Saturday, 31 January 2026

चाय

आँखें मसलती चाय आई ,
बोली— मैं हूँ सुकून की रानी।
दो घूँट में सब जग जाएँ,
ऐसी मेरी कहानी।

दारू आई हँसती-डोलती,
कह गई दो खरी-खोटी,
बातें सच की ऐसी मारी,
ख़ामोशी भी हो गई छोटी।

छाती में मार के मुक्का,
मूंछ मरोड़ के बोला हुक्का,
मर्द बनो, मारो दो घूँट,
तुम्हे ऐटिटूड करता ये सूट,
चाय-दारू हुई खामोश,
हुक्के ने ली महफिल लूट...

फिर क्या था…
कड़वी दारू ख़फ़ा हो गई,
"मीठा" सच बोलकर सो गई,
हुक्का फिलॉसफी में खो गया,
थोड़ा चुप हो गया...

और चाय…
चाय को किसी ने पूछा ही नहीं,
ठंडी होकर बिस्कुट से लड़ गई,
नम्बर वन आने की जिद पे अड़ गईं।

सिसकी लेकर कप से बोली,
जो होनी थी वो होली,
पतीले से कहा,
ये अपमान मुझे नहीं स्वीकार,
चढ़ी टांड पर,
और मुँह छिपाकर,
सो-ली।

हुई सुबह,
सबने ढूँढा, चाय नहीं मिली,
मची चीख-पुकार,
सब-जन बिगड़ गए,
चाय पीने की,
जिद पे अड़ गए।

चाय अंदर से खुश,
पर तैश में आकर,
ऊपर से ही बोली,
हुक्का पी-लो,
मारो ना पेग।

हर कोई गलती माने,
कहे
बिना चाय बिस्तर न छोडूं,
अपना प्रण कभी न तोड़ूँ।
हुक्का हारा - दारू हारी,
अंततः चाय ने बाजी मारी।

नोट: एक चुस्की चाय,
केवल एक चुस्की चाय,
तन में जोश और
रिश्तों में गर्माहट लाए।

अनिल आर्य...

Friday, 30 January 2026

नीलू शर्मा जी

नीलू शर्मा जी
स्नेहमयी-अनुशासित

आज कक्षाएँ वही हैं,
घंटियाँ वही बजती हैं,
पर विद्यालय परिसर में,
एक परिचित सन्नाटा है।

बरसों की वह सहयात्रा,
जहाँ आप विज्ञान पढ़ाती रहीं,
और हम देखते रहे—
कैसे अनुशासन
स्नेह के साथ चल सकता है।

कभी प्रयोगशाला की तैयारी,
कभी परीक्षा की उलझन,
हर मोड़ पर
आपकी स्थिरता
हम सबके लिए भरोसा बनी।

आपके साथ काम करते हुए
यह समझ आया—
अध्यापक होना
सिर्फ पेशा नहीं,
एक सतत साधना है।

आज सेवानिवृति है,
पर यह विदाई नहीं लगती,
क्योंकि जिन मूल्यों को
आपने जिया,
वे इस विद्यालय की
दीवारों में बस चुके हैं।

सहकर्मी के रूप में
आपका साथ
सम्मान की पाठशाला रहा,
और एक वरिष्ठ साथी के रूप में
आपका होना
सौभाग्य।

नीलू शर्मा जी,
यह प्रणाम
केवल एक अध्यापक का नहीं,
एक अनुज का भी है—
जो आपकी शांत,
गरिमामयी उपस्थिति
हमेशा महसूस करता रहेगा।

आज आपकी कुर्सी भले खाली हो,
पर मार्गदर्शन अब भी साथ चलता रहेगा।
विद्यालय आपको विदा नहीं करता,
आपको अपने संस्कारों में सँजो लेता है।

अनिल आर्य...
🙏🏻 सादर नमन 🙏🏻

Gen-Z : प्यार इंस्टॉल, वफ़ा ट्रायल

Gen-Z : प्यार इंस्टॉल, वफ़ा ट्रायल

Gen-Z का प्यार
दिल में नहीं रहता,
फोन की मेमोरी में रहता है—
स्टोरेज फुल हुई
तो रिश्ता डिलीट।

इन्हें इश्क़ चाहिए
No effort,
वफ़ा भी चाहिए इतनी
की Password मिल जाए बस,
और ब्रेकअप चाहिए ऐसे
“कि तू बहुत अच्छा है,
बस मेरे टाइप का नहीं।”

ये लोग कहते हैं—
“हम deep हैं,”
और दो लाइन पढ़ते ही
बोर हो जाते हैं।

इनका दर्द भी
रील में होता है,
और हीलिंग
DP बदलने से।

लड़का बोले—
“मैं टॉक्सिक नहीं हूँ,”
पर हर तीस मिनट में
Online status चेक करता है।

