Tuesday, 30 December 2025

रजनी - मेरे जीवन का आधार


रजनी - मेरे जीवन का आधार

रजनी,
तुम्हारा नाम
मेरे जीवन में
किसी शोर की तरह नहीं आया,
तुम आईं
जैसे सुबह—
बिना पूछे,
पर सब कुछ बदलती हुई।

जब मेरी तैयारी
नियति की मेज़ पर
ठुकरा दी गई,
और ईमानदारी
सूची में सबसे नीचे रखी गई—
तब तुमने
मुझसे कोई सवाल नहीं किया,
बस मेरा हाथ
थामे रखा।

मैं घर के पास रहना चाहता था,
तुमने मुझे
घर बना कर दे दिया।

अनायरा
तुम्हारे भीतर पल रही थी,
और तुम
अपने भीतर भविष्य गढ़ रही थीं—
किताबों के पन्नों पर,
और धैर्य की सीमाओं पर,
गढ़े नए आयाम तुमने।

रातें जब
मेरी चुप्पी से भर गईं,
तुमने शब्द नहीं माँगे,
बस पास बैठकर
मेरी साँसों को
सामान्य होने दिया।

जब रातें लंबी हुईं,
और रास्ते छोटे पड़ गए,
तुमने दीप बनकर
मेरे भीतर उजाला रखा।

आज
पावनी की सरलता में,
रणविजय की दृढ़ आँखों में,
मैं तुम्हारा मौन त्याग
पहचान लेता हूँ।

रजनी,
प्रेम अगर केवल
मुस्कान और स्पर्श होता,
तो वह इतना गहरा नहीं होता,
न ही होते उसके इतने मायने।

प्रेम वह है—
जो कठिन समय में
एक-दूसरे को
कमज़ोर होने की
अनुमति देता है,
सिर्फ आंखों से
थाम लेता है हाथ,
बनता है पतवार,
खेता है नाव,
सहता है धूप,
बनता है छाँव।

जनवरी 2017
हमारी कहानी की
सिर्फ़ एक माह नहीं,
वह अध्याय है
जब दो अधूरे मन
एक-दूसरे के
उत्तर बन गए।

अगर जीवन
फिर से चुनने को मिले—
तो मैं वही कठिन रास्ता चुनूँगा,
बस शर्त यही होगी
कि उस राह पर
तुम चल रही हो।

पंद्रह जनवरी
मेरे लिए तारीख़ नहीं,
एक प्रतिज्ञा है—
कि हर जन्म में
चुनूँगा तुम्हें ही बस,
भले समय विपरीत हो
भले भाग्य रूठा हो,
भले वो साथ छोटा हो,
पर हो बस तुम्हारे साथ।

तुम मेरी पत्नी नहीं रजनी,
तुम वह प्रार्थना हो
जो मैंने कभी
ज़ोर से नहीं माँगी-
पर जीवन ने
सुन ली।

तुम मेरी संगिनी नहीं रजनी,
तुम मेरी स्थिरता हो,
और अगर जीवन युद्ध है-
तो मेरी सबसे मजबूत ढाल भी तुम हो।

शादी की वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएँ।
मेरे जीवन की
सबसे शांत
और सबसे मजबूत स्त्री,
तुम्हारा साथ
मेरे जीवन का
सबसे सुंदर निर्णय है। 

तुम्हारा अनिल आर्य...

Monday, 29 December 2025

मेरे त्रिलोक

मेरे त्रिलोक

अनायरा अनंत आकाश,
नील विस्तार, उम्मीद की आस—
उसकी दृष्टि में दूर क्षितिज,
जहाँ स्वप्न लेते प्रथम श्वास।

पावनी पानी पाताल,
ज्यों गंगा-जल, शीतल, विशाल—
हर स्पर्श में करुणा बहती,
हर बूँद मिटाए मन का ज्वाल।

रणविजय — शिव रण-भूमि धरा,
कैलाश-सा स्थिर, पर्वत-सा गहरा—
जहाँ संघर्ष भी साधना बने,
और मौन में छुपा हो विजयी पहरा।

मेरा त्रिलोक,
वह धरा भी है, शिखर भी,
आकाश भी है, पाताल भी,
और वह मौन भी,
वाचाल भी।

वह शरारती भी है गंभीर भी,
मन चंचल भी, धरे धीर भी
वह रण भी है, संन्यास भी—
जहाँ पग-पग कर्म की अग्नि जले,
और मन में बसे विश्वास भी।

आशीष हो यह—
आकाश इन्हें दिशा दे सदा,
जल जीवन को निर्मल रखे,
धरती धैर्य और बल दे,
और शिव-तत्त्व सत्य-पथ पर
इनके चरण सदा स्थिर रखे।

 मंगल हो। शुभ हो। कल्याण हो। 

अनिल आर्य...

समय की तीन आवाजें

समय की तीन आवाज़ें
(तीन वक्ताओं का मंच-पाठ)


अनायरा  (उत्साह व गति – आधुनिक स्वर):

बारह बजे!
घड़ी बोली—
नया साल आया!
धूम- धड़ाका,
शहर जागा—
रोशनी नाची,
दुनिया कहे—
आगे बढ़ो! तेज़ बढ़ो!


