Thursday, 27 November 2025

मोहित–संजना : आर्शीवाद गीत

मोहित–संजना : आर्शीवाद गीत

मोहित का मन मुस्काए,
संजना का रूप लजाए—
दो दिल मिले आज ऐसे,
जैसे सावन झूम के आए।

जीवन की राहें खिलेंगी,
नेह की वेला बहेंगी—
ईश्वर का वरद–हाथ रहे,
हर पल खुशियाँ ही मिलेंगी।

मोहित की आँखें चमकें,
संजना के सपने दमकें—
दोनों के संग आए पल,
जैसे मीठे सुर छलकें।


संजना की प्यारी वानी,
मोहित को लगे निराली—
जैसे चांदनी की धुन हो,
या बंजर में फैली हरियाली।

घर में शुभ पल छाए हों,
दुगुनी खुशियाँ लाए हों—
दोनों के संग ईश्वर बैठे,
वरदानों के फूल खिलाए हों।

 शुभकामनाएँ

सुख के सागर बहते जाएँ,
जल्दी से परिवार पूर्ण हो जाए—
मोहित–संजना संग जीवन में,
रोज़ नया आनंद उतर आए।

घर आँगन मंगल से भर जाए,
स्नेह की ज्योति सदा जलाए—
ईश्वर रखे दोनों का साथ,
हर कदम शुभ पल ही आएँ।

सप्रेम : अनिल आर्य...

Monday, 17 November 2025

जीवन का नया अध्याय : नीलानंद


आनंद-
तेरा स्वभाव ही तेरी पहचान है।
तेरा स्नेह सरल,
तेरी नीयत निर्मल,
और तेरी संगत
हर परिस्थिति में अटूट रही है।

तू वह मित्र है
जिसका साथ विश्वास बनकर चलता है,
जिसकी मुस्कान में अपनापन,
और जिसके शब्दों में
सीधी–सच्ची गर्माहट रहती है।

तेरा मन पारदर्शी है—
इसलिए हर रिश्ता
तेरे पास आकर सुरक्षित महसूस करता है।

अब जब नीलम जीवन में आएगी,
तेरा यही स्नेह
घर का आधार बनेगा,
और तेरी यही स्थिरता
उसे जीवन की सहज डोर थमा देगी।

नीलम—
मणि-सी शांत,
सुगंध-सी सौम्य।
उसकी उपस्थिति
घर को रौशनी से भर देगी।

उसकी विनम्रता
रिश्तों को कोमल बनाती देगी,
और उसकी मधुर दृष्टि
भविष्य को नया आधार देगी।

आनंद की सादगी
और नीलम की शांति—
ये दोनों मिलकर
एक संतुलित, सौभाग्यमय जीवन-पथ रचेंगे।

अनिल के हृदय में
आनंद के लिए सदा एक जगह रही है—
जहाँ भरोसा भी है,
और गर्व भी।

अनिल जानता है—
आनंद जैसा भाई
किस्मत का दिया हुआ दीप है;
सुख में संग,
और दुःख में छाया-सा साथ निभाने वाला है

अब क्या ही कहुँ 
की आनंद को नीलम मिली,
या नीलम को हीरा मिला,
बस यह साथ मोतियों की माला से सुन्दर है।

आज भी अनिल की हर दुआ
आनंद के सिर की बला टालती है,
हौसला बुलंद करती सलाह मेरी,
हर मुश्किल का हक़ निकालती है।


मित्र नव अध्याय यह,
इसमें इतना, धीरे बोलो—
कि प्रेम अपने आप गूंज उठे।
मन से सुनो—
कि समझ की हर गाँठ
स्वतः खुल जाए।

सम्मान को
हर बातचीत का प्रथम पायदान बनाओ,
और धैर्य को
उसका स्थायी दीप—
इन्हीं से घर का राग
सुमधुर रहता है।