लड़की बोले—
“मुझे space चाहिए,”
और space में
चार लोग already घूम रहे होते हैं।

Gen-Z का प्यार
इतना fragile है
कि एक
“OK”
पूरे रिश्ते को
ICU में डाल देता है।

इन्हें वफ़ा से डर लगता है,
क्योंकि वफ़ा में
सब्र चाहिए—
और सब्र
इनके syllabus में नहीं।

ये कहते हैं—
“Commitment overrated है,”
क्योंकि commitment में
भागने का ऑप्शन नहीं होता।

इनका forever
बस इतना होता है—
“जब तक कोई बेहतर न मिल जाए।”

और फिर ये पूछते हैं—
“आजकल प्यार टिकता क्यों नहीं?”
क्योंकि जिसने
इंतज़ार करना नहीं सीखा,
वो रिश्ता निभाने की
हिम्मत कहाँ से लाए?

इसलिए व्यंग्य की कटार
अब सीधा वार करती है—
रील में पला प्यार
असल ज़िंदगी में
पहली ज़िम्मेदारी पर
दम तोड़ देता है।

अनिल आर्य...

क्या होगा इनका

कक्षा में सिलेबस, दिमाग़ में PUBG

आज का छात्र
कक्षा में बैठा है,
पर दिमाग़—
PUBG के लैंडिंग ज़ोन में।

हाज़िरी लगी है स्कूल में,
पर मन
Free Fire की लॉबी में।

टीचर बोले— “ध्यान दो,”
और उँगली बोले—
“बस एक रील और।”

उसे इतिहास चाहिए—
जिसमें युद्ध हो,
पर किताब वाला नहीं,
मोबाइल वाला।

उसे गणित मुश्किल लगता है,
पर डैमेज परसेंट
पलक झपकते निकाल लेता है।

नेता बोले—
“युवा देश की ताक़त हैं,”
और उसी युवा को
नेट पैक देकर
चुप करा देता है।

नीति आई—
“डिजिटल शिक्षा,”
छात्र ने समझा—
“अब गेमिंग भी
रोज़गार है।”

माँ पूछे—
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”
छात्र बोले—
“टॉप फाइव में आया हूँ।”
माँ खुश—
पता बाद में चलता है,
वो गेम में था।

और बीच में अध्यापक—
जो आज भी
चॉक से
भविष्य लिख रहा है,
जबकि छात्र
स्क्रीन पर
जीवन मिटा रहा है।

वो कहता है—
“गेम खेलो,
पर ज़िंदगी मत हारो।”

पर कौन सुने—
जब क्लास साइलेंट में है,
और मोबाइल गेम
फुल वॉल्यूम पर।

क्योंकि आज—
छात्र ऑनलाइन है,
नेता पंच-लाइन मार रहा है,
और अध्यापक…
अब भी
देश को
री-स्टार्ट करने की
कोशिश में है।

अनिल आर्य...

Thursday, 29 January 2026

सादगी हो तो ऐसी...

दहेज़ नहीं...

दूल्हा भी कमाता है,
दुल्हन भी कमाती है,
दोनों कहते हैं—
“अब पिता का सहारा हम बनेंगे।”
ज़रूर बनेंगे…
बस पहले शॉपिंग पूरी हो जाए।

दूल्हा बोला— “सादगी से करेंगे विवाह”
फिर निकली सूची—
पाँच शेरवानी,
सात जूते,
तीन घड़ियाँ—
एक बारात के लिए,
बाक़ी रील के लिए।

हाँ DJ थोड़ा hi-fi चाहिए,
लाइट ज़रा-सी dim चाहिए,
Loud म्यूज़िक हो,
शादी नहीं—फिल्म चाहिए।

रथ हो युद्ध वाला,
घोड़ा सफ़ेद शुद्ध वाला,
तलवार हो शिवाजी की,
घोड़ा चले स्लो-मोशन में,
ड्रोन ऊपर से वार करे,
सात फेरे नहीं—
रील के लिए
सात एंगल तैयार करे।

दुल्हन बोली— “मेकअप तो नैचुरल रहेगा”
फिर आया आर्टिस्ट—
चेहरा नहीं,
पूरी पेंटिंग बनाई,
माँ पहचान न पाईं,
पड़ोसन ने पूछा—
“बेटी विदेश से आई क्या?”

