Khamosh najren hain
Laakhon tarrane
Gungunaate hoton pe
Chuppi ka pehra hai
Kaise kahe ye
Sadiyon ki kahaani
Ek pal ka saagar hai
Lamhon se thahra hai
Ehsaas se jyada
Jajbaaton ki keemat hai
Kahahni satahi par
Phalsapha gahara hai...
Anil Aarya...
मेरा ये ब्लॉग मेरे मन के कोमल उद्गारों से विरचित है , आप सब इस पर सादर आमंत्रित हैं , अगर कोई सलाह देना चाहें तो कृतार्थ करें , आपका साथी अनिल आर्य...
Tuesday, 22 October 2013
Najren
Karva-chauth
Kisi udhed-bun main
Cycle par chala ja raha tha
Or road par ladti hui
Do gaayon ke bade bade seengo
Se jab baal baal bacha
To unaayaas hi yaad aaya
Ki tu abhi zinda hai
Nahi pata kahaan
Kis haal main
Par tu zinda hai
Or aaj fir se
tune varta rakha hai
Tabhi main salaamat hun
Or soch raha hun
Ki tu shaayad zinda hai
Ya to baahar kahin
Ya fir mere zehan main
Hai zarur tera vajood...
Anil Aarya....
Thursday, 17 October 2013
gumsum aankhen
गुमसुम सी हैं आँखें मेरी
की पानी बह नहीं पाता
अक्सर ख़ामोशी की दबिश में
चुप रह जाता हूँ
मैं कुछ कह नहीं पाता
बहुत गहराई तक हलचल मचा देता है
वो अश्क जो आँख से बह नहीं पाता
सोचता हूँ की काश तू न जानता
की ये शख्स तेरे बिन रह नहीं पाता
अनिल आर्य …
की पानी बह नहीं पाता
अक्सर ख़ामोशी की दबिश में
चुप रह जाता हूँ
मैं कुछ कह नहीं पाता
बहुत गहराई तक हलचल मचा देता है
वो अश्क जो आँख से बह नहीं पाता
सोचता हूँ की काश तू न जानता
की ये शख्स तेरे बिन रह नहीं पाता
अनिल आर्य …
Tuesday, 15 October 2013
chhappar phaad ke
भगवान् देता है
जब भी ख़ुशी से
देता है
छप्पर फाड के
और जाट सोया शेर है
छेडो मत
वरना देगा जूती झाड के
tera ant mera anant
मेरे अनंत से
तेरा अंत हो गया
मैं संत जिस मंदिर से हुआ
तू उसी का महंत हो गया
अनिल
तेरा अंत हो गया
मैं संत जिस मंदिर से हुआ
तू उसी का महंत हो गया
अनिल
bas itna paya
बहुत कुछ खोया
बस इतना पाया
की वो मेरे लायक नहीं है
जिसने कहा था कभी
नालायक मुझे …
अनिल आर्य
Monday, 14 October 2013
chaahat
खुद को आजमाना चाहता हूँ
तुम से दूर जाना चाहता हूँ
हार कर जीतना
जीत कर हार जाना चाहता हूँ
इस तेरे इंद्रजाल को भेद कर
पार पाना चाहता हूँ
ज्यादा मेरी चाहत नहीं
इक छोटा सा शामियाना
चाहता हूँ
तंग आ गया हूँ
इन बंद कमरों की घुटन से
इक नया जहां बसाना
चाहता हूँ
खुद को आजमाना चाहता हूँ
तुम से दूर जाना चाहता हूँ
अनिल आर्य
14-10-2013
8:45
तुम से दूर जाना चाहता हूँ
हार कर जीतना
जीत कर हार जाना चाहता हूँ
इस तेरे इंद्रजाल को भेद कर
पार पाना चाहता हूँ
ज्यादा मेरी चाहत नहीं
इक छोटा सा शामियाना
चाहता हूँ
तंग आ गया हूँ
इन बंद कमरों की घुटन से
इक नया जहां बसाना
चाहता हूँ
खुद को आजमाना चाहता हूँ
तुम से दूर जाना चाहता हूँ
अनिल आर्य
14-10-2013
8:45
meri baat uski jabaani
bhai Naveen ji likhte hain
Unke deedar ko zamane nikle.