विचार भिन्न हों
तो आवाज़ नहीं,
नज़र ऊँची करो—
यही क्षण प्रेम को गहराई देता है।

और इस यात्रा को
एक ही लय में चलाना—
क्योंकि लय ही वह नाव है
जो दो दिलों को
एक धारा पर आगे बढ़ाती है।

ईश्वर करे,
तुम दोनों के जीवन में
केवल सहजता और सुख बसे।
दोनों के हर कदम पर
प्रभु कृपा साथ रहे।
सुख का वृक्ष फैले,
शांति की धारा बहे,
और विश्वास का दीप
सदा तुम्हारा मार्ग आलोकित करे।

एक नवदीप जले,
जो अपनी रौशनी से घर भर दे,
भविष्य सुरक्षित कर दे,
और जीवन को नव-स्वर दे
जिससे तुम दोनों
शांत, स्थिर और सुंदर दिशा में बढ़ते जाओ।


✨ अनिल की ओर से —
आनंद और नीलम को अनंत शुभकामनाएँ।

सप्रेम : अनिल आर्य...

पावन वेला

'शिवा'भवानी-वायु-पुत्र, रण की विजय-सा खिले,
कुआँ-पूजन-दिन अंबर भर, मंगल-स्वर मिला चलें।
निर्मल-सलिल-सा जीवन उसका नित उज्ज्वल रहे,
सत्त्व-दीप्ति से पूर्ण हृदय में परम-श्रेय फलें।

ललित चरण जब स्पर्श करें इस पावन जल-धारा को,
वृद्धि-विजय-समृद्धि नित हो, हो कृपा अपार।
शौर्य, प्रज्ञा, साहस-गौरव—सब गुण जाग्रत हों,
देव-विप्र का आशीष रहे, सदा नूतन-काज संवार।

और उसी दिवस शुभ-क्षण में रीतू–योगी भी संग,
भाग्य-लेख ने रच दी जैसे सौम्य-विवाह-अंग।
व्रत-संयम, स्नेह, विश्वासों का शुभ उन्मेष खिले,
मंगल-मालिका में दोनों के जीवन-पुष्प मिले।

रीतू की मधुर सरलता ही गृह-दीपिका बनी,
योगी की दृढ़ निष्ठा से हो हर राह सुहावनी।
द्विज-स्वर वन्दन, देव-सम्मति—सब उनके साथ रहें,
दंपति-भावी-पंथ सदा सौभाग्य-ज्योति में बहें।

आज २३ नवम्बर के ये दोनों पावन प्रसंग,
मानो शुभ-ऋतु के आँगन में खिलते नील-तरंग।
एक ओर शिवा का पूजन, एक ओर वर-वधु का संग—
दोनों पर वरदहस्त रहे, हो कल्याण, हर रण-विजय-उमंग।

शिवा व रीतू–योगी पर, मंगल-वृष्टि बरसाए,
सौभाग्य-दीप प्रज्वलित हों, हर पथ लक्ष्मी जी आएँ।
सत्त्व-शांति, प्रज्ञा-प्रभा, जीवन-द्वार सजाएँ—
युग-युग तक उनके दिन शुभ हों, देव-कृपा दें, मुस्काएँ।

अनिल आर्य...

मंगल गीत

मंगल-प्रभात गीत” 🌼

शिवा का कूँआ-पूजन तथा रितू–योगी का रिंग-संस्कार

१.
आज दिवाकर दीप्त खड़ा है,
शुभ-क्षण का अभिनंदन करे।
गृह-आँगन में सौभाग्य-सुहागा,
मंगल-ध्वनि सर्वत्र फिरे।

२.
शिवा बालक के कूँआ-पूजन में
जल की ज्योति पवित्र बहे;
तेज, धैर्य, करुणा का संचय—
उसके जीवन-पथ पर रहे।

३.
कोमल चरणों में देव-कृपा हो,
वाक् में सत्य, हृदय में शील;
कर्म बने उसका सर्वोपाय—
धन्य बने वह, धैर्य-अनिल।