हल्दी—थी पीली,
पर खर्च—हरा डॉलर वाला।
मेहँदी—हाथ में कम,
इंस्टाग्राम पर ज़्यादा चढ़ी।

फूल असली नहीं—
पर बिल बिल्कुल असली।
डेकोरेशन ऐसी—
कि मंडप नहीं,
म्यूज़ियम लगे।

दूल्हा-दुल्हन बोले—
“पैसा मायने नहीं रखता”
और पिता जी ने
चुपचाप ज़मीन के काग़ज़
अलमारी से बाहर रख दिए,
और रिटायर्मेंट का सोचना बंद कर दिया।

दुल्हन ने साफ कहा—
“दहेज़ नहीं लूँगी।”
सबने राहत की साँस ली।
फिर जब शादी की लिस्ट आई—
तो लगा,
दहेज़ ने बस
कपड़े बदल लिए हैं।

फर्नीचर मत भेजना,
बस टीवी बड़ा दे देना,
दहेज़ का नाम मत लेना—
बस कपड़ों में कमी न हो,
और गहनों में
कंजूसी न झलके।

सोने का रेट ऐसा—
कि ज्वेलर नहीं,
कार्डियोलॉजिस्ट चाहिए,
एक हार देखा—
पिता जी की धड़कन
डाउन पेमेंट माँगने लगी,
लड़की वाले पिता की
रिटायरमेंट दो साल पीछे।

उधर लड़के वाले पिता—
कहते हैं, “हमें कुछ नहीं चाहिए,”
और भीतर ही भीतर
पेंशन से
शगुन की गणना करते हैं।

रिश्तेदार दोनों तरफ—
सम्मान के नाम पर खर्च,
प्रतिष्ठा के नाम पर तुलना।
ना लेने का वादा,
ना कम करने की हिम्मत।

बेटी कहती है—
“मैं आत्मनिर्भर हूँ।”
बेटा कहता है—
“मैं सब संभाल लूँगा।”

और तब-
जब नव-दंपति कहते हैं,
“अब सब हम संभाल लेंगे,”
दोनों पिता
एक-दूसरे को देख
बस मुस्करा देते हैं।

ना ताना,
ना शिकायत—
बस अनुभव की हँसी।

क्योंकि वे जानते हैं—
इस शादी में
दहेज़ नहीं गया है,
गए हैं बस
रिटायरमेंट के कुछ साल।

अनिल आर्य...

