Sunday, 29 September 2013

मेरा समर्पण - श्राद्ध और तर्पण

मेरे जीवन के आधार 
और प्राणों के पारावार 
स्नेह निमंत्रण करो स्वीकार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार… 


आपकी महत्ता जानूं मैं 
मुझको जीवन का दान दिया 
अपने लघुत्तम जीवन मैं 
रिश्तों को महत्तम सम्मान दिया 
आज उन्ही रिश्तों को है दरकार  
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार… 

अपनी गोद मैं लेकर जब 
प्यार से दुलराया होगा 
नावाकिफ इस संसार से 
मुझको जब मिलवाया होगा 
नामुमकिन है पाना 
उस विस्मृत पल का सार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार… 


बड़ी विडम्बना जो छोड़ गए 
नन्हे फूल को डाल से तोड़ गए 
दे गए पीड़ा बहुत अपार 
छोड़ गए बीच मंझधार 
मुड कर तो देखो जरा एक बार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…

आपमें नाम की सार्थकता थी 
हम रहते थे सब कुशल-क्षेम 
माता जी, मैं और आप 
मिल कर रहते थे बड़े "प्रेम"
परिवार से जबसे "प्रेम" गया 
तबसे लगता जीवन ये भार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…


पूज्य पिता जी लो श्राद्ध और तर्पण
मेरा जीवन आप को अर्पण
मेरे रक्त के कतरे, कण-कण
आपके पदचिह्नों को समर्पण 
आपका जीवन मेरा दर्पण 
आप थे दाता और मैं कृपण 
है "प्रेम" की निधि मुझमें अपार 
आपको समर्पित सारा प्यार 
हाँ, आपको समर्पित मेरा प्यार
हे मेरे जीवन के आधार 
और प्राणों के पारावार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार 
अपने "अनिल" पर करो उपकार 
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…

   अनिल आर्य पुत्र श्री प्रेम सिंह 
   द्वारा आज  २९ सितम्बर २०१३ को अपने पिता के श्राद्ध पर सप्रेम समर्पित


Friday, 27 September 2013

चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों

अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा

साथ चलने का किया इरादा
बदलना होगा
तुम समझ न पाओगी
जज्बात मेरे
काश बदल पाता
सब हालात तेरे
आतप के इन हालातों को
अब बदलना होगा
अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा
तुम समझ न पायी
मर्म इस जीवन का
न संभाल सकी
भार इस यौवन का
प्राणी आखिर क्या जाने तमिस्त्रा का
क्या होता है  स्वाद इस सविता का
शायद न समझो अर्थ कभी इस कविता का
और न कर पाओ अंत कभी इस दुविधा का
जिस पल मिले थे
उस हर समृति को अब मुझे बदलना होगा
ठहरना अनिल का काम नहीं
अब मुझे चलना होगा

तेरी न बदल सका माफ़ कर
पर अपनी नियति को बदलना होगा
अंत मैं एक अंतहीन
सच्चाई सुन
तेरा जीवन तेरा है
मंजिल तू खुद ही चुन
एक बात का ध्यान रख
आर्ष वचन का मान रख
जो बोया तूने बबूल
आम कहाँ फिर पायेगा
तेरा किया कर्म हरदम
तेरे आगे आएगा
अनंत कैसे आखिर
अनंत सुख पायेगा
याद रख
जीवन अनंत नहीं
आखिर सबको जलना होगा
मेरी मंजिल दूर बहुत है
अब मुझको चलना होगा
चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों
कभी किसी मोड़ पर
दो अनजानों की तरह
फिर मिलना होगा  ….

                 अनिल आर्य  …

mumkin nahi hota

दूर जाकर पास आना
मुमकिन नहीं होता 
क्यूँ वादा करके निभाना 
मुमकिन नहीं होता ?
टूटे ख्वाबों का जुड़ना 
रूठे लोगों का मुड़ना 
वापस लौट के जाना 
आँखों के आंसूं पीना 
और फिर खुल के जीना 
मुमकिन नहीं होता …

         अनिल आर्य…

Thursday, 26 September 2013

पहचान

जानता हूँ की जानने के लिए
जानना ज़रूरी है
पर जान बुझ कर
मैं तुमको जानता नही हूँ
पहचान कर भी पहचानता नही हूँ...
यूँ तो
तुमसे भी ज़्यादा रंगों वाले
देखे हैं मैने
पर
सब इंसान थे
खून लाल था सबका...


                       Anil Aarya

बेहतर जानता हूँ

बेहतर जानता हूँ
की तुम्हे क्यूँ न चाहूँ ,
तुमसे नफरत हो जायेगी 
जो तुमसे मुह्हबत करूंगा

       अनिल आर्य। 

Tuesday, 24 September 2013

आम रास्ता

तेरे इल्जामात की निस्तोनाबुद्गि
के लिए इतना कहूँगा
मैं वो रास्ता छोड़ देता हूँ
जो रास्ता आम हो जाए...

Anil Aarya....

दिल - ए - नादान

इस्तकबाल के मुखातिब वो सूरत कहाँ थी,
हरिद्य मंदिर मैं हमने जिसको पनाह दी,
वो तो दिल - ए - नादान समझता नही है,
वरन मेरे सामने उसकी औकात क्या थी ???

Anil Aarya.....

get ur aim

Yun to suna karte hain ki chaand door bahut hai,
Par chaandni ki khwahish karna koi gunaah to nahi...

Anil Aarya

Tuesday, 3 September 2013

dil se khelna

आज की बात सुनो
राज की बात सुनो
बचपन मैं कहा थे एक रोज ये
एक बाप ने बेटे से की
खेल कोई खेलो अगर दिल से खेला करो
बड़ा होकर बड़ा खेल उसने खेला है फिर
और दिल से ही खेल था वो 
पर बात मैं फर्क था


kyun yaad dilata nahi

सरदी मैं किसी गरीब के झोंपड़े से आग तापना किसी का 

मुझे मेरे शामियाने की क्यूँ याद दिलाता नहीं ?

अनिल भरोसा किसी का जीत कर जो खेले कोई 

मुझे मेरे ज़माने की क्यूँ याद दिलाता नहीं ?

पहले हँसना, जख्म देकर पूछे क्यूँ रोते नहीं हो  ?

नींद उड़कर किसी की पूछे क्यूँ सोते नहीं हो  ?

किसी नायिका की क्रूरता का ये मंजर पुराना 

देखकर दिल मेरा ,

मौसम तेरा-मेरा सुहाना क्यूँ याद दिलाता नहीं है ???


teri yaaden

तनहाइयों की महफ़िल मैं

वक़्त ने खूब बरकत की है

आँखों ने भी हरकत की है,


       

 वरन तेरे लम्हों की चिंगारिया

 लपलपायी तो बहुत  हैं

  दामन मेरा जलाने के लिए… 


bewafa

हमने कब गम पालें हैं

                          यदा कदा कम पालें हैं,

इश्क की सोहबतों मैं चंद

                          बेवफा सनम पालें हैं।
                          

jeet haar

जिन्दगी की बांगबानी का बस नजारा यही है ,
जो नहीं जीता समर मैं वो अभी हरा नहीं है ।।।