पावनी (शांत, गम्भीर – परंपरागत स्वर):

सुना मैंने भी यह शोर,
पर चैत्र की हवा
कुछ कहती है और —
धीरे चलो…
जड़ें देखो…
धरती को समझो,
धड़कन को जानो,
परायों को छोडो,
अपनों को पहचानो।


रणविजय (स्थिर, दृढ़ – विवेक की आवाज़):

रुको!
यह लड़ाई सालों की नहीं,
यह टकराव है,
पर—
समय का नहीं,
समझ का,
स्वर दो
भाव को,
भर दो इस,
घाव को।


अनायरा:
दुनिया रुकती नहीं!
कैलेंडर बदलता है,
योजनाएँ बनती हैं—
यही प्रगति है,
खुशहाली है।

पावनी:
पर बिना ऋतु के ज्ञान,
बिना स्मृति के,
प्रगति भी
खोखली हो जाती है,
लय नहीं पाती है।

रणविजय:
एक हाथ में
ग्रेगोरियन की घड़ी हो,
दूसरे में
भारतीय नववर्ष की मिट्टी,
यही संतुलन है!
यही सामंजस्य भी,
और है, स्थायित्व यही।

अनायरा (थोड़ा ठहरकर):
तो नया साल मनाना गलत नहीं?

पावनी:
नहीं—
उत्सव तो जीवन है।

रणविजय:
गलत है
बस अंधानुकरण।

अनायरा:
जनवरी सिखाती है—
दुनिया से जुड़ना!

पावनी:
चैत्र सिखाता है—
प्रकृति से जुड़ना!

रणविजय:
और विवेक सिखाता है—
दोनों को साथ रखना!
मिलकर चलना,
छोड़ो,
आँखे मलना,
जानो,
यही तो है छलना।

तीनों (एक साथ, ऊँचे स्वर में):
न तो यह छोड़ो,
न उसे नकारो!
इसको भी मानो—
उसको भी जानो!
सच पहचानो

अनायरा:
घड़ी बदले—

पावनी:
ऋतु बदले—

रणविजय:
पर चेतना भी बदले!

तीनों (समापन, दृढ़ स्वर में):
तभी हर नववर्ष
तारीख़ नहीं—
संस्कार बनेगा,
संवेदना बनेगा,
सभ्यता बनेगा!
हर मन जगेगा,
तब—
और 
केवल तब—
नव-वर्ष सजेगा।

अनिल आर्य...

Saturday, 27 December 2025

“अपनी जड़ों की पुकार”

“अपनी जड़ों की पुकार”

दीप जलते थे आँगन–आँगन,
पर आज झिलमिल लाइटें आईं—
तारों से ज्यादा चमक रही हैं
पर-छाया, मन पे छाई ।

तीज की हरियाली फीकी,
सावन सूना–सा लगता,
मोबाइल की चमक में खोकर
लोकगीत अब कौन सुनता?

केक काटे, टोपी पहनी,
खुशियाँ उधार सी आईं—
अपनों के पर्व बेमोल हुए,
यह कैसी आँधी छाई?

कारण सरल, पर गहरे हैं—
आकर्षण, बाज़ार, दिखावा,
पश्चिम की चकाचौंध में
अपना सच लगता भटकावा।

मीडिया ने रंग बदले हैं,
विज्ञापन बने संस्कार,
जो बिकता है वही सुहाए,
मूल्य हुए व्यापार।

पर प्रभाव भी चुप नहीं रहते—
रिश्ते धीरे-धीरे छूट रहे,
संस्कृति के दीप बुझ–बुझकर
आत्मा तक टूट रहे।

पर्व नहीं थे केवल उत्सव,
जीवन–बोध सिखाते थे,
माटी, नारी, ऋतु, प्रकृति—
संतुलन समझाते थे।

अंधानुकरण की इस दौड़ में
पहचान धुँधली होती जाए,
जो अपनी जड़ों से कट जाए
वह वृक्ष कहाँ फल पाए?

न विरोध विदेशी खुशियों से,
न नफरत का कोई भाव—
बस इतना हो स्मरण हमें
संभाल रखो अपना स्वभाव।

सीखो जग से, खुला मन रखो,
पर मत छोड़ो अपना घर,
तीज, दीप, होली, सावन—
यही हमारी असली धरोहर।

आओ फिर से पर्व सजाएँ
पर माटी की खुशबू के साथ,
भारत-भविष्य सुरक्षित होगा,
न छूटेगा अपनों का हाथ।

अनिल आर्य...

Thursday, 18 December 2025

मेरा स्कूल

मेरा स्कूल 

मेरा स्कूल प्यारा-प्यारा,
रंग-बिरंगा है यह सारा।
सुबह-सुबह जब मैं जाऊँ,
हँसते-हँसते गीत सुनाऊँ।

घंटी बोली टन-टन-टन,
खुश हो जाता मेरा मन।
मैडम जी जब हमें पढ़ातीं,
कहानी से सपने भर लाती।

क, ख, ग में खेल-खेल,
सीखें हम सब मिलाके मेल।
दोस्तों संग हँसी-ठिठोली,
रिसेस में मिलती सब टोली।

खेल-कूद हों मस्ती वाली,
स्कूल में रहती खुशहाली।
मुझे मेरा स्कूल है भाता,
मुझको अच्छा इंसान बनाता। 

अनायरा...अनिल आर्य 

Thursday, 27 November 2025

मोहित–संजना : आर्शीवाद गीत

मोहित–संजना : आर्शीवाद गीत

मोहित का मन मुस्काए,
संजना का रूप लजाए—
दो दिल मिले आज ऐसे,
जैसे सावन झूम के आए।

जीवन की राहें खिलेंगी,
नेह की वेला बहेंगी—
ईश्वर का वरद–हाथ रहे,
हर पल खुशियाँ ही मिलेंगी।