Tuesday, 27 January 2026

मेरा शिव

सबका मालिक पालनहारा,

सृजन करता—करता संहारा,

सृष्टि के कण-कण में वो है,

मेरे पल क्षण-क्षण में वो है।


सृष्टि पालक, नियंता है शिव,

सृजक–विध्वंसक, अभियंता है शिव,

आस - उम्मीद, विश्वास है शिव,

मेरी प्राण-वायु, श्वास है शिव।


वो ही अनादि, वो ही अनंता,

साधु है वो, वो ही संता,

भाग्य लिखता, मेल मिलाता,

सृष्टि के हर, खेल रचाता।


न रूप उसका, न ही नाम विशेषा,

न कोई आदि, न कोई शेषा,

जो शून्य में पूर्ण समाया,

वही स्वयंभू-शिव कहलाया।


पकड़े तेरा-मेरा सबका हाथ,

तो मैं कहता, जगन्नाथ।

डूबे जब जीवन की हर बात,

याद है आता जगन्नाथ।


टूटे जब विश्वास की डोर,

छूटे अपने, छूटे छोर,

तू ही अनाथों का है नाथ,

जगन्नाथ, जगन्नाथ।


हर आदियोगी में, महादेव है,

नहीं किसी भोगी में, महादेव है,

हैं भांग-धतूरा जो कोई खाते,

महादेव को कभी न पाते।


नहीं कश खींचे महादेव,

अंतर का विष खींचे महादेव,

जगत का सारा, संताप-ताप,

अमृत से सीँचे महादेव।


जब आकर दस्तक - देता काल,

याद करता मैं महाकाल,

काल का भी बन जाता काल,

टाल देता - मृत्यु अकाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


भय जब मन में, भरता जाल,

स्मरण करता मैं महाकाल,

भस्म कर देते सब विकाल,

टूटे बंधन, मिटे जंजाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


अंधियारा हो या भूचाल,

साथ खड़े रहते महाकाल,

श्वास-श्वास में उनका भाल,

रक्षक बनते, बनते ढाल।

जय महाकाल, जय महाकाल।


शरण जो आया इनके लाल,

क्या बिगाड़े उनका काल,

भक्त के संग खड़े महाकाल,

काल के आगे अड़े महाकाल,

जय महाकाल, जय महाकाल।


अधर्म बढ़े, आतंकी पे - हो शक्ति,

तब मैं रूद्र रूप की - करता भक्ति,

मस्तक विभूति, आँखें लाल,

रूद्र-रूप से डरता-काल।


जब मर्यादा, लांघे अभिमान,

जब रोए धरती, रोए इंसान,

तांडव जागे, बजे कराल,

कंपे सिंहासन, कांपे काल।


डमरू नाद में न्याय पुकार,

भस्म हो जाए पापाचार,

त्रिनेत्र खुलते ही-तत्क्षण काल,

मरते दैत्य-असुर, झुकते सब भाल।


रूद्र में शिव और शिव में शांत,

विष में अमृत और में अंध में कांत,

जो रूद्र समझे, जाने शिव का मर्म,

वही पाए मोक्ष, जाने क्या है धर्म।


रूद्र न क्रोध, धर्म का बल,

संहार नहीं—नव सृजन-फल,

जहाँ अटक जाए समय की चाल,

वहीं खड़े हों रूद्र महाकाल।


जब फँस जाओ - याद करो तुम,

कान में हल फिर बोले बाबा।

तब मैं कहता-भोले बाबा, 

भोले बाबा, भोले बाबा।


भूत-भविष्य -बहुत भयंकर,

तब मैं याद करूँ शिव शंकर,

डर के साए छँटने लगते,

मन के बंधन कटने लगते।


कंकर-कंकर में है शंकर,

युद्ध के बंकर में है शंकर,

बिल्ली की म्याऊँ में शंकर,

मैं तो हर पल गाऊँ शंकर।


सन्नाटे की साँस में शंकर,

शोर भरे हर श्वास में शंकर,

न रोने की सिसकी में शंकर,

न रम की बोतल व्हिस्की में शंकर।


ज़ब राख हो जाए-हर अभिमान,

तब चरणों में-टिक जाए प्राण।

तब न नाम रहे, न रूप रहे,

याद शंकर का स्वरूप रहे।


जिस पल टूटे -सांसों का धागा,

होंठों पर हो—भोले बाबा,

मेरे शंकर बाबा,

भोले बाबा, भोले बाबा, भोले बाबा।


मैं कहता शिव और स्वयंभू,

हर-हर शम्भू, हर-हर शम्भू,

जो भी उसका नाम है ध्याता,

सो जीते जी मोक्ष को पाता।


न कोई आकार, न रंग-रेखा,

न जन्म-मरण का कोई लेखा,

न दीप-नैवैध, न पूजा-पाठा,

वो तो चेतन -मौन प्रभाता।


न वो मंदिर, न ही मस्जिद,

न ही काशी उसकी सरहद,

जहाँ विचार थक कर -रुक जाएँ,

वहीं पर शिव सामने आएँ।


अंबर में और बादल में शिव,

श्याने में और पागल में शिव,

लय में और ताल में है शिव,

बाल में, बाल की खाल में है शिव।


वो ही रुद्र, वो भोलेनाथ,

वो त्रिनेत्रधारी, गौरी के साथ,

जब “मैं” गलकर “तू” हो जाए,

तभी शिव का सत्य- बतलाए।


शिव ही सत्य, सुन्दर भी शिव,

काशी-काबा, मंदिर भी शिव,

