Tuesday, 30 December 2025

रजनी - मेरे जीवन का आधार


रजनी - मेरे जीवन का आधार

रजनी,
तुम्हारा नाम
मेरे जीवन में
किसी शोर की तरह नहीं आया,
तुम आईं
जैसे सुबह—
बिना पूछे,
पर सब कुछ बदलती हुई।

जब मेरी तैयारी
नियति की मेज़ पर
ठुकरा दी गई,
और ईमानदारी
सूची में सबसे नीचे रखी गई—
तब तुमने
मुझसे कोई सवाल नहीं किया,
बस मेरा हाथ
थामे रखा।

मैं घर के पास रहना चाहता था,
तुमने मुझे
घर बना कर दे दिया।

अनायरा
तुम्हारे भीतर पल रही थी,
और तुम
अपने भीतर भविष्य गढ़ रही थीं—
किताबों के पन्नों पर,
और धैर्य की सीमाओं पर,
गढ़े नए आयाम तुमने।

रातें जब
मेरी चुप्पी से भर गईं,
तुमने शब्द नहीं माँगे,
बस पास बैठकर
मेरी साँसों को
सामान्य होने दिया।

जब रातें लंबी हुईं,
और रास्ते छोटे पड़ गए,
तुमने दीप बनकर
मेरे भीतर उजाला रखा।

आज
पावनी की सरलता में,
रणविजय की दृढ़ आँखों में,
मैं तुम्हारा मौन त्याग
पहचान लेता हूँ।

रजनी,
प्रेम अगर केवल
मुस्कान और स्पर्श होता,
तो वह इतना गहरा नहीं होता,
न ही होते उसके इतने मायने।

प्रेम वह है—
जो कठिन समय में
एक-दूसरे को
कमज़ोर होने की
अनुमति देता है,
सिर्फ आंखों से
थाम लेता है हाथ,
बनता है पतवार,
खेता है नाव,
सहता है धूप,
बनता है छाँव।

जनवरी 2017
हमारी कहानी की
सिर्फ़ एक माह नहीं,
वह अध्याय है
जब दो अधूरे मन
एक-दूसरे के
उत्तर बन गए।

अगर जीवन
फिर से चुनने को मिले—
तो मैं वही कठिन रास्ता चुनूँगा,
बस शर्त यही होगी
कि उस राह पर
तुम चल रही हो।

पंद्रह जनवरी
मेरे लिए तारीख़ नहीं,
एक प्रतिज्ञा है—
कि हर जन्म में
चुनूँगा तुम्हें ही बस,
भले समय विपरीत हो
भले भाग्य रूठा हो,
भले वो साथ छोटा हो,
पर हो बस तुम्हारे साथ।

तुम मेरी पत्नी नहीं रजनी,
तुम वह प्रार्थना हो
जो मैंने कभी
ज़ोर से नहीं माँगी-
पर जीवन ने
सुन ली।

तुम मेरी संगिनी नहीं रजनी,
तुम मेरी स्थिरता हो,
और अगर जीवन युद्ध है-
तो मेरी सबसे मजबूत ढाल भी तुम हो।

शादी की वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएँ।
मेरे जीवन की
सबसे शांत
और सबसे मजबूत स्त्री,
तुम्हारा साथ
मेरे जीवन का
सबसे सुंदर निर्णय है। 

तुम्हारा अनिल आर्य...

Monday, 29 December 2025

मेरे त्रिलोक

मेरे त्रिलोक

अनायरा अनंत आकाश,
नील विस्तार, उम्मीद की आस—
उसकी दृष्टि में दूर क्षितिज,
जहाँ स्वप्न लेते प्रथम श्वास।

पावनी पानी पाताल,
ज्यों गंगा-जल, शीतल, विशाल—
हर स्पर्श में करुणा बहती,
हर बूँद मिटाए मन का ज्वाल।

रणविजय — शिव रण-भूमि धरा,
कैलाश-सा स्थिर, पर्वत-सा गहरा—
जहाँ संघर्ष भी साधना बने,
और मौन में छुपा हो विजयी पहरा।

मेरा त्रिलोक,
वह धरा भी है, शिखर भी,
आकाश भी है, पाताल भी,
और वह मौन भी,
वाचाल भी।

वह शरारती भी है गंभीर भी,
मन चंचल भी, धरे धीर भी
वह रण भी है, संन्यास भी—
जहाँ पग-पग कर्म की अग्नि जले,
और मन में बसे विश्वास भी।

आशीष हो यह—
आकाश इन्हें दिशा दे सदा,
जल जीवन को निर्मल रखे,
धरती धैर्य और बल दे,
और शिव-तत्त्व सत्य-पथ पर
इनके चरण सदा स्थिर रखे।

 मंगल हो। शुभ हो। कल्याण हो। 

अनिल आर्य...

समय की तीन आवाजें

समय की तीन आवाज़ें
(तीन वक्ताओं का मंच-पाठ)


अनायरा  (उत्साह व गति – आधुनिक स्वर):

बारह बजे!
घड़ी बोली—
नया साल आया!
धूम- धड़ाका,
शहर जागा—
रोशनी नाची,
दुनिया कहे—
आगे बढ़ो! तेज़ बढ़ो!