४.
रितू–योगी का आज संस्कार,
बंधन नव-उज्ज्वल हो जाए;
विश्वास-सरिता मधुर सुरों में
मन-हंस दोनों को बहाए।

५.
नेत्रों में दीप्ति, वाणी में माधुर्य,
संबंध रहे दृढ़, स्नेहमय;
शुचि संकल्प सदा अविचल हों—
जैसे दीपक नित स्थिरमय।

६.
गृह-परिसर में शांति वसन्ती,
आशीषों की धारा बहे;
धर्म, मर्यादा, प्रीति, समन्वय—
युगल-पथ को शोभित करे।

७.
तेईस नवम्बर—सौभाग्य-क्षण यह,
स्मृति में सदा उजास भरे;
शिवा, रितू, योगी—तीनों पर
मंगलम् देवत्व नित झरे।

उजला सवेरा

🌸 “इस एक दिन का उजाला” 🌸


आज का दिन दो दिशाओं में फूल खिला रहा है—
एक तरफ नन्हे शिवा के लिए जल का आशीष
जो पीढ़ियों की पवित्रता लेकर
उसके माथे पर उतरना चाहता है।

दूसरी तरफ रितू—
जो वर्षों से सँजोया गया निश्चय
अब योगी के हाथों में
अपना सुरक्षित ठिकाना पा रहा है।

कूँआ पूजन की घंटियाँ
और रिंग सेरेमनी की धीमी मुस्कान—
दोनों अलग हैं, पर दोनों
घर में एक ही समय उल्लास भर रही हैं।

शिवा के माथे पर पानी की पहली बूँद
और रितू की उँगली में चमकती अंगूठी—
दोनों संकेत हैं कि भविष्य
अपने सबसे कोमल रूप में
आज इस परिवार पर झुककर आशीष दे रहा है।

ईश्वर करे
शिवा की राहें सरल हों,
उसकी हँसी स्थायी हो,
और उसका आत्मबल,
हर रण में विजय पाए,
शिवा अपने भीतर
निर्भयता, कोमलता और प्रकाश—
तीनों को संतुलित करके बड़ा हो,

और रितू-योगी—
दोनों अपनी-अपनी कमज़ोरियों और सपनों को
खुले मन से एक-दूसरे में सौंपकर
जीवन की नई शुरुआत को
गंभीरता और प्रेम से सँवारें।

अपनी साझा यात्रा में
वह धैर्य, वह भरोसा,
और वह विनम्र प्रेम खोजें
जो किसी भी घर को
वास्तव में घर बनाता है।

आज 23 नवम्बर—
एक तारीख नहीं,
परिवार की स्मृतियों में,
सदैव वह दिन बन कर रहे,
जिसमें शांति, सुःख, समृद्धि,
और भविष्य का देखा हर सपना,
फल फूल कर परिपूर्ण हुआ हो,
जिसका रौपा हुआ पौधा, 
आने वाली पीढ़ीयों को धूप से बचाए।

अनिल आर्य...



Wednesday, 12 November 2025

“पिता और पुत्री— का अखंड अटूट प्रेम”

 “पिता और पुत्री —का अखंड अटूट प्रेम” 


रजनी थी त्रि-रत्नों में प्रियतम — जैसे चाँद सितारों में एक,
रणधीर सिँह की आँखों का नूर — रजनी से था प्रेम विशेष।


दिन बढ़ते, संघर्ष बढ़ा — पर न डगमगाया कभी विश्वास,
पिता का स्नेह बना संबल — अंधकार में भी न खोई आस।


नज़रें हटती नहीं कभी — चिंता जैसे छाँव बनी,
रजनी ज्यों दूर हुई — रणधीर जी की धड़कन जमी।


जब कन्यादान का क्षण आया — मन था गदगद, आँखें नम,
अनिल आर्य को सौंप दिया — जीवन का सबसे सुंदरतम धन।


बिन बात किए जो चैन न पाते — दिन में कई बार पुकार,
हर संवाद में झरता रहता — रजनी पर अपार प्यार।