मोहित की आँखें चमकें,
संजना के सपने दमकें—
दोनों के संग आए पल,
जैसे मीठे सुर छलकें।


संजना की प्यारी वानी,
मोहित को लगे निराली—
जैसे चांदनी की धुन हो,
या बंजर में फैली हरियाली।

घर में शुभ पल छाए हों,
दुगुनी खुशियाँ लाए हों—
दोनों के संग ईश्वर बैठे,
वरदानों के फूल खिलाए हों।

 शुभकामनाएँ

सुख के सागर बहते जाएँ,
जल्दी से परिवार पूर्ण हो जाए—
मोहित–संजना संग जीवन में,
रोज़ नया आनंद उतर आए।

घर आँगन मंगल से भर जाए,
स्नेह की ज्योति सदा जलाए—
ईश्वर रखे दोनों का साथ,
हर कदम शुभ पल ही आएँ।

सप्रेम : अनिल आर्य...

Monday, 17 November 2025

जीवन का नया अध्याय : नीलानंद


आनंद-
तेरा स्वभाव ही तेरी पहचान है।
तेरा स्नेह सरल,
तेरी नीयत निर्मल,
और तेरी संगत
हर परिस्थिति में अटूट रही है।

तू वह मित्र है
जिसका साथ विश्वास बनकर चलता है,
जिसकी मुस्कान में अपनापन,
और जिसके शब्दों में
सीधी–सच्ची गर्माहट रहती है।

तेरा मन पारदर्शी है—
इसलिए हर रिश्ता
तेरे पास आकर सुरक्षित महसूस करता है।

अब जब नीलम जीवन में आएगी,
तेरा यही स्नेह
घर का आधार बनेगा,
और तेरी यही स्थिरता
उसे जीवन की सहज डोर थमा देगी।

नीलम—
मणि-सी शांत,
सुगंध-सी सौम्य।
उसकी उपस्थिति
घर को रौशनी से भर देगी।

उसकी विनम्रता
रिश्तों को कोमल बनाती देगी,
और उसकी मधुर दृष्टि
भविष्य को नया आधार देगी।

आनंद की सादगी
और नीलम की शांति—
ये दोनों मिलकर
एक संतुलित, सौभाग्यमय जीवन-पथ रचेंगे।

अनिल के हृदय में
आनंद के लिए सदा एक जगह रही है—
जहाँ भरोसा भी है,
और गर्व भी।

अनिल जानता है—
आनंद जैसा भाई
किस्मत का दिया हुआ दीप है;
सुख में संग,
और दुःख में छाया-सा साथ निभाने वाला है

अब क्या ही कहुँ 
की आनंद को नीलम मिली,
या नीलम को हीरा मिला,
बस यह साथ मोतियों की माला से सुन्दर है।

आज भी अनिल की हर दुआ
आनंद के सिर की बला टालती है,
हौसला बुलंद करती सलाह मेरी,
हर मुश्किल का हक़ निकालती है।


मित्र नव अध्याय यह,
इसमें इतना, धीरे बोलो—
कि प्रेम अपने आप गूंज उठे।
मन से सुनो—
कि समझ की हर गाँठ
स्वतः खुल जाए।

सम्मान को
हर बातचीत का प्रथम पायदान बनाओ,
और धैर्य को
उसका स्थायी दीप—
इन्हीं से घर का राग
सुमधुर रहता है।

विचार भिन्न हों
तो आवाज़ नहीं,
नज़र ऊँची करो—
यही क्षण प्रेम को गहराई देता है।

और इस यात्रा को
एक ही लय में चलाना—
क्योंकि लय ही वह नाव है
जो दो दिलों को
एक धारा पर आगे बढ़ाती है।

ईश्वर करे,
तुम दोनों के जीवन में
केवल सहजता और सुख बसे।
दोनों के हर कदम पर
प्रभु कृपा साथ रहे।
सुख का वृक्ष फैले,
शांति की धारा बहे,
और विश्वास का दीप
सदा तुम्हारा मार्ग आलोकित करे।

एक नवदीप जले,
जो अपनी रौशनी से घर भर दे,
भविष्य सुरक्षित कर दे,
और जीवन को नव-स्वर दे
जिससे तुम दोनों
शांत, स्थिर और सुंदर दिशा में बढ़ते जाओ।


✨ अनिल की ओर से —
आनंद और नीलम को अनंत शुभकामनाएँ।

सप्रेम : अनिल आर्य...

पावन वेला

'शिवा'भवानी-वायु-पुत्र, रण की विजय-सा खिले,
कुआँ-पूजन-दिन अंबर भर, मंगल-स्वर मिला चलें।
निर्मल-सलिल-सा जीवन उसका नित उज्ज्वल रहे,
सत्त्व-दीप्ति से पूर्ण हृदय में परम-श्रेय फलें।

ललित चरण जब स्पर्श करें इस पावन जल-धारा को,
वृद्धि-विजय-समृद्धि नित हो, हो कृपा अपार।
शौर्य, प्रज्ञा, साहस-गौरव—सब गुण जाग्रत हों,
देव-विप्र का आशीष रहे, सदा नूतन-काज संवार।

और उसी दिवस शुभ-क्षण में रीतू–योगी भी संग,
भाग्य-लेख ने रच दी जैसे सौम्य-विवाह-अंग।
व्रत-संयम, स्नेह, विश्वासों का शुभ उन्मेष खिले,
मंगल-मालिका में दोनों के जीवन-पुष्प मिले।

