना है—
घर के लिए गर्व,
समाज के लिए दर्पण,
और देश के लिए आशा।

मैं अंक नहीं माँगता तुमसे,
मैं तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ चाहता हूँ—
ईमानदार प्रयास,
और कभी न झुकने वाला आत्मबल।

चलो, इस नववर्ष संकल्प लें—
पढ़ेंगे, लड़ेंगे, जीतेंगे,
क्योंकि
देश का भविष्य
आज कक्षा में बैठा है।

— अनिल आर्य
(आपका हिन्दी प्राचार्य एवं कक्षा अध्यापक)