Monday, 30 June 2014

क़दम वापस हटा लूँ...

हवाओं को कह दो
खुदको आजमा लो,
फिजाअों को कह दो
कहर बरपा लो,
क़दम वापस हटा लूँ
ये मुमकिन न होगा,
चाहे मेरे रास्तों पे
काँटे बिछा लो...
शोलों की लौ कि
औकात क्या ? ? ?
गर
दिल मेँ दहकते
अंगारे बसा लो...

अनिल आर्य...

Sunday, 15 June 2014

पिता जीवन का आधार
पिता इस जीवन का सार
पिता गर्म - गर्म धूप
पिता देता हमको रूप

Saturday, 14 June 2014

रंग

रंगीन तो हैं
कपड़े
रंगों की पर
कमी है
ज़िंदगी को जो
रंग डाले
होली कभी न आई
होली की बात
छोड़ो
मन से न मनी
दिवाली
हाँ दिवाला खुल के
निकला
खुल के दिल हँसा है
हँस के तो
खुशी पायी
खुद पे हँसना
कौन गुनाह है ?

अनिल आर्य...

Wednesday, 11 June 2014

ग़म

हर रोज़ 
आ ही पहुँचता है 
मेरे दर पर 
ग़म 
किसी न 
किसी बहाने से 
लाख़ बदलूँ 
मकाँ /
पता 
मुक़द्दर
मग़र माथे 
सजा है 
ढूँढ ही लेता है 
मुझे 
भरी भीड़ में 
एक 
ग़म ही तो है 
जो 
तन्हाई मेँ 
साथी बचा है 

अनिल आर्य… 

मील का पत्थर

मेरे एहसास...
मरते गये...
और वो...
दर्द बढ़ाता गया...
इन्तेहाँ की हद...
कहर ढाने को..
वो पत्थर से...
इन्सान हुआ...
और...
सह-सहकर...
मैं...
इन्सान से...
पत्थर...
इंसानियत...
के...
पथ पर...
एक नया...
मील का पत्थर...

अनिल आर्य...

Tuesday, 10 June 2014

एहसासों की क़ीमत

जिस्म से चट्टान
कलेजे से जल्लाद हुआ
रूह से शैतान हो जाऊँ
तो माफ़ करना,
हूँ ज़ख्म खाकर
मुस्कुराता
किसी दर्द से न
सिहरता
शायद
मेरी इन्सानियत
दम तोड़ने पर
तुली है,
एहसासों ने मिलकर
है इतना झँझोड़ा
कि एहसासों की क़ीमत
आज़ कुछ ना
बची है…


अनिल आर्य… 

Monday, 9 June 2014

दर्द भरी मुस्कान

मुझे तोड़ा तो बहुत है
मेरे अपनों ने
मेरा बेशर्म सा वजूद
पर
बिखरता नहीं है ,
मैं रुकता
ठहरता
सम्भालता हूँ ख़ुदको,
फिर अपना कोई
बना देता
पराया ,
बाहर वालों की
हिम्मत
जो जट्ट से
टकरा लें ,
वो तो रिश्ते
अंदरूनी
जो तड़पा के
न मारें,
ये मुस्कुराहट लबों की
मैं हटने न दूँगा
चाहे मेरे अपने
कहर बरपा लें...

अनिल आर्य...

Sunday, 8 June 2014

सक्षम

सक्षम पाता हूँ
सब कुछ करने को
मौत को भी
छल सकता हूँ
हूँ लहू का एक कतरा
वक़्त आने पर
जमता हूँ
वक्त आने पर
उबल सकता हूँ

















अनिल आर्य… 

Wednesday, 4 June 2014

पर्यावरण

अर्थ के व्यर्थ मोह मेँ
फँस कर
जो रोपोगे
सो पाओगे,
पैसा होगा बहुत
मगर
जीने को
स्वच्छ पर्यावरण कहाँ से
लाओगे...

अनिल आर्य...

Monday, 2 June 2014

love urself

उन्मुक्त मन से उड़ानें भर लो,
अपने " मैं" में
बस तुम ही न रहो
सारे जहाँ को शामिल कर लो,
बदल रहा ज़माना
बदलो
खुद से भी
अब प्यार तुम कर लो...

अनिल आर्य...

Sunday, 1 June 2014

मैं एक आईना

मेरे जज्बात मेरी रूह मैं उतर जाते हैँ
और मैं जमाने की हक़ीकत बँया करता हूँ
मुझे केवल " मैं " न समझो
मैं एक आईना हूँ
झांकता ज़माना मुझमें
सूरत नहीं
बस सीरत दिखाने को
आमादा है तबीयत मेरी...
मुझे खुद से मुहब्बत है
दीवानगी की हद तक
है खुदा से गुज़ारिश
मेरे मैं मे
मुझे भी पनाह दे...

अनिल आर्य...