ब्रह्मा है शिव, विष्णु भी शिव,

क्रांति है शिव, सहिष्णु भी शिव।


शिव बुद्ध में, दिगम्बर है शिव,

धरती और समंदर है शिव,

बाहर भी शिव, अंदर है शिव,

मन-मौजी मस्त -कलंदर है शिव।


मंगल में शिव, शिव में मंगल,

जंगल में शिव, शिव में जंगल,

गंगा में शिव, शिव में गंगा,

जपो नमः शिवाय-हो मन चंगा।


भस्म में शिव, शिव में-भस्म समाई

शिव में हर एक- रस्म समाई,,

मैं तो करता शिव की कमाई,

तुम भी करलो मेरे भाई।


शिव धूप में भी, छाँव है शिव,

जल में भी, और नावं है शिव,

नींद में सपना, सपने में शिव,

पराये और हर अपने में शिव।


डमरू में शिव, शिव में नाद,

मौन में शिव, शिव संवाद,

शून्य में शिव, शिव आकार,

अंत में शिव, शिव विस्तार।


शिव राह भी है, राहगीर भी शिव है,

हर एक निर्भय-वीर भी शिव है,

मंज़िल का पत्थर भी शिव है,

मेरा तो अब घर भी शिव है


साँप में और रस्सी में शिव है,

दूध दही लस्सी में शिव है,

खाने और पीने में शिव है 

और जीवन जीने में शिव है।


जीवन में लय - लय में शिव है,

जीवन की हर शय में शिव है,

"नेता बोले वोट में शिव है,

वोटर के लिए नोट में शिव है" ।


नागा बाबा—अघोरी में शिव है,

टिंडा, लौकी—तौरी में शिव है,

चीनी और नमक में शिव है,

आलू की बोरी में शिव है।


दलिये, खिचड़ी- भात में शिव है,

मेरी तो हर बात में शिव है,

ज्ञान-विज्ञान में शिव समाया,

प्रैक्टिकल-थ्योरी में शिव है।


चूल्हे की आग में शिव है,

रोटी की फुलौरी में शिव है,

हाट-बाज़ार, ठेले-पटरी में शिव,

माता की लोरी में शिव है।


राजा बोले—तख़्त में शिव है,

फकीर कहे—कंठी में शिव है,

ढोलक बोले, हँसे मंजीरा,

नंदी में- गौरी में शिव है।


जाकर ढूँढा,

जगन्नाथ, पूरी में,

आँख खुली तो मैंने जाना,

हलवे और पूरी में शिव है।


देखे जो हँसकर, पाए वही,

ढूँढे जो रोकर, दूर ही शिव है,

हर-हर बोले जो हँस करके,

उसकी हँसखोरी में शिव है।


सच्ची रिश्तेदारी में शिव है,

अपनी पत्नी प्यारी में शिव है,

नहीं पराई नारी में शिव है,

न ही अत्याचारी में शिव है।


बात जो समझो, सार में शिव है,

माँ - बापू के प्यार में शिव है,

नहीं तानों की तलवार में शिव है,

न रुखे व्यवहार में शिव है।


साँप में और रस्सी में शिव है,

दूध, दही और लस्सी में शिव है,

खाने में भी, पीने में शिव है,

और जीवन को जीने में शिव है।


जीवन में लय — उस लय में शिव है,

हर एक “शय” की शय में शिव है,

न पापी -आततायी में शिव है,

तेरी चाची–ताई में शिव है। 


भूखे की थाली में शिव है,

प्यासे की प्याली में शिव है,

नहीं डिग्री जाली में शिव है,

न बुरे शब्द-गाली में शिव है।


मेहनत की रोटी सादी में शिव है,

संतोष की नींद आधी में शिव है,

नहीं बुरी सोच वाले में शिव है,

न ही पाप कमाई गाढ़ी में शिव है।


हर एक जिम्मेदारी में शिव है,

हर गृहस्थ नर-नारी में शिव है,

जो भागा जिम्मेदारी से,

क्या उस भगवाधारी में शिव है ???


न झूठ की हिस्सेदारी में शिव है।

न स्वार्थ की होशियारी में शिव है,

जहाँ हक़ छीन कर बजें तालियाँ,

न उस झूठी गद्दारी में शिव है।


जहाँ भूखा देख कर मुँह मोड़ लें,

टूटे हुए को और तोड़ लें,

जहाँ करुणा बोझ लगे दिल को,

न उस दुनियादारी में शिव है।


जहाँ रिश्ते लाभ से जोड़े जाएँ,

स्वार्थो से हित मरोड़े जाएँ,

जहाँ भक्ति भी डर फैलाने को,

न उस पूजा विधि तैयारी में शिव है।


घर के आँगन, तुलसी थारी में शिव है,

बच्चे की किलकारी में शिव है,

माँ की डाँट, पिता की छाया,

हर रिश्ते की जिम्मेदारी में शिव है।


पसीने की बूँद, किसान की मेहनत,

हल की धार, क्यारी में शिव है,

सड़क किनारे बैठा साधु,

उसकी कुत्ते से यारी में शिव है।


फाइलों में दबा हो सच अगर,

तब न्याय की तैयारी में शिव है,

कोर्ट-कचहरी, कलम-काग़ज़,

क्या कानून की लाचारी में शिव है ???