फिर नन्ही परी जब आई — अनायरा, मुस्कान नई,
रणधीर जी को रजनी से भी प्यारी — बस लगी थी यही।


हर सुबह का पहला सुख अब — वह नन्ही हँसी किलकार,
मानो रजनी का बचपन फिर — गोद में आके पाता प्यार।

खुशियों को लगी नज़र —भाग्य ने फिर खेला दाँव,
पिता की तबियत बिगड़ी — पड़ी फीकी बरगद की छाँव।

फिर वो घड़ी भी आई — जब साथ अचानक छूट गया,
जीवन का सबसे पावन नाता — रजनी से एकदम टूट गया।


क्षण भर में सब उजड़ गया — वो साया, वो शांति, वो छाँव,
मन जीने को न था, पर — लगानी थी पार परिवार की नाँव।


हर पल यादों में डूबी रहीं — हर साँस में रटती नाम,
पिता गए, रजनी के मन — न भाता कोई भी काम।


जो चला गया, वो रूप बदल — फिर जीवन में लौट आया,
रजनी की गोद में मुस्काता — अब शिवा कहलाया।


ऐसा स्नेह कहाँ मिलता है — जो मृत्यु से भी पाता पार,
रजनी के जीवन में अब  — शिवा को मिलता प्यार अपार।


एक दीया ऐसा भी हो — जो इस प्रेम का फैलाए अखंड प्रकाश,
बतलाए जग को पिता का स्नेह— पुत्री का अमर, अटूट, विश्वास।

अनिल आर्य...

रजनी : पूर्णता में

भाग 3 : रजनी — प्रेम की आरती 

(अनायरा, पावनी और अंत में शिवा के साथ प्रेम की पूर्णता)

वो प्रेम नहीं था क्षणिक आकर्षण,
वो था जीवन का निर्मल सत्य,
जहाँ रजनी की आँखों में समर्पण था,
और अनिल की धड़कन में श्रद्धा का व्याकरण।

धीरे-धीरे बढ़े कदम दोनों के,
डरते, सँभलते, पर सच्चे,
हर मुलाक़ात में कुछ नया खिले-
जैसे वसंत खुद प्रेम बनकर मिले।

समय बीता, परिवार बना,
अनायरा की गूँजी किलकारी,
फिर पावनी आई — जैसे दूसरी भोर,
दो फूल खिले, माँ की ममता उमड़ी चहुँ और।

रजनी ने हँसते हुए सब सहा,
थकान भी प्रेम का व्रत बन गई,
हर बार ईश्वर को धन्यवाद कहा,
“तेरी देन से मेरी गोद भर गई।”

पर जीवन की सबसे कठिन घड़ी आई,
जब तीसरे सूरज - शिवा -को जग ने पुकारा,
तीसरे ऑपरेशन के दर्द तले भी
रजनी ने कहा — “मेरा बच्चा बस मुस्कराए जीवन सारा।”

वह दिन था जैसे तप का पर्व,
जहाँ माँ ने अपनी देह भुला दी,
और अनिल ने प्रार्थना में अपने आँसू छिपा लिए,
कि यह जन्म सिर्फ ईश्वर का लिखा हो,
कुछ छूट गया था, जैसे पुनः मिला हो।

और शिवा आया —
जैसे आकाश ने, धरती को चूमा हो,
हर पीड़ा बन गई पूजा,
जैसे बिछड़ा जन्मों का फिर मिलकर झूमा हो।

उसको पाने को, रजनी ने
स्वयं को अग्नि में तपाया,
अपना जीवन दाँव पर रख —
ममता का अमर दीप जलाया।

अनिल की आँखों में उस क्षण
श्रद्धा का सागर उमड़ा,
क्योंकि उसने देखा था —
कैसे प्रेम बनता है बलिदान का सूत्र।

आज भी जब शिवा की हँसी गूँजती है,
वो रजनी के उस व्रत का फल है,
जिसने प्रेम को पूजा बनाया,
और जीवन को एक महाकाव्य कर दिया।

