Friday, 3 September 2021

गुरूजी

मैं अनिल आर्य अपनी यह कविता अपने सभी शिक्षकों को समर्पित करता हूँ। वास्तव में शिक्षक ही हमारे व्यक्तित्व व भविष्य का निर्माता है, अपने विचारों को एक कविता का रूप देने की कोशिश की है, हालांकि गुरूजी की महिमा का वर्णन कर सकने की सामर्थ्य लायक शब्द किसी भी भाषा के शब्दकोष में नहीं हैं। गुरू का व्यक्तित्व इतना विराट है कि वह शब्दों की सीमा से परे भावना की परिधि में आता है।

गुरूजी

गुरूजी विद्या का दो वरदान,
हम पढ़ें लिखें और बनें महान,
गुरूजी बालक हम नादान,
आप के बिन न मिलता ज्ञान,
गुरूजी हमारे गुणों की खान,
करना सिखाते सब का सम्मान,
गुरूजी भरते ज्ञान की झोली,
सिखाते बोलना मीठी बोली,
हम हैं बूँद गुरूजी सागर,
गुरूजी भरते ज्ञान की गागर,
जो गुरूजी की कृपा होती,
हम बालक बन जाते मोती,
गुरूजी हैं परमात्मा का रूप,
हम पौधे गुरूजी हैं धूप,
गुरूजी के दर्शन मिल जाते,
हम बालक फूल से खिल जाते,
मन की शंका का करते समाधान,
गुरूजी हमारे कृपा-निधान,
पाते गुरूजी के हाथों की थाप,
व्यक्तित्व नहीं बनता अपने आप,
डांटते गुरूजी कभी -कभार,
उससे भी होता है उद्धार,
हमें पढ़ाते और लिखाते,
गुरूजी सभ्य समाज बनाते,
गुरूजी माफ़ करते हमारी हर भूल,
गुरूजी प्रभु हम चरणों की धूल,
गुरूजी आपने हमारे दिव्य चक्षु खोले,
शब्द नहीं बने जो आपकी महत्ता बोलें,
अब वाणी को हम देते हैं विराम,
गुरूजी हमारे विष्णु गुरूजी हमारे राम।

Monday, 10 May 2021

कोरोना को क्या रोना?

कोरोना का क्या रोना???
ये तो भेद खोलता है कि कैसे हैं बाबू -शौना???
जिसका हाथ थामा था जीवन भर के लिए,
ज़रूरत में हाथ थामने के लिए वो हाथ हो ना,
जिसके साथ खेले हर खेल बचपन के,
वो बहन -भाई जब पास हों ना,
जो दोस्त कमाए जीवन भर,
नहीं चाहते वो कमाई खोना,
जो रिश्तेदार मुफ्त में बांटते फिरते थे सलाहें,
सलाह देने को वो भी पास हों ना,
तेरा भी क्या रोना कोरोना???
ऐसे चाहने वाले किसी के भी हों ना...
भगवान मेरे जैसे रिश्ते दे सभी को,
जो जान झोंक दे जरा सी आहट पे,
चाहे आए कोरोना,
दूर कभी हों ना.
यही है असली इम्युनिटी,
यही इलाजे कोरोना...
अनिल आर्य...

Friday, 7 May 2021

ख़ामोशी

थोड़ी सी ही सही, पर अब भी हसरतें क्यूँ हैं????
मेरे हिस्से में बस नफरतें ही नफरतें क्यूँ हैं???
शब्द जुबां पे लाने से पहले कितना सोचा जाए???
गलती से कुछ बोल दिया तो खुदको कितना नौचा जाए???
ख़ामोशी को लफ्जों का कफ़न बना देना ही अच्छा है,
ख़ामोशी को कोई गलत समझे तो साहेब क्या किया जाए????
बड़ों को, छोटों की सलाह की आदत ड़ाल लेनी चाहिए,
कोई अगर सही को ग़लत कहे, गलती मान लेनी चाहिए????
सलाह किसी अपने को देना भी अब गुनाह है साहेब,
सलाह न देने की सलाह ख़ुद ही मान लेनी चाहिए???
मुसीबत में हर किसी का साथ दो जरूरी बहुत है,
ख़ुद की मुसीबत हँस कर टाल देनी चाहिए???
शख्स की शख्सियत ही क्या उभरेगी जो सभी साथ दें,
अकेला भुगत अपने हिस्से का गम, अपनेपन की लकीर दुःख में निकाल देनी चाहिए???
जिसको पैमाने पे माप लें, वो गम नहीं पालते हम,
फर्क नहीं पड़ता, समुन्द्र से बाल्टी निकाल लेनी चाहिए???
बाँटने से फैलता नहीं प्यार हवा में अब तो,
कमी अब ख़ुद में अनिल निकाल लेनी चाहिए???
अनिल आर्य...

Tuesday, 30 March 2021

परिवार


आज शहर में रहते हैं,

गाँव खो गए,

आधुनिक समाज है,

सामाजिकता खो गई,

आमदनी -पैसा है, नौकरी-व्यापार  है,

भागदौड़ और  भगदड़ भी है,

बहुत कुछ पा लिया है,

अब गाड़ी तो है,

पर साथ चलने वाले यार खो दिए,


हम अब पहले से बहुत सभ्य हो गए हैं,

हाँ पर सभ्यता तो खो गई है,

संस्कार टेलीवीजन पर आते हैं,

जीवन में नहीं,

मिठाई तो खूब खाते हैं अब,

रिश्तों में पहले जैसी मिठास नहीं,

विश्वास की कविता सुनते हैं,

किसी पर विश्वास नहीं,

जीवन का तरीका बदल गया,

स्टेटस अब सिर्फ व्हाट्सप्प पर है,

और आधार का तो कार्ड ही बनता है,

जीवन का कोई आधार नहीं,

हाँ नया बहुत कुछ पा लिया,

पर

बचपन के यार खो गए,

आपसी प्यार खो गए,

अब और तो क्या कहूं,

फ़ोन हाथ में रहता है,

परिवार खो गए...

अनिल आर्य...