हार के बाद जो हिम्मत जगे,

फिर उठने की तैयारी में शिव है,

टूटे सपने, सिले इरादे,

फिर से शुरू करने की बारी में शिव है।


जो कह दे—सब तेरा ही है,

उसकी दातारी में शिव है,

न माँगे, न तौले, बस बाँटे,

ऐसी हर यारी में शिव है।


सन में शिव है, मून में शिव है,

मेरी तो हर बोन में शिव है।

स्टेटस की भूख, फेम में नहीं,

साइलेंस वाले जोन में शिव है।


रील-लाइक्स, ट्रेंड में नहीं

रियलिटी की वॉइस में शिव है।

शोर भरे क्राउड में नहीं,

इंटरनल की नॉइस में शिव है।


डील और प्रॉफिट गेम में नहीं,

शो-ऑफ, झूठी फेम में नहीं,

गुनगुनाने के गुन में शिव है,

हार्ट की सच्ची धुन में शिव है।


चेयर के रेवोल्यूशन में नहीं,

नेता के एवोल्यूशन में नहीं,

यूनिवर्स के एवोल्यूशन में शिव है,

अर्थ के रेवोल्यूशन में शिव है।


पोस्ट की पोज़िशन में नहीं,

खोखली डेफिनिशन में नहीं,

कॉनशसनेस (चेतना ) की डायमेंशन में शिव है,

जीवन की ट्रांसफॉर्मेशन में शिव है।


डाटा की इंफ्लेशन में नहीं,

फेक की इंफॉर्मेशन में नहीं,

साइलेंस की वाइब्रेशन में शिव है,

अंतर की कैलिब्रेशन में शिव है।


लाइक्स की कंपटीशन में नहीं,

वायरल की ऑब्सेशन में नहीं,

सेल्फ की रियलाइजेशन में शिव है,

अहं की एलिमिनेशन में शिव है।


टाइम की रेस के-टेंशन में नहीं,

कल-परसों की -मेंशन में नहीं,

नाउ की प्रेज़ेंस में शिव है,

श्वास की एसेंस में शिव है।


शोर में भी शिव, मौन में भी शिव,

भीड़ में भी शिव, नीड में भी शिव,

नाम में शिव, धाम में शिव,

हर पहचान की पहचान में शिव।


नफ़रत में नहीं बसता है शिव,

आडंबर पे हँसता है शिव,

प्रेम की सच्ची बस्ती में शिव,

करुणा की हर कश्ती में शिव।


डर से नहीं चलता है शिव,

दिखावे में नहीं पलता है शिव,

साहस की शांत मस्ती में शिव,

सत्य की फेर-हस्ती में शिव।


शोर से नहीं गढ़ता है शिव,

झूठ से नहीं बढ़ता है शिव,

मौन की गहरी सृष्टि में शिव,

श्वास की सहज दृष्टि में शिव।


वो शान्ति है, क्रोध भी है शिव,

वो प्रश्न नहीं है, बोध ही है शिव,

जो भीतर की आँख जगाता,

वो निर्गुण ही शिव कहलाता।


मैं कहूँ कैसे, शब्द कहाँ हैं,

वो यहाँ-वहाँ है, सब जगहाँ है,

जो अंतर में दिखता शिव है,

क्या मूर्तियों में बिकता शिव है ???


मंदिर ढूँढे, मस्जिद सजाए,

नफ़रत में झंडे लहराए,

शिव न भाषण, न दंगाई में,

शिव तो मौन की सच्चाई में।


रटता गीता, दिल में द्वेष है,

हाथ में कुरान, ज़ुबाँ पे क्लेश है,

मंदिर ढूँढे पत्थर–माटी में,

पर शिव न मिले तेरी घाटी में।


न हिन्दू में, न मुसलमान में,

न नाम, झंडे या पहचान में,

न भगवा में, न हरी चादर में,

शिव बसता - मानवता के आदर में।


बंधन नहीं - मुक्त है शिव,

क्या मोह माया में लिप्त है शिव ???

हर कोई पूछता, शिव कहाँ है ???

जहाँ मैं मिटूँ, तू भी न रहे-

शिव वहाँ है… मेरा शिव वहाँ है।


अनिल आर्य...

Monday, 26 January 2026

मैं वैरागी वीतरागी...

मैं वैरागी वीतरागी

मैं वैरागी वीतरागी…
वैराग सही, वीतराग सही,
सन्मार्ग यही, शिव-तत्व यही,
उस चाल चलो, उस रंग ढलो,
जो पहुँचे हर को,
बदले मन के स्वर को।

मैं वैरागी वीतरागी…
नयन खुले, पर दृश्य शून्य,
चलता हूँ, पर राह नहीं,
ठहराव ही मेरा गंतव्य;
तन है नश्वर—जानो ईश्वर,
मोक्ष मन में उतरे, स्वर में निखरे,
गूँजे हर स्वर, हर-हर; हर-हर।

मैं वैरागी वीतरागी…
न चाह का शोर भीतर,
न भय की कोई परछाईं,
जो मिला, वह अर्पण हुआ,
जो छूटा, वह भी मेरा ही था;
मौन की धड़कन सुनता हूँ,
जहाँ शब्द स्वयं गल जाते हैं;
मैं सत्य वहाँ बुनता हूँ।

मैं वैरागी वीतरागी…
राग जला और द्वेष गला,
मोह को जल में विसर्जित किया,
जब “मैं” छूटा धीरे-धीरे,
अनंत ने मुझको थाम लिया;
न तृष्णा की अग्नि शेष रही,
न विरक्ति का कोई दंभ बचा;
तब मन ने नव संसार रचा।

मैं वैरागी वीतरागी…
समत्व की शांत धूप तले,
अंतर में हुई रौशनी उजली;
न त्याग का बोझ रहा कंधों पर,
न भोग की छाया मन पर टिकती —
मैं मुक्त हूँ…
क्योंकि अब,
उपेक्षा की परवाह नहीं,
अपेक्षा नहीं और चाह नहीं,
है यही राह सही, है यही राह सही...
मैं वैरागी वीतरागी… 

अनिल आर्य...

