Friday, 3 April 2015

चाहत

मेरा तो रब तुम्हीं हो,
और मुझे मेरा रब चाहिये;
मुझे तो बस तुम्हारी चाहत
और तुम्हे सब चाहिये...

यही अफ़साना मेरी नादान मुहब्बत का,
की मुझे वो आज चाहिये, अब चाहिये;
और तरीका-  ए-  महबूब मेरा उम्दा इतना,
न उसे मेरी आज ज़रूरत और न ही कल चाहीये...

तड़पाकर मुझे वो हुस्न का सागर उंडेलता रेत पर,
और दो बूँद का प्यासा मैं, मेरी रूह तक भी सूख गयी
अनिल ये जलवा रजनी का है और मुझे सूरज चाहिये,
सूरत नहीँ सूझती अंधकार इतना, मुझे सीरत चाहिये.

अनिल आर्य...