रीतू की मधुर सरलता ही गृह-दीपिका बनी,
योगी की दृढ़ निष्ठा से हो हर राह सुहावनी।
द्विज-स्वर वन्दन, देव-सम्मति—सब उनके साथ रहें,
दंपति-भावी-पंथ सदा सौभाग्य-ज्योति में बहें।

आज २३ नवम्बर के ये दोनों पावन प्रसंग,
मानो शुभ-ऋतु के आँगन में खिलते नील-तरंग।
एक ओर शिवा का पूजन, एक ओर वर-वधु का संग—
दोनों पर वरदहस्त रहे, हो कल्याण, हर रण-विजय-उमंग।

शिवा व रीतू–योगी पर, मंगल-वृष्टि बरसाए,
सौभाग्य-दीप प्रज्वलित हों, हर पथ लक्ष्मी जी आएँ।
सत्त्व-शांति, प्रज्ञा-प्रभा, जीवन-द्वार सजाएँ—
युग-युग तक उनके दिन शुभ हों, देव-कृपा दें, मुस्काएँ।

अनिल आर्य...

मंगल गीत

मंगल-प्रभात गीत” 🌼

शिवा का कूँआ-पूजन तथा रितू–योगी का रिंग-संस्कार

१.
आज दिवाकर दीप्त खड़ा है,
शुभ-क्षण का अभिनंदन करे।
गृह-आँगन में सौभाग्य-सुहागा,
मंगल-ध्वनि सर्वत्र फिरे।

२.
शिवा बालक के कूँआ-पूजन में
जल की ज्योति पवित्र बहे;
तेज, धैर्य, करुणा का संचय—
उसके जीवन-पथ पर रहे।

३.
कोमल चरणों में देव-कृपा हो,
वाक् में सत्य, हृदय में शील;
कर्म बने उसका सर्वोपाय—
धन्य बने वह, धैर्य-अनिल।

४.
रितू–योगी का आज संस्कार,
बंधन नव-उज्ज्वल हो जाए;
विश्वास-सरिता मधुर सुरों में
मन-हंस दोनों को बहाए।

५.
नेत्रों में दीप्ति, वाणी में माधुर्य,
संबंध रहे दृढ़, स्नेहमय;
शुचि संकल्प सदा अविचल हों—
जैसे दीपक नित स्थिरमय।

६.
गृह-परिसर में शांति वसन्ती,
आशीषों की धारा बहे;
धर्म, मर्यादा, प्रीति, समन्वय—
युगल-पथ को शोभित करे।

७.
तेईस नवम्बर—सौभाग्य-क्षण यह,
स्मृति में सदा उजास भरे;
शिवा, रितू, योगी—तीनों पर
मंगलम् देवत्व नित झरे।

उजला सवेरा

🌸 “इस एक दिन का उजाला” 🌸


आज का दिन दो दिशाओं में फूल खिला रहा है—
एक तरफ नन्हे शिवा के लिए जल का आशीष
जो पीढ़ियों की पवित्रता लेकर
उसके माथे पर उतरना चाहता है।

दूसरी तरफ रितू—
जो वर्षों से सँजोया गया निश्चय
अब योगी के हाथों में
अपना सुरक्षित ठिकाना पा रहा है।

कूँआ पूजन की घंटियाँ
और रिंग सेरेमनी की धीमी मुस्कान—
दोनों अलग हैं, पर दोनों
घर में एक ही समय उल्लास भर रही हैं।

शिवा के माथे पर पानी की पहली बूँद
और रितू की उँगली में चमकती अंगूठी—
दोनों संकेत हैं कि भविष्य
अपने सबसे कोमल रूप में
आज इस परिवार पर झुककर आशीष दे रहा है।

ईश्वर करे
शिवा की राहें सरल हों,
उसकी हँसी स्थायी हो,
और उसका आत्मबल,
हर रण में विजय पाए,
शिवा अपने भीतर
निर्भयता, कोमलता और प्रकाश—
तीनों को संतुलित करके बड़ा हो,

और रितू-योगी—
दोनों अपनी-अपनी कमज़ोरियों और सपनों को
खुले मन से एक-दूसरे में सौंपकर
जीवन की नई शुरुआत को
गंभीरता और प्रेम से सँवारें।

अपनी साझा यात्रा में
वह धैर्य, वह भरोसा,
और वह विनम्र प्रेम खोजें
जो किसी भी घर को
वास्तव में घर बनाता है।

आज 23 नवम्बर—
एक तारीख नहीं,
परिवार की स्मृतियों में,
सदैव वह दिन बन कर रहे,
जिसमें शांति, सुःख, समृद्धि,
और भविष्य का देखा हर सपना,
फल फूल कर परिपूर्ण हुआ हो,
जिसका रौपा हुआ पौधा, 
आने वाली पीढ़ीयों को धूप से बचाए।

अनिल आर्य...



