Tuesday, 30 December 2014

अपने गम

सीने से लगा ले मुझको
और अपने सारे गम
मेरी रूह मैं उतार दे ,
अपने आंसुओं से भिगो दे मुझको
मेरे मैले उपमान संवार दे
नए उपमान गढ़ूं मैं
मेरे अनंत को अनंत विस्तार दे ,
मत रूठ मुझसे किस्मत मेरी
बस इतना कर उपकार दे
हर्षित कर अपना तन-मन-जीवन
जो मुझको ख़ुशी अपार दे,
सीने से लगा ले मुझको
और अपने सारे गम मेरी
रूह मैं उतार दे …

अनिल आर्य…



Saja

रोज जीने की नई नई 
वज़ह देता हूँ 
मैं खुद को ऐसे
सजा देता हूँ  … 

मकसद नहीं कोई 
बस रोतों को 
हँसा देता हूँ 
तो खुद के ग़म 
भुला देता हूँ  … 

हर-पल हर-सू 
मौत को दगा देता हूँ 
जिंदगी को जीता देता हूँ 
यूँ खुद को मैं
सजा  हूँ 
खुद को जीने की 
नयी नयी वजह देता हूँ 

अनिल आर्य  … 





सुन ले जरा

सुनता हूँ की तू
सुनता नहीं किसी की
सुना नहीं करता था मैं भी
सूना होने से पहले …

सूना होने से जाना
कहता नहीं यूँ कोई
आज सुनने को मैं तरसता
कहने को बचा न कोई …

अनिल आर्य … 

Sunday, 21 December 2014

हद है

हद है कि
मेरे प्यार की
हद नहीं जानता
समन्दर मेरा  …

बिखेर देता है
तेरी जरुरत भर
का प्यार
इन साहिलों पर  …

इसीलिए
न जान पाए
गहराई
मेरे इश्क़ की ,
मेरे अन्दर उतरने की
जरुरत न पड़ी
तुमको कभी  …

अनिल आर्य…