Jinko kureda wo zakhm purane nikle.
Jisne apna kaha vahi begane nikle.
Jane kaisi kashish thi usme..
Us shaks ke hajaro diwane nikle.
Jo hota tha aabaad mohabbat se kabhi..
Us dil me khandhahar virane nikle.
Ek naya zakhm dete gaye wo hame..
Wo jab jab hame "Naveen" aazmane nikle.
....... Naveen Deshwal
Unke deedar ko zamane nikle.
Jinko kureda wo zakhm purane nikle.
Jisne apna kaha vahi begane nikle.
Jane kaisi kashish thi usme..
Us shaks ke hajaro diwane nikle.
Jo hota tha aabaad mohabbat se kabhi..
Us dil me khandhahar virane nikle.
Ek naya zakhm dete gaye wo hame..
Wo jab jab hame "Naveen" aazmane nikle.
....... Naveen Deshwal
Sunday, 13 October 2013
Saturday, 12 October 2013
PREM ka LOH STAMBH
Aaj jab sochta hun
Kya kamaya
Pata hun
Dukh
Takleef
Krodh
Nafrat
Jung ka mahaul
Or wo sab
Jis se karta hun nafrat....
Is sab main kahan hai
Wo PREM
Jiski amaanat mili hai mujhe
Jo basa hai mere lahu main
Jo bahta hai rag-rag
Jis_se jindgi mili hai mujhe...
Rakhna hoga jinda usey
Ek chingari ban Kar
Ki Jo chingariaan ban jaayen
Or veeraaniyon ke shoolon
Main dhal Kar
Jala Kar nafraton ko
Us khaak se taiyaar Karen wo jameen
Ki lahlahaaye ye sayamlaa
Fir ek baar
Fir ek baar
aman ki saans le
Ye Hindustan
Or main, main na rahun
Ban Jaun PREM ka
Wo LOH STAMBH
ki jise Jung na lage....
Anil Aarya...
Kya kamaya
Pata hun
Dukh
Takleef
Krodh
Nafrat
Jung ka mahaul
Or wo sab
Jis se karta hun nafrat....
Is sab main kahan hai
Wo PREM
Jiski amaanat mili hai mujhe
Jo basa hai mere lahu main
Jo bahta hai rag-rag
Jis_se jindgi mili hai mujhe...
Rakhna hoga jinda usey
Ek chingari ban Kar
Ki Jo chingariaan ban jaayen
Or veeraaniyon ke shoolon
Main dhal Kar
Jala Kar nafraton ko
Us khaak se taiyaar Karen wo jameen
Ki lahlahaaye ye sayamlaa
Fir ek baar
Fir ek baar
aman ki saans le
Ye Hindustan
Or main, main na rahun
Ban Jaun PREM ka
Wo LOH STAMBH
ki jise Jung na lage....
Anil Aarya...
Monday, 7 October 2013
Nakaabposh
मैंने दिल की सुनी उसने दिमाग की
वरना मैं उनको दिल क्यों देता ?
काश हमें भी खुदा उनकी तरह
दिमाग एक
दिल सौ देता
वो तो समय रहते टूटा सपना हमारा
वरना हकीकत समझ के मैं रो देता
वो हकीकत से दूर हैं
इसलिए सपनों मैं आते हैं
खुद महमाँ हैं
और हमें महमाँ बतलाते हैं
वो आईना नहीं देखते
आईने से कतराते हैं
कहीं दिखला न दे सच्चाई
घबराते हैं
खुद से अकेले में मिलने पर
डर जाते हैं
अपने नकाबपोश चेहरों मैं से
असली भूल जाते हैं…
यही आज के समाज का दस्तूर है
के वो सच्चाई से कोसों दूर है
जो सब को पसंद वो आततायी क्रूर है
ओर जो नापसंद वो बेकसूर है….
अनिल आर्य
वरना मैं उनको दिल क्यों देता ?