Wednesday, 12 November 2025

“पिता और पुत्री— का अखंड अटूट प्रेम”

 “पिता और पुत्री —का अखंड अटूट प्रेम” 


रजनी थी त्रि-रत्नों में प्रियतम — जैसे चाँद सितारों में एक,
रणधीर सिँह की आँखों का नूर — रजनी से था प्रेम विशेष।


दिन बढ़ते, संघर्ष बढ़ा — पर न डगमगाया कभी विश्वास,
पिता का स्नेह बना संबल — अंधकार में भी न खोई आस।


नज़रें हटती नहीं कभी — चिंता जैसे छाँव बनी,
रजनी ज्यों दूर हुई — रणधीर जी की धड़कन जमी।


जब कन्यादान का क्षण आया — मन था गदगद, आँखें नम,
अनिल आर्य को सौंप दिया — जीवन का सबसे सुंदरतम धन।


बिन बात किए जो चैन न पाते — दिन में कई बार पुकार,
हर संवाद में झरता रहता — रजनी पर अपार प्यार।


फिर नन्ही परी जब आई — अनायरा, मुस्कान नई,
रणधीर जी को रजनी से भी प्यारी — बस लगी थी यही।


हर सुबह का पहला सुख अब — वह नन्ही हँसी किलकार,
मानो रजनी का बचपन फिर — गोद में आके पाता प्यार।

खुशियों को लगी नज़र —भाग्य ने फिर खेला दाँव,
पिता की तबियत बिगड़ी — पड़ी फीकी बरगद की छाँव।

फिर वो घड़ी भी आई — जब साथ अचानक छूट गया,
जीवन का सबसे पावन नाता — रजनी से एकदम टूट गया।


क्षण भर में सब उजड़ गया — वो साया, वो शांति, वो छाँव,
मन जीने को न था, पर — लगानी थी पार परिवार की नाँव।


हर पल यादों में डूबी रहीं — हर साँस में रटती नाम,
पिता गए, रजनी के मन — न भाता कोई भी काम।


जो चला गया, वो रूप बदल — फिर जीवन में लौट आया,
रजनी की गोद में मुस्काता — अब शिवा कहलाया।


ऐसा स्नेह कहाँ मिलता है — जो मृत्यु से भी पाता पार,
रजनी के जीवन में अब  — शिवा को मिलता प्यार अपार।


एक दीया ऐसा भी हो — जो इस प्रेम का फैलाए अखंड प्रकाश,
बतलाए जग को पिता का स्नेह— पुत्री का अमर, अटूट, विश्वास।

अनिल आर्य...

रजनी : पूर्णता में

भाग 3 : रजनी — प्रेम की आरती 

(अनायरा, पावनी और अंत में शिवा के साथ प्रेम की पूर्णता)

वो प्रेम नहीं था क्षणिक आकर्षण,
वो था जीवन का निर्मल सत्य,
जहाँ रजनी की आँखों में समर्पण था,
और अनिल की धड़कन में श्रद्धा का व्याकरण।

धीरे-धीरे बढ़े कदम दोनों के,
डरते, सँभलते, पर सच्चे,
हर मुलाक़ात में कुछ नया खिले-
जैसे वसंत खुद प्रेम बनकर मिले।

समय बीता, परिवार बना,
अनायरा की गूँजी किलकारी,
फिर पावनी आई — जैसे दूसरी भोर,
दो फूल खिले, माँ की ममता उमड़ी चहुँ और।

रजनी ने हँसते हुए सब सहा,
थकान भी प्रेम का व्रत बन गई,
हर बार ईश्वर को धन्यवाद कहा,
“तेरी देन से मेरी गोद भर गई।”

पर जीवन की सबसे कठिन घड़ी आई,
जब तीसरे सूरज - शिवा -को जग ने पुकारा,
तीसरे ऑपरेशन के दर्द तले भी
रजनी ने कहा — “मेरा बच्चा बस मुस्कराए जीवन सारा।”

वह दिन था जैसे तप का पर्व,
जहाँ माँ ने अपनी देह भुला दी,
और अनिल ने प्रार्थना में अपने आँसू छिपा लिए,
कि यह जन्म सिर्फ ईश्वर का लिखा हो,
कुछ छूट गया था, जैसे पुनः मिला हो।

और शिवा आया —
जैसे आकाश ने, धरती को चूमा हो,
हर पीड़ा बन गई पूजा,
जैसे बिछड़ा जन्मों का फिर मिलकर झूमा हो।

उसको पाने को, रजनी ने
स्वयं को अग्नि में तपाया,
अपना जीवन दाँव पर रख —
ममता का अमर दीप जलाया।

अनिल की आँखों में उस क्षण
श्रद्धा का सागर उमड़ा,
क्योंकि उसने देखा था —
कैसे प्रेम बनता है बलिदान का सूत्र।

आज भी जब शिवा की हँसी गूँजती है,
वो रजनी के उस व्रत का फल है,
जिसने प्रेम को पूजा बनाया,
और जीवन को एक महाकाव्य कर दिया।

यह कथा नहीं, आरती है —
जहाँ रजनी का प्रेम अनिल की आस्था बना,
और उस मिलन से जन्मा शिवा —
पवित्र प्रेम का साकार चमत्कार बना।

अब यह परिवार नहीं — एक आस्था का वृक्ष है,
रजनी उसकी जड़, अनिल उसका तना,
अनायरा-पावनी उसकी शाखाएँ,
और शिवा — उस वृक्ष का दिव्य फल बना।

रजनी का प्रेम अब ममता है,
अनिल की श्रद्धा अब आराधना है,
और यह घर — एक मंदिर है,
जहाँ प्रेम स्वयं भगवान बना।

जय हो उस रजनी के प्रेम की,
जिसने तीन बार दर्द सहा  - और हर बार नव जीवन रचा।
यह प्रेम नहीं  - यह सृष्टि की नीराजन-आरती है,
जो रूठ के चला गया था, तू दिन रात उसे पुकारती है,
विधाता ने सुनी तेरी पुकार, किया उपकार,
लोटाया सूद समेत, जो भगवन ने लिया,
पालनहार ने शिवा उपहार स्वरूप दिया।

अनिल आर्य...