यह कथा नहीं, आरती है —
जहाँ रजनी का प्रेम अनिल की आस्था बना,
और उस मिलन से जन्मा शिवा —
पवित्र प्रेम का साकार चमत्कार बना।

अब यह परिवार नहीं — एक आस्था का वृक्ष है,
रजनी उसकी जड़, अनिल उसका तना,
अनायरा-पावनी उसकी शाखाएँ,
और शिवा — उस वृक्ष का दिव्य फल बना।

रजनी का प्रेम अब ममता है,
अनिल की श्रद्धा अब आराधना है,
और यह घर — एक मंदिर है,
जहाँ प्रेम स्वयं भगवान बना।

जय हो उस रजनी के प्रेम की,
जिसने तीन बार दर्द सहा  - और हर बार नव जीवन रचा।
यह प्रेम नहीं  - यह सृष्टि की नीराजन-आरती है,
जो रूठ के चला गया था, तू दिन रात उसे पुकारती है,
विधाता ने सुनी तेरी पुकार, किया उपकार,
लोटाया सूद समेत, जो भगवन ने लिया,
पालनहार ने शिवा उपहार स्वरूप दिया।

अनिल आर्य...

रजनी : जीवन संगिनी

भाग 2 : रजनी — प्रेम का संकल्प (संघर्ष और समर्पण) 

पहली मुलाक़ात के उस मौन से,
जब नयन बोले, शब्द चुप थे,
शुरू हुआ था प्रेम का अंकुर —
जो आस्था के आँगन में रूपधन्य था।

रजनी — संकोच की स्याही में डूबी,
डरते-काँपते मन से आगे बढ़ी,
पर दिल ने कहा — “यह राह अनिल की है,
यही तो मेरी नियति की कड़ी।”

धीरे-धीरे मिलने लगे फिर दोनों,
हर बात में खिली नई सुबह,
न दिखावा, न वचन का बोझ,
बस विश्वास की निर्मल परछाई बनी वह।

अनिल की हँसी में जीवन की लय,
रजनी की आँखों में समर्पण की छाया,
दोनों के बीच जो मौन बहता,
वही प्रेम का शुद्ध सरस साया।

फिर वो दिन आया — जैसे स्वप्न साकार,
जब दो कुल हुए एक आधार,
शुभ वचन, मंगल ध्वनि, आशीषों की छाँव,
रजनी–अनिल का प्रेम बना परिवार की ठाँव।

अनिल के जीवन में भी संघर्ष था,
सपनों की ऊँचाई, पर राह में काँटे,
कितनी तैयारी, कितनी मेहनत —
फिर भी अंधी रेवड़ी अपनों को बांटे।

वो दिन थे कठिन — सपनों की डगर पर काँटे थे,
हर दिन वो दुःख रजनी ने मिलकर बांटे थे,
वो चाहता था रहना अपने जनों के पास,
माता-पिता का साथ, सेवा में विश्वास,
पर भ्रष्ट व्यवस्था के इस अंधकार में,
हर योग्यता हारती रही, न रही आस भी पास।

फिर भी अनिल ने हिम्मत न हारी,
दिल में निष्ठा, आँखों में उजियारा,
कहा — “ईश्वर की लेखनी धीमी सही,
पर चलना ही है धर्म हमारा।”


उधर रजनी का साहस था, एक अग्नि की ज्वाला,
अंदर पले भविष्य, पर मन अडिग, अटल, उजाला।
डॉक्टर बनने का सपना, आँखों में बसाए,
थकन, वेदना सब भूल, ज्ञान के दीप जलाए।

कुछ भी हुआ रजनी ने अपने पंख न मोड़े,
कठिन दिनों में भी शिक्षा की लौ न छोडे,
गर्भ में कली-पली - प्रेम की नन्ही लय,
और मन में डॉक्टर बनने का अटल ध्येय।