काश हमें भी खुदा उनकी तरह
दिमाग एक
दिल सौ देता
वो तो समय रहते टूटा सपना हमारा
वरना हकीकत समझ के मैं रो देता
वो हकीकत से दूर हैं
इसलिए सपनों मैं आते हैं
खुद महमाँ हैं
और हमें महमाँ बतलाते हैं
वो आईना नहीं देखते
आईने से कतराते हैं
कहीं दिखला न दे सच्चाई
घबराते हैं
खुद से अकेले में मिलने पर
डर जाते हैं
अपने नकाबपोश चेहरों मैं से
असली भूल जाते हैं…
यही आज के समाज का दस्तूर है
के वो सच्चाई से कोसों दूर है
जो सब को पसंद वो आततायी क्रूर है
ओर जो नापसंद वो बेकसूर है….
अनिल आर्य
Wednesday, 2 October 2013
दूर रहो
कुछ चीजें
बस देखने तक ही सही हैं
जी चाहे छूने को
पर छूने की नहीं हैं…
इन का काटा
नहीं मांगता पानी
हालत हो जाती है खस्ता
याद आ जाती है नानी …
ये खूबसूरत मौत के फरिस्ते हैं
जिनको पाने को हम तरसते हैं
मौत होती है तब जिन्दगी से प्यारी
यानि राहू-केतु होते हैं भारी ,
बात मानो रहो इनसे दूर
वरना मरोगे बेक़सूर …
अनिल आर्य ….
Sunday, 29 September 2013
मेरा समर्पण - श्राद्ध और तर्पण
मेरे जीवन के आधार
और प्राणों के पारावार
स्नेह निमंत्रण करो स्वीकार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
आपकी महत्ता जानूं मैं
मुझको जीवन का दान दिया
अपने लघुत्तम जीवन मैं
रिश्तों को महत्तम सम्मान दिया
आज उन्ही रिश्तों को है दरकार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
अपनी गोद मैं लेकर जब
प्यार से दुलराया होगा
नावाकिफ इस संसार से
मुझको जब मिलवाया होगा
नामुमकिन है पाना
उस विस्मृत पल का सार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
बड़ी विडम्बना जो छोड़ गए
नन्हे फूल को डाल से तोड़ गए
दे गए पीड़ा बहुत अपार
छोड़ गए बीच मंझधार
मुड कर तो देखो जरा एक बार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
आपमें नाम की सार्थकता थी
हम रहते थे सब कुशल-क्षेम
माता जी, मैं और आप
मिल कर रहते थे बड़े "प्रेम"
परिवार से जबसे "प्रेम" गया
तबसे लगता जीवन ये भार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
पूज्य पिता जी लो श्राद्ध और तर्पण
मेरा जीवन आप को अर्पण
मेरे रक्त के कतरे, कण-कण
आपके पदचिह्नों को समर्पण
आपका जीवन मेरा दर्पण
आप थे दाता और मैं कृपण
है "प्रेम" की निधि मुझमें अपार
आपको समर्पित सारा प्यार
हाँ, आपको समर्पित मेरा प्यार
हे मेरे जीवन के आधार
और प्राणों के पारावार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार
अपने "अनिल" पर करो उपकार
जरुरत है, भेजो थोडा प्यार…
अनिल आर्य पुत्र श्री प्रेम सिंह
द्वारा आज २९ सितम्बर २०१३ को अपने पिता के श्राद्ध पर सप्रेम समर्पित
Friday, 27 September 2013
चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों
अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा
साथ चलने का किया इरादा
बदलना होगा
तुम समझ न पाओगी
जज्बात मेरे
काश बदल पाता
सब हालात तेरे
आतप के इन हालातों को
अब बदलना होगा
अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा
तुम समझ न पायी
मर्म इस जीवन का
न संभाल सकी
भार इस यौवन का
प्राणी आखिर क्या जाने तमिस्त्रा का
क्या होता है स्वाद इस सविता का
शायद न समझो अर्थ कभी इस कविता का
और न कर पाओ अंत कभी इस दुविधा का
जिस पल मिले थे
उस हर समृति को अब मुझे बदलना होगा
ठहरना अनिल का काम नहीं
अब मुझे चलना होगा
तेरी न बदल सका माफ़ कर
पर अपनी नियति को बदलना होगा
अंत मैं एक अंतहीन
सच्चाई सुन
तेरा जीवन तेरा है
मंजिल तू खुद ही चुन
एक बात का ध्यान रख
आर्ष वचन का मान रख
जो बोया तूने बबूल
आम कहाँ फिर पायेगा
तेरा किया कर्म हरदम
तेरे आगे आएगा
अनंत कैसे आखिर
अनंत सुख पायेगा
याद रख
जीवन अनंत नहीं
आखिर सबको जलना होगा
मेरी मंजिल दूर बहुत है
अब मुझको चलना होगा
चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों
कभी किसी मोड़ पर
दो अनजानों की तरह
फिर मिलना होगा ….