रजनी : जीवन संगिनी

भाग 2 : रजनी — प्रेम का संकल्प (संघर्ष और समर्पण) 

पहली मुलाक़ात के उस मौन से,
जब नयन बोले, शब्द चुप थे,
शुरू हुआ था प्रेम का अंकुर —
जो आस्था के आँगन में रूपधन्य था।

रजनी — संकोच की स्याही में डूबी,
डरते-काँपते मन से आगे बढ़ी,
पर दिल ने कहा — “यह राह अनिल की है,
यही तो मेरी नियति की कड़ी।”

धीरे-धीरे मिलने लगे फिर दोनों,
हर बात में खिली नई सुबह,
न दिखावा, न वचन का बोझ,
बस विश्वास की निर्मल परछाई बनी वह।

अनिल की हँसी में जीवन की लय,
रजनी की आँखों में समर्पण की छाया,
दोनों के बीच जो मौन बहता,
वही प्रेम का शुद्ध सरस साया।

फिर वो दिन आया — जैसे स्वप्न साकार,
जब दो कुल हुए एक आधार,
शुभ वचन, मंगल ध्वनि, आशीषों की छाँव,
रजनी–अनिल का प्रेम बना परिवार की ठाँव।

अनिल के जीवन में भी संघर्ष था,
सपनों की ऊँचाई, पर राह में काँटे,
कितनी तैयारी, कितनी मेहनत —
फिर भी अंधी रेवड़ी अपनों को बांटे।

वो दिन थे कठिन — सपनों की डगर पर काँटे थे,
हर दिन वो दुःख रजनी ने मिलकर बांटे थे,
वो चाहता था रहना अपने जनों के पास,
माता-पिता का साथ, सेवा में विश्वास,
पर भ्रष्ट व्यवस्था के इस अंधकार में,
हर योग्यता हारती रही, न रही आस भी पास।

फिर भी अनिल ने हिम्मत न हारी,
दिल में निष्ठा, आँखों में उजियारा,
कहा — “ईश्वर की लेखनी धीमी सही,
पर चलना ही है धर्म हमारा।”


उधर रजनी का साहस था, एक अग्नि की ज्वाला,
अंदर पले भविष्य, पर मन अडिग, अटल, उजाला।
डॉक्टर बनने का सपना, आँखों में बसाए,
थकन, वेदना सब भूल, ज्ञान के दीप जलाए।

कुछ भी हुआ रजनी ने अपने पंख न मोड़े,
कठिन दिनों में भी शिक्षा की लौ न छोडे,
गर्भ में कली-पली - प्रेम की नन्ही लय,
और मन में डॉक्टर बनने का अटल ध्येय।

आख़िरी दिन तक किताबें खोली,
थकान में भी आत्मा बोली —
“माँ बनूँगी, पर अपने कर्म से,
उसके भविष्य की नींव रखूँगी।”


अनायरा आई — आँखों में आँसू,
हृदय में ममता, बाँहों में प्रेम,
पर रजनी फिर भी कॉलेज गई,
हर दिन उसे मन में लिए  - नेम।

हर सुबह निकलती कॉलेज को, बेटी को छोड़ पीछे,
ममता की धारा भीतर बहती, दृढ़ निश्चय सींचे।
रात को जब लौटती थी, आँचल में भर लेती उसे,
माँ की गोद में थकन घुलती, आशीष बनती हृदय में।

वो ममता जो रोके रखती,
और वो जिम्मेदारी जो आगे बुलाती,
दोनों के बीच रजनी चली -
जैसे दीपक आँधी में मुस्कराती।

हर व्याख्यान के साथ उसकी आँखों में,
एक प्रश्न चमकता था -
“क्या मेरी बेटी एक दिन मुझ पर गर्व करेगी?”
और उत्तर उसके कर्मों में लिखा था।

अनिल देखता रहा - उस तप की चमक,
जहाँ प्रेम, त्याग और संघर्ष एक हुए,
और समझा  - यही तो है सच्चा व्रत,
जहाँ दो आत्माएँ जीवन से ऊपर उठें।

रजनी का प्रेम अब साधना था,
अनिल की निष्ठा उसका आधार,
संघर्षों में भी खिला यह प्रेम -
जैसे कीचड़ में कमल साकार।

अनिल ने भी रजनी की दृढ़ता को नमन किया,
हर कठिन मोड़ पर संग खड़ा, उसे प्रणाम किया।
सपनों का घर बनता गया ईमान की नींव से,
दोनों ने सींचा प्रेम अपना त्याग और पीर से।

यह कथा नहीं, प्रेरणा है -
जहाँ प्रेम ने जीवन को एक नया अर्थ दिया।
रजनी और अनिल - अब दो नहीं रहे, 
मिलकर एक - पवित्र प्रेम की मूर्ति को साकार किया। 


अनिल आर्य...

रजनी: प्रथम भेंट

भाग 1 : पहली मुलाक़ात — जब नयनों ने कहा सब कुछ 

(प्रथम भेंट)

वो दिन जैसे ठहर गया था,
समय ने साँसें रोक लीं,
रजनी थी मौन, निस्तब्ध लम्बी रात सी,
कुछ कहने को था लम्बा मौन, न कोई बात थी ?