पावनी (शांत, गम्भीर – परंपरागत स्वर):

सुना मैंने भी यह शोर,
पर चैत्र की हवा
कुछ कहती है और —
धीरे चलो…
जड़ें देखो…
धरती को समझो,
धड़कन को जानो,
परायों को छोडो,
अपनों को पहचानो।


रणविजय (स्थिर, दृढ़ – विवेक की आवाज़):

रुको!
यह लड़ाई सालों की नहीं,
यह टकराव है,
पर—
समय का नहीं,
समझ का,
स्वर दो
भाव को,
भर दो इस,
घाव को।


अनायरा:
दुनिया रुकती नहीं!
कैलेंडर बदलता है,
योजनाएँ बनती हैं—
यही प्रगति है,
खुशहाली है।

पावनी:
पर बिना ऋतु के ज्ञान,
बिना स्मृति के,
प्रगति भी
खोखली हो जाती है,
लय नहीं पाती है।

रणविजय:
एक हाथ में
ग्रेगोरियन की घड़ी हो,
दूसरे में
भारतीय नववर्ष की मिट्टी,
यही संतुलन है!
यही सामंजस्य भी,
और है, स्थायित्व यही।

अनायरा (थोड़ा ठहरकर):
तो नया साल मनाना गलत नहीं?

पावनी:
नहीं—
उत्सव तो जीवन है।

रणविजय:
गलत है
बस अंधानुकरण।

अनायरा:
जनवरी सिखाती है—
दुनिया से जुड़ना!

पावनी:
चैत्र सिखाता है—
प्रकृति से जुड़ना!

रणविजय:
और विवेक सिखाता है—
दोनों को साथ रखना!
मिलकर चलना,
छोड़ो,
आँखे मलना,
जानो,
यही तो है छलना।

तीनों (एक साथ, ऊँचे स्वर में):
न तो यह छोड़ो,
न उसे नकारो!
इसको भी मानो—
उसको भी जानो!
सच पहचानो

अनायरा:
घड़ी बदले—

पावनी:
ऋतु बदले—

रणविजय:
पर चेतना भी बदले!

तीनों (समापन, दृढ़ स्वर में):
तभी हर नववर्ष
तारीख़ नहीं—
संस्कार बनेगा,
संवेदना बनेगा,
सभ्यता बनेगा!
हर मन जगेगा,
तब—
और 
केवल तब—
नव-वर्ष सजेगा।

अनिल आर्य...

Saturday, 27 December 2025

“अपनी जड़ों की पुकार”

“अपनी जड़ों की पुकार”

दीप जलते थे आँगन–आँगन,
पर आज झिलमिल लाइटें आईं—
तारों से ज्यादा चमक रही हैं
पर-छाया, मन पे छाई ।

तीज की हरियाली फीकी,
सावन सूना–सा लगता,
मोबाइल की चमक में खोकर
लोकगीत अब कौन सुनता?

केक काटे, टोपी पहनी,
खुशियाँ उधार सी आईं—
अपनों के पर्व बेमोल हुए,
यह कैसी आँधी छाई?

कारण सरल, पर गहरे हैं—
आकर्षण, बाज़ार, दिखावा,
पश्चिम की चकाचौंध में
अपना सच लगता भटकावा।

मीडिया ने रंग बदले हैं,
विज्ञापन बने संस्कार,
जो बिकता है वही सुहाए,
मूल्य हुए व्यापार।

पर प्रभाव भी चुप नहीं रहते—
रिश्ते धीरे-धीरे छूट रहे,
संस्कृति के दीप बुझ–बुझकर
आत्मा तक टूट रहे।

पर्व नहीं थे केवल उत्सव,
जीवन–बोध सिखाते थे,
माटी, नारी, ऋतु, प्रकृति—
संतुलन समझाते थे।

अंधानुकरण की इस दौड़ में
पहचान धुँधली होती जाए,
जो अपनी जड़ों से कट जाए
वह वृक्ष कहाँ फल पाए?

न विरोध विदेशी खुशियों से,
न नफरत का कोई भाव—
बस इतना हो स्मरण हमें
संभाल रखो अपना स्वभाव।

सीखो जग से, खुला मन रखो,
पर मत छोड़ो अपना घर,
तीज, दीप, होली, सावन—
यही हमारी असली धरोहर।

आओ फिर से पर्व सजाएँ
पर माटी की खुशबू के साथ,
भारत-भविष्य सुरक्षित होगा,
न छूटेगा अपनों का हाथ।

अनिल आर्य...

Thursday, 18 December 2025

मेरा स्कूल

मेरा स्कूल 

मेरा स्कूल प्यारा-प्यारा,
रंग-बिरंगा है यह सारा।
सुबह-सुबह जब मैं जाऊँ,
हँसते-हँसते गीत सुनाऊँ।

घंटी बोली टन-टन-टन,
खुश हो जाता मेरा मन।
मैडम जी जब हमें पढ़ातीं,
कहानी से सपने भर लाती।

क, ख, ग में खेल-खेल,
सीखें हम सब मिलाके मेल।
दोस्तों संग हँसी-ठिठोली,
रिसेस में मिलती सब टोली।

खेल-कूद हों मस्ती वाली,
स्कूल में रहती खुशहाली।
मुझे मेरा स्कूल है भाता,
मुझको अच्छा इंसान बनाता। 

अनायरा...अनिल आर्य