अनिल आर्य …
हमें अब चलना होगा
साथ चलने का किया इरादा
बदलना होगा
तुम समझ न पाओगी
जज्बात मेरे
काश बदल पाता
सब हालात तेरे
आतप के इन हालातों को
अब बदलना होगा
अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा
तुम समझ न पायी
मर्म इस जीवन का
न संभाल सकी
भार इस यौवन का
प्राणी आखिर क्या जाने तमिस्त्रा का
क्या होता है स्वाद इस सविता का
शायद न समझो अर्थ कभी इस कविता का
और न कर पाओ अंत कभी इस दुविधा का
जिस पल मिले थे
उस हर समृति को अब मुझे बदलना होगा
ठहरना अनिल का काम नहीं
अब मुझे चलना होगा
तेरी न बदल सका माफ़ कर
पर अपनी नियति को बदलना होगा
अंत मैं एक अंतहीन
सच्चाई सुन
तेरा जीवन तेरा है
मंजिल तू खुद ही चुन
एक बात का ध्यान रख
आर्ष वचन का मान रख
जो बोया तूने बबूल
आम कहाँ फिर पायेगा
तेरा किया कर्म हरदम
तेरे आगे आएगा
अनंत कैसे आखिर
अनंत सुख पायेगा
याद रख
जीवन अनंत नहीं
आखिर सबको जलना होगा
मेरी मंजिल दूर बहुत है
अब मुझको चलना होगा
चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों
कभी किसी मोड़ पर
दो अनजानों की तरह
फिर मिलना होगा ….
अनिल आर्य …
Thursday, 26 September 2013
Tuesday, 24 September 2013
Tuesday, 3 September 2013
kyun yaad dilata nahi
सरदी मैं किसी गरीब के झोंपड़े से आग तापना किसी का
मुझे मेरे शामियाने की क्यूँ याद दिलाता नहीं ?
अनिल भरोसा किसी का जीत कर जो खेले कोई
मुझे मेरे ज़माने की क्यूँ याद दिलाता नहीं ?
पहले हँसना, जख्म देकर पूछे क्यूँ रोते नहीं हो ?
नींद उड़कर किसी की पूछे क्यूँ सोते नहीं हो ?
किसी नायिका की क्रूरता का ये मंजर पुराना
देखकर दिल मेरा ,
मौसम तेरा-मेरा सुहाना क्यूँ याद दिलाता नहीं है ???
Friday, 30 August 2013
Monday, 17 June 2013
Fitrat
आदत न बदली तेरी भी
फितरत न बदली तेरी क्यूँ ?
पहले दिल जलाया करती थी
अब दिया जलती है मेरी कब्र पर…
पहले माथे पे शिकन चढ़ाती थी
अब चादर चढ़ाती है मेरी कब्र पर….
पहले जीते जी मुझको मार दिया
अब मुर्दे को मारे क्यूँ रोज - रोज ?
आदत न बदली तेरी भी
फितरत न बदली तेरी क्यूँ ?
क्यूँ परेशाँ तू मेरी राह तके
क्यूँ परेशाँ तू मुझको खोज-खोज....
जो बीत चुका
वो बीत गया
वापस न फिर आ पायेगा
ये इतिहास मुड़-मुड़ कर
अनिल आर्य
Saturday, 15 June 2013
हकीकत
अब लम्हों की सिफारिश न कर
तू मुझ से गुजारिश न कर
मैं कलंदर एक दरगाह का
मुझ से तू इबादत न कर
जो बीता भूल जा
अब उसकी शिकायत न कर
अ दिल कुछ भी कर
चंद रोज का मेहमान अनिल
अँधेरे में चरागां से नफ़रत न कर
शान से जी हकीकत में
हकीकत से तिजारत न कर
सपनों से मोहब्बत न कर
जद्दोजहद के जीवन मैं
इतनी हिमाकत न कर
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