अनिल वहाँ खुला हुआ था -
जैसे जीवन की किताब रखी हो,
हर पन्ना सच्चाई से भरा,
हर शब्द में उजली रेखा लिखी हो।

रजनी बस सुनती रही चुपचाप,
जग जैसे दूर कहीं ठहर गया,
मन भीतर कुछ काँपा-सा,
पर होंठों ने कोई स्वर न कहा।

अनिल ने तर्क नहीं, भाव चुना,
दिमाग़ की जगह दिल को सुना,
न गिने लाभ, न हानि की रेखा,
आँखों में बस अपनापन देखा।

रजनी सोच न सकी, पर समझ गई,
यह मौन कोई सामान्य नहीं,
यह वो क्षण था जहाँ आत्मा बोली,
और समय भी बना साक्षी वहीं।

फूलों ने उस दिन खुशबू छोड़ी,
जैसे गवाही दे रहे हों भाव,
अनिल के शब्दों से नहीं - नज़रों से,
रजनी के मन ने पा लिया ठाँव।

वो पहली मुलाक़ात न कहानी बनी,
न किसी किताब में लिखी गई,
पर उसकी छाया आज भी है गहरी,
जैसे आरती में लौ रहती है ठहरी।

रजनी का मौन — प्रार्थना बन गया,
अनिल की वाणी — उत्तर बन गई,
और वहीं से जन्मा वो पवित्र प्रेम -
जहाँ आत्मा से आत्मा जुड़ गई।


अनिल आर्य...

Tuesday, 11 November 2025

माता शीतला — हमारे जीवन का ताप मिटाओ

“माता शीतला — हमारे जीवन का ताप मिटाओ ”

हे शीतला माँ, शीतल धारा,
हर लो दुख, संताप हमारा।
तेरे चरणों में विनती सारी,
हम सब तेरे बालक -हे सुखकारी।

अनायरा की हँसी सदा खिले,
उसकी राहों में फूल मिलें।
तेरा स्नेह बने उसकी छाया,
हर दुःख से उसको बचाया।

शिवा हमारा चंचल, प्यारा,
तेरा ही अंश, तेरी ही धारा।
उसके मन में उजियारा भर दो,
माँ, ज्ञान और साहस वर दो।

पावनी तेरी निर्मल कली,
पवित्र भावों से सजी-खिली।
माँ, उससे करो कुछ ऐसा संवाद,
जग में नाम करे, दो आशीर्वाद।

तीनों पर करो ममता-वृष्टि,
तेरे बिना है अधूरी सृष्टि।
घर आँगन में शांति उतारे,
तेरी कृपा से सब सुख उजियारे।

शीतला माँ, ये विनय हमारी —
रहो सदा जीवन की अधिकारी।
माँ तेरे आँचल की हो शीतल छाया,
मिले स्वास्थ्य, सुःख, यश, धन-माया।

🌸 जय शीतला माँ — करुणा की धारा,
तेरे बच्चे — अनायरा, शिवा, पावनी ने तुझे पुकारा। 🌸

Tuesday, 4 November 2025

“मेरा परिवार - मेरा अभिमान”

 “मेरा परिवार - मेरा अभिमान”

यह घर नहीं, मंदिर है,
जहाँ स्नेह दीप जलते हैं,
जहाँ हँसी बनकर हवा में
सपनों के पंख मचलते हैं।

प्रेम बसा है, हर कोने में,
जो परिवार का है आधार,
प्रेम अमर है, अविनाशी,
द्वेष हमें है, अस्वीकार।

पिता बिरेन्द्र सिँह — वटवृक्ष समान,
उनकी प्राणवायु से घर, रहे भरा,
उनकी छाँव से, मिट जाती थकान,
गुणशाली इतने, देवों को भी, दें हरा।

माँ सुदेश कुमारी, ममता सरिता,
थके मनों को देती विश्राम,
उनकी वाणी में, घर की गूँज,
उनकी सेवा से बनता हर काम।

अनिता संग, शक्ति का संग,
जीवन में सुख का नया रंग,
और नन्हा अयांश मुस्कराए,
घर में जैसे प्रभात उमंग।

रीतू की जोड़ी, योगी से जोड़ी,
हर दृष्टि में भरा, आशीर्वाद,
नई शुरुआत की यह कोमल-किरण,
भर दें जीवन में मधुर प्रसाद।

अमित को मिली मीत, रीतू से प्रीत,
बंधन स्नेह का अद्भुत और महान,
ये सुखद संयोग सभी बने हैं —
शिवा के शुभ कर्मों का है वरदान।

रजनी — मेरे जीवन की धड़कन,
संगिनी, सखा, स्नेह का रूप,
उसकी उपस्थिति जैसे दीपक,
मिटे अंधकार, मिले स्नेहिल धूप।

अनायरा और पावनी हैं तारे,
घर में झिलमिलाते करते हैं सारे,
उनकी हँसी में मिलता प्रेम-प्रसाद,
बोल हैं ऐसे, जैसे ईश्वर के मीठे संवाद।

और शिवा है नन्हा-प्यारा,
मुस्काता उससे घर सारा,
सबका मन हरदम बहलाता,
आशा का सूरज कहलाता।

यह परिवार, यह स्नेह-बंधन,
हर रग-रग में बसा प्रेम अपार,
यही मेरा धर्म, यही उत्सव,
यही मेरा, आर्य परिवार।

अनिल आर्य...