आख़िरी दिन तक किताबें खोली,
थकान में भी आत्मा बोली —
“माँ बनूँगी, पर अपने कर्म से,
उसके भविष्य की नींव रखूँगी।”


अनायरा आई — आँखों में आँसू,
हृदय में ममता, बाँहों में प्रेम,
पर रजनी फिर भी कॉलेज गई,
हर दिन उसे मन में लिए  - नेम।

हर सुबह निकलती कॉलेज को, बेटी को छोड़ पीछे,
ममता की धारा भीतर बहती, दृढ़ निश्चय सींचे।
रात को जब लौटती थी, आँचल में भर लेती उसे,
माँ की गोद में थकन घुलती, आशीष बनती हृदय में।

वो ममता जो रोके रखती,
और वो जिम्मेदारी जो आगे बुलाती,
दोनों के बीच रजनी चली -
जैसे दीपक आँधी में मुस्कराती।

हर व्याख्यान के साथ उसकी आँखों में,
एक प्रश्न चमकता था -
“क्या मेरी बेटी एक दिन मुझ पर गर्व करेगी?”
और उत्तर उसके कर्मों में लिखा था।

अनिल देखता रहा - उस तप की चमक,
जहाँ प्रेम, त्याग और संघर्ष एक हुए,
और समझा  - यही तो है सच्चा व्रत,
जहाँ दो आत्माएँ जीवन से ऊपर उठें।

रजनी का प्रेम अब साधना था,
अनिल की निष्ठा उसका आधार,
संघर्षों में भी खिला यह प्रेम -
जैसे कीचड़ में कमल साकार।

अनिल ने भी रजनी की दृढ़ता को नमन किया,
हर कठिन मोड़ पर संग खड़ा, उसे प्रणाम किया।
सपनों का घर बनता गया ईमान की नींव से,
दोनों ने सींचा प्रेम अपना त्याग और पीर से।

यह कथा नहीं, प्रेरणा है -
जहाँ प्रेम ने जीवन को एक नया अर्थ दिया।
रजनी और अनिल - अब दो नहीं रहे, 
मिलकर एक - पवित्र प्रेम की मूर्ति को साकार किया। 


अनिल आर्य...

रजनी: प्रथम भेंट

भाग 1 : पहली मुलाक़ात — जब नयनों ने कहा सब कुछ 

(प्रथम भेंट)

वो दिन जैसे ठहर गया था,
समय ने साँसें रोक लीं,
रजनी थी मौन, निस्तब्ध लम्बी रात सी,
कुछ कहने को था लम्बा मौन, न कोई बात थी ?

अनिल वहाँ खुला हुआ था -
जैसे जीवन की किताब रखी हो,
हर पन्ना सच्चाई से भरा,
हर शब्द में उजली रेखा लिखी हो।

रजनी बस सुनती रही चुपचाप,
जग जैसे दूर कहीं ठहर गया,
मन भीतर कुछ काँपा-सा,
पर होंठों ने कोई स्वर न कहा।

अनिल ने तर्क नहीं, भाव चुना,
दिमाग़ की जगह दिल को सुना,
न गिने लाभ, न हानि की रेखा,
आँखों में बस अपनापन देखा।

रजनी सोच न सकी, पर समझ गई,
यह मौन कोई सामान्य नहीं,
यह वो क्षण था जहाँ आत्मा बोली,
और समय भी बना साक्षी वहीं।

फूलों ने उस दिन खुशबू छोड़ी,
जैसे गवाही दे रहे हों भाव,
अनिल के शब्दों से नहीं - नज़रों से,
रजनी के मन ने पा लिया ठाँव।

वो पहली मुलाक़ात न कहानी बनी,
न किसी किताब में लिखी गई,
पर उसकी छाया आज भी है गहरी,
जैसे आरती में लौ रहती है ठहरी।

रजनी का मौन — प्रार्थना बन गया,
अनिल की वाणी — उत्तर बन गई,
और वहीं से जन्मा वो पवित्र प्रेम -
जहाँ आत्मा से आत्मा जुड़ गई।


अनिल आर्य...