Sunday, 25 January 2026

26 जनवरी प्रथम त्यौहार

26 जनवरी - स्वराज का सिंहनाद

26 जनवरी कोई तारीख़ नहीं,
जन-स्वराज का सिंहनाद है।
मुकुट नहीं, सिंहासन नहीं,
भारत का स्वर-संविधान का नाद है।

स्याही नहीं थी, शपथ थी वह,
जिससे राष्ट्र का रूप गढ़ा।
अक्षरों में भविष्य धड़का,
भारत गणतंत्र बनकर हुआ खड़ा।

राजा नहीं, विधान यहाँ,
जन-इच्छा सर्वोच्च स्वर है।
न्याय, समता, बंधुत्व-
हर नागरिक का अधिकार प्रखर है।

सीमा पर अडिग प्रहरी बोले-
“संविधान मेरी तलवार है।”
हल थामे किसान कहे-
“यही मेरी धरती का आधार है।”

नारी मस्तक ऊँचा उठाए,
सम्मान यहाँ संस्कार बने।
शिक्षा जब शस्त्र बने हाथों में,
तब भारत नव-निर्माण रचे।

तिरंगा केवल ध्वज नहीं,
यह त्याग, तपस्या की गाथा है।
हर रंग में इतिहास जगा,
हर रेशा राष्ट्र की भाषा है।

26 जनवरी चेताए हमको-
स्वतंत्रता उपहार नहीं।
संविधान की रक्षा करना,
हर नागरिक रखे व्यवहार सही।

आओ, फिर प्रतिज्ञा दोहराएँ-
कर्तव्य को सिंहासन दें।
भारत तभी विश्व-नायक हो,
जब कर्म को ही शासन दें।

26 जनवरी-
एक दिवस नहीं, उद्घोष है।
लोकतंत्र की धड़कन,
भारत का आत्म-घोष है। 

अनिल आर्य...

Monday, 19 January 2026

अमित + रीतू = अमृत

अमित व रीतू — बड़े भाई का आशीर्वचन
(शुभ विवाह | 4 फ़रवरी)

कुछ क्षण
कहे नहीं जाते,
वे मन में उतरकर
आशीर्वाद बनते हैं।
आज
मेरे लिए
भी ऐसा ही क्षण है

अमित,
तुम्हें समय के साथ
जिम्मेदारी में
स्थिर होते देखा है—
शांत,
पर दृढ़।

रीतू,
यह घर
तुम्हारे स्वभाव से
और समृद्ध हो—
तुम्हारी समझ से
संवाद गहरे हों,
तुम्हारी शांति से
दिन सहज बनें,
और तुम्हारी उपस्थिति में
हर रिश्ता
अपनी जगह पाए।

यह विवाह
केवल रस्म नहीं,
जीवन को
साथ सँभालने का
सचेत संकल्प है।

अमित की दृढ़ता
और रीतू की सौम्यता
जब एक होंगी,
तो जीवन स्वयं
संतुलन पाएगा-
और हर किसी के 
जीवन से विष निकाल,
अमृत ही बसाएगा।

एक बड़े भाई का
आशीर्वाद है-
तुम्हारा साथ,
तुम्हारा रिश्ता
सिर्फ शब्दों से नहीं,
निभाने से पहचाना जाएगा।

आने वाला समय
सब कुछ बदलेगा,
पर विश्वास कभी न बदले;
जीवन
कठिन हो भी कभी,
पर एक-दूसरे का हाथ
कभी न छूटे।

ईश्वर करे—
तुम्हारा दांपत्य
शोर से दूर,
सार्थकता में गहरा
और संतोष में
सदैव स्थिर रहे।
अमित और रीतू,
सुखी रहो—
आज भी,
और हर आने वाले कल में।

अनिल आर्य...

ऋतुयोगी

रीतू ✦ योगी — बड़े भाई का आशीर्वाद 🌸
(शुभ विवाह | 3 फ़रवरी 2026)

आज …
समय भी ठहर गया है …
और यह क्षण …
धरती और आकाश के बीच …
इस पवित्र बेला का साक्षी बन गया है …

तुम दोनों को एक-साथ देखकर …
आज मैं यह जान गया हूँ …
कि प्रेम का यह बंधन …
सिर्फ़ शब्दों का नहीं …
बल्कि आत्मा के गहन स्वर का है …

रीतू …
तुम्हारी मृदुता …
जैसे सर्दियों की हल्की धूप …
हर दिन को गर्म करती है …
और हर रिश्ते को …
सुकून देती है …

योगी …
तुम्हारी स्थिरता …
जैसे पर्वत की नींव …
हर कदम को सहारा देती है …
और आने वाली...
हर सर्द हवा से,
दीवार बनकर...
परिवार की रक्षा करती है …

यह मिलन …
केवल फेरे मात्र का नहीं …
यह समझ, धैर्य और विश्वास का
गहन वचन है …
जो शब्दों से नहीं,
केवल आत्मा की गूँज से सुना जाता है …

जहाँ मतभेद आए …
वहाँ भी शांति बनी रहे …
जहाँ थकान हो …
वहाँ भी धैर्य बना रहे …
प्रेम सदैव इस बंधन का,
आधार रहे...
सूर्य सा रौशन,
पर्वत सा स्थिर...

