हवाओं को कह दो
खुदको आजमा लो,
फिजाअों को कह दो
कहर बरपा लो,
क़दम वापस हटा लूँ
ये मुमकिन न होगा,
चाहे मेरे रास्तों पे
काँटे बिछा लो...
शोलों की लौ कि
औकात क्या ? ? ?
गर
दिल मेँ दहकते
अंगारे बसा लो...
अनिल आर्य...
मेरा ये ब्लॉग मेरे मन के कोमल उद्गारों से विरचित है , आप सब इस पर सादर आमंत्रित हैं , अगर कोई सलाह देना चाहें तो कृतार्थ करें , आपका साथी अनिल आर्य...
हवाओं को कह दो
खुदको आजमा लो,
फिजाअों को कह दो
कहर बरपा लो,
क़दम वापस हटा लूँ
ये मुमकिन न होगा,
चाहे मेरे रास्तों पे
काँटे बिछा लो...
शोलों की लौ कि
औकात क्या ? ? ?
गर
दिल मेँ दहकते
अंगारे बसा लो...
अनिल आर्य...
रंगीन तो हैं
कपड़े
रंगों की पर
कमी है
ज़िंदगी को जो
रंग डाले
होली कभी न आई
होली की बात
छोड़ो
मन से न मनी
दिवाली
हाँ दिवाला खुल के
निकला
खुल के दिल हँसा है
हँस के तो
खुशी पायी
खुद पे हँसना
कौन गुनाह है ?
अनिल आर्य...
मेरे एहसास...
मरते गये...
और वो...
दर्द बढ़ाता गया...
इन्तेहाँ की हद...
कहर ढाने को..
वो पत्थर से...
इन्सान हुआ...
और...
सह-सहकर...
मैं...
इन्सान से...
पत्थर...
इंसानियत...
के...
पथ पर...
एक नया...
मील का पत्थर...
अनिल आर्य...
मुझे तोड़ा तो बहुत है
मेरे अपनों ने
मेरा बेशर्म सा वजूद
पर
बिखरता नहीं है ,
मैं रुकता
ठहरता
सम्भालता हूँ ख़ुदको,
फिर अपना कोई
बना देता
पराया ,
बाहर वालों की
हिम्मत
जो जट्ट से
टकरा लें ,
वो तो रिश्ते
अंदरूनी
जो तड़पा के
न मारें,
ये मुस्कुराहट लबों की
मैं हटने न दूँगा
चाहे मेरे अपने
कहर बरपा लें...
अनिल आर्य...
अर्थ के व्यर्थ मोह मेँ
फँस कर
जो रोपोगे
सो पाओगे,
पैसा होगा बहुत
मगर
जीने को
स्वच्छ पर्यावरण कहाँ से
लाओगे...
अनिल आर्य...
उन्मुक्त मन से उड़ानें भर लो,
अपने " मैं" में
बस तुम ही न रहो
सारे जहाँ को शामिल कर लो,
बदल रहा ज़माना
बदलो
खुद से भी
अब प्यार तुम कर लो...
अनिल आर्य...