देश को आगे बढ़ाने के जुमले दिए थे,
जनता को मारकर के वो विकास कर रहे,
साहब कहते थे अंधेरा घर-घर का मिटाएंगे
अब फसल जला कर के वो प्रकाश कर रहे।
सुबह शाम विरोधीयों से लड़ते थे जो बात-बात पर,
साहब ने उनका भी घर तोड़ दिया आम बात पर,
व्यापारीयों मानते थे मसीहा, मनाया जश्न था,
हैं दुकानों के गेट चुनवा रहे, है ये आम बात पर।
रोजगार के वायदे पे हमने वोट दिया था,
आज छीन लिया वो, जो पहले से हाथ था,
मायने रखता है जनता का दुःख दर्द साहब को ?
रोते-बिलखतों को कब किसका साथ था???
शिक्षकों पे थोप दी 'TET' की अनिवार्यता यहाँ,
नेताओं की डिग्री का पर मिलता कोई पता कहाँ?
अनपढ़ बनकर जो देश का मुकद्दर लिखते हैं,
वो गुरुओं से माँग रहे योग्यता का प्रमाण यहाँ!
कागजों पर आंकड़े चमका कर मुस्कुराते हैं,
महंगाई की मार से रसोई को रुलाते हैं,
जो टैक्स के बोझ तले घुट-घुट के जी रहा,
उस गरीब की थाली से निवाला भी उठाते हैं।
सब बेच दिया कौड़ियों के दाम 'मित्रों' को,
धुंधला कर दिया देश के सुनहरे चित्रों को,
अग्निवीर बना कर युवाओं को चार साल का,
मजबूर कर दिया भटकने को वीर-चरित्रों को।
सच्चाई पर पहरा है, और गोदी में अखबार है,
सवाल जो पूछे कोई, तो वो देशद्रोही गद्दार है,
जुमलों की चाशनी में जहर ऐसा घोला है,
अब तो विकास ही जनता पर सबसे बड़ा प्रहार है!
अनिल आर्य...