Tuesday, 11 November 2025

माता शीतला — हमारे जीवन का ताप मिटाओ

“माता शीतला — हमारे जीवन का ताप मिटाओ ”

हे शीतला माँ, शीतल धारा,
हर लो दुख, संताप हमारा।
तेरे चरणों में विनती सारी,
हम सब तेरे बालक -हे सुखकारी।

अनायरा की हँसी सदा खिले,
उसकी राहों में फूल मिलें।
तेरा स्नेह बने उसकी छाया,
हर दुःख से उसको बचाया।

शिवा हमारा चंचल, प्यारा,
तेरा ही अंश, तेरी ही धारा।
उसके मन में उजियारा भर दो,
माँ, ज्ञान और साहस वर दो।

पावनी तेरी निर्मल कली,
पवित्र भावों से सजी-खिली।
माँ, उससे करो कुछ ऐसा संवाद,
जग में नाम करे, दो आशीर्वाद।

तीनों पर करो ममता-वृष्टि,
तेरे बिना है अधूरी सृष्टि।
घर आँगन में शांति उतारे,
तेरी कृपा से सब सुख उजियारे।

शीतला माँ, ये विनय हमारी —
रहो सदा जीवन की अधिकारी।
माँ तेरे आँचल की हो शीतल छाया,
मिले स्वास्थ्य, सुःख, यश, धन-माया।

🌸 जय शीतला माँ — करुणा की धारा,
तेरे बच्चे — अनायरा, शिवा, पावनी ने तुझे पुकारा। 🌸

Tuesday, 4 November 2025

“मेरा परिवार - मेरा अभिमान”

 “मेरा परिवार - मेरा अभिमान”

यह घर नहीं, मंदिर है,
जहाँ स्नेह दीप जलते हैं,
जहाँ हँसी बनकर हवा में
सपनों के पंख मचलते हैं।

प्रेम बसा है, हर कोने में,
जो परिवार का है आधार,
प्रेम अमर है, अविनाशी,
द्वेष हमें है, अस्वीकार।

पिता बिरेन्द्र सिँह — वटवृक्ष समान,
उनकी प्राणवायु से घर, रहे भरा,
उनकी छाँव से, मिट जाती थकान,
गुणशाली इतने, देवों को भी, दें हरा।

माँ सुदेश कुमारी, ममता सरिता,
थके मनों को देती विश्राम,
उनकी वाणी में, घर की गूँज,
उनकी सेवा से बनता हर काम।

अनिता संग, शक्ति का संग,
जीवन में सुख का नया रंग,
और नन्हा अयांश मुस्कराए,
घर में जैसे प्रभात उमंग।

रीतू की जोड़ी, योगी से जोड़ी,
हर दृष्टि में भरा, आशीर्वाद,
नई शुरुआत की यह कोमल-किरण,
भर दें जीवन में मधुर प्रसाद।

अमित को मिली मीत, रीतू से प्रीत,
बंधन स्नेह का अद्भुत और महान,
ये सुखद संयोग सभी बने हैं —
शिवा के शुभ कर्मों का है वरदान।

रजनी — मेरे जीवन की धड़कन,
संगिनी, सखा, स्नेह का रूप,
उसकी उपस्थिति जैसे दीपक,
मिटे अंधकार, मिले स्नेहिल धूप।

अनायरा और पावनी हैं तारे,
घर में झिलमिलाते करते हैं सारे,
उनकी हँसी में मिलता प्रेम-प्रसाद,
बोल हैं ऐसे, जैसे ईश्वर के मीठे संवाद।

और शिवा है नन्हा-प्यारा,
मुस्काता उससे घर सारा,
सबका मन हरदम बहलाता,
आशा का सूरज कहलाता।

यह परिवार, यह स्नेह-बंधन,
हर रग-रग में बसा प्रेम अपार,
यही मेरा धर्म, यही उत्सव,
यही मेरा, आर्य परिवार।

अनिल आर्य...