ईश्वर करे …
तुम दोनों का यह बंधन …
सदा प्रेम, सम्मान और संतोष से …
प्रकाशमान रहे …
और जीवन के हर क्षण …
एक-दूसरे के लिए
उजले और सुरक्षित हों …

रीतू और योगी …
सदैव सुखी रहो … 

Tuesday, 13 January 2026

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

सूर्य दिशा बदलता है,
और जीवन की चाल बदल जाती है।

जो थमे थे ठंड की जड़ता में,
उनमें फिर से आग जल जाती है।

अंधकार से कह दो-हट जाए,
अब उत्तरायण का द्वार खुला।

मेहनत के दाने पकते हैं,
किसान का स्वप्न साकार फला।

तिल-गुड़ सा बनो जीवन में,
कटुता छोड़ो, मधुर बनो।

जो बीत गया, सो सीख बना,
नए संकल्प से आगे बढ़ो।

आज सूर्य नहीं,
हमारी सोच को ऊपर उठना है।

मकर संक्रांति कहती है—
अब गिरना नहीं, केवल चढ़ना है।

अनिल आर्य...

Monday, 5 January 2026

चुनाव

रजनी

तुम
मेरे मस्तक का शोर नहीं,
हृदय की स्थिरता हो।

जिस दिन ने
तुम्हें जन्म दिया,
उसी ने मुझे
दिशा दी।

तुम्हारे साथ
प्रेम प्रदर्शन नहीं,
निभाने की क्षमता बना।

और
लाल रंग-सा यह प्रेम-
जो दिखावा नहीं करता,
पर हर अँधेरे में
दीपक-सा रोशन रहता है।

आज
यह दिन
तुम्हारा भी है
और मेरे चुनाव का भी।

जन्मदिन की व वर्षगांठ की शुभकामनाएँ, रजनी
सदैव तुम्हारा अनिल आर्य...

15 जनवरी

15 जनवरी — सिर्फ़ तुम

रजनी,
तुम दिन नहीं हो—
तुम वह वजह हो
जिससे दिन मायने रखते हैं।

उसी तारीख़ ने
तुम्हें मुझे दिया,
और मुझे
जीवन को संभालना सिखाया।

सात साल, आठ साल…
गिनती नहीं करता,
क्योंकि हर सुबह
तुम्हारे साथ
पहला ही लगता है।

तुम्हारी चुप्पी
मेरे शोर को शांत कर देती है,
और तुम्हारा विश्वास
मुझे बेहतर इंसान बनाता है।

आज
तुम्हारा जन्मदिन भी है,
और मेरा सबसे सही फ़ैसला भी—
एक ही दिन में
दो जीवन बस गए।

अगर फिर से चुनना हो,
तो भी
बिना सोचे
सिर्फ़ तुम।

दोनों दिन सदैव शुभ हों, रजनी
और
हमेशा के लिए—तुम्हारा, अनिल...

Thursday, 1 January 2026

संकल्प लो...

अब समय है—खुद को सिद्ध करने का

नववर्ष कोई तिथि नहीं है,
यह आत्मा का आह्वान है—
उठो, सँभलो,
अब स्वयं को पहचानने का समय है।

बारहवीं केवल एक कक्षा नहीं,
यह जीवन का पहला मोड़ है—
जहाँ बहाने छूटते हैं,
और जिम्मेदारियाँ नाम लेकर बुलाती हैं।

कल की भूलें बोझ न बनें,
उन्हें सीख बनाकर आगे रखो—
गलती से मत डरना,
पर उसे दोहराने की हिम्मत मत करना।

लेखन में शुद्धता लाओ,
विचारों में अनुशासन भरो—
कलम तुम्हारा चरित्र लिखती है,
और उत्तर-पुस्तिका तुम्हारा भविष्य।

आज की गई मेहनत ही
कल का आत्मविश्वास बनेगी—
याद रखना,
भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है
जो स्वयं का साथ नहीं छोड़ते।

सिर्फ़ उत्तीर्ण नहीं होना है तुम्हें,
उदाहरण बनना है—
घर के लिए गर्व,
समाज के लिए दर्पण,
और देश के लिए आशा।

मैं अंक नहीं माँगता तुमसे,
मैं तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ चाहता हूँ—
ईमानदार प्रयास,
और कभी न झुकने वाला आत्मबल।

चलो, इस नववर्ष संकल्प लें—
पढ़ेंगे, लड़ेंगे, जीतेंगे,
क्योंकि
देश का भविष्य
आज कक्षा में बैठा है।

— अनिल आर्य
(आपका हिन्दी प्राचार्य एवं कक्षा अध्यापक)