Friday, 31 October 2025

🌸 “पारस — उजियारा जीवन का” 🌸

🌸 “पारस — उजियारा जीवन का” 🌸

जन्म दिवस है पारस तेरा — हरियाणा दिवस का सवेरा,
सूरज ने मुस्कान बिखेरी — दूर हुआ गहन अंधेरा।
तेरे आने से जैसे घर में — चाँद उतर के आया,
हर दिल में तूने बसाया — स्नेह, और भरोसा-छाया।

पिता रणधीर सिँह की छाया — अब भी तेरे संग चलती है,
उनकी मर्यादा, सच्चाई — तेरे स्वर में पलती है।
माँ बाला के आँचल ने तुझमें — प्रेम का दीप जलाया,
उनकी आँखों की दुआओं ने — तेरा पथ आलोकित करवाया।

स्नेहप्रीत तेरी जीवन-संगिनी — मृदुल वाणी, कोमल, सुशील
उसके संग तेरा जीवन — मधुर, सुकून, मुस्कानों की झील,
अभिमन्यु तेरा उजला स्वप्न — तेरे स्वरूप की पहचान,
तेरे संस्कारों से सीखे — सच्चाई और बड़ों का करे सम्मान।

रजनी-मोनिका बहनें तेरी — स्नेह की दो धारा,
उनके हृदय में बसता तुझसे — अपनापन सारा।
तेरा मन निर्मल, वाणी मधुर — जैसे गंगा की धार,
हर जन में देखे अच्छाई — यही तेरा उपहार।

हरियाणा की मिट्टी जैसा — सच्चा, सरल, प्रखर,
वैसा ही तू पारस प्यारे — उजला, ओजस्वी स्वर।
तेरी राहें रहें सुगंधित — मन में रहे उजास,
जीवन बने उदाहरण ऐसा — जैसा होता अटूट विश्वास।

🎉 जन्मदिन मुबारक पारस!
तेरे नाम की महक रहे — हर हृदय के पास,
जीवन में तू नाम करे - मिले तुझे हर मिठास।🌼

Wednesday, 29 October 2025

💐"प्रवीण — मेरे यार का नाम" 💐

"प्रवीण — मेरे यार का नाम" 

वक़्त की धूल जब आँखों में उतर आई थी,
तब तू आया — और दुनिया फिर मुस्कराई थी।
तेरी बातें, जैसे कोई उजली दुआ हो,
तेरी सोच, जैसे खुदा की लिखी रज़ा हो। 🌿

न तू मुखौटों में ढला, न किसी रंग में सजा,
तेरे मन की सादगी ही तेरा सबसे बड़ा मज़ा।
तेरी दोस्ती वो दीप है जो आँधियों में भी जले,
तेरे जैसा दोस्त मिले, तो ग़म भी फूलों-सा लगे। 🌸

हमने देखे कई मौसम, कई चेहरे, कई साल,
पर तेरे संग बिताया हर पल लगा कमाल।
न कोई स्वार्थ, न कोई गिनती, न कोई हिसाब,
बस अपनापन — यही तेरी पहचान, यही जवाब। 🌻

तेरी बातों में ठहराव, तेरे स्वभाव में नर्म धूप,
तेरे जैसा साथ हो तो जीवन का निखरे स्वरूप।
तेरी हँसी में उजियारा, तेरे शब्दों में मिठास,
तेरी यादों से महके हर सुबह, मेरी हर साँस। 🌼

आज तेरे जन्मदिन पर दिल से यही दुआ,
तेरा हर दिन खिले जैसे खिला कमल का रूप
तेरे कर्मों की खुशबू यूँ ही फैलती जाए,
और दोस्ती का ये रिश्ता युगों - युगों मुस्काए। 🌹

तू सखा नहीं, भाई है, सौभाग्य है,
तेरे नाम में अपनापन, तेरे मन में त्याग है, वैराग्य है,
प्रवीण, तू वो अध्याय है जो हर दिल को सुहाना बनाता है,
अनिल के जीवन में तू — प्रेम और विश्वास कहलाता है। ✨


सप्रेम : अनिल आर्य...

🌟 “महिमा – महात्मय की महारानी” 🌟

🌟 “महिमा – महात्मय की महारानी” 🌟

महिमा, तू नाम नहीं, एक सुरभित एहसास है,
तेरी मुस्कान में अपनापन, तेरी नज़रों में विश्वास है।
घर का हर कोना तेरी करुणा से महकता है,
तेरे आने से हर दिन बसंत बन चमकता है।

तेरे शब्दों में ममता, तेरी आँखों में उजियारा,
तेरी दृढ़ता में दिखता है शक्ति का सहारा।
तेरे स्पर्श से खिल उठती समाहिता की हर सांस है,
तेरे आँचल में ही सजग को मिलता ममत्व का अहसास है।

तू वो धड़कन जो उनके जीवन में राग भर दे,
तेरे होने से हर पल जीवंत स्वर सा लगे।
तेरे बिना हर सुर भटकता, हर राग खो जाए,
तेरे संग ही संगीत को जीवन मिल पाए।

तेरे संग जगविन्दर का जीवन एक गान बने,
हर कठिन राह तेरे प्रेम से आसान बने।
तू वो दीपक है जो आँधियों में भी जलती रही,
थककर भी सबको राह दिखाती चलती रही।

🎂💐 जन्मदिवस नहीं, यह तेरे होने का उत्सव है,
महिमा — तू स्नेह, साहस और सौन्दर्य का स्वर है।💐🎂

🔥✨ सादर शुभकामनाएँ —
वीर जगविन्दर की संगिनी,
जीवन की मधुर प्रेरणा — महिमा! ✨🔥


सप्रेम : अनिल आर्य ---

Monday, 27 October 2025

My Mother

          🌸 My Mother 🌸
( Dedicated to my mother)

My mother is my shining sun,
She smiles and makes my worries run.
Her hug is warm, her heart so kind,
A better friend I’ll never find.
She wakes me up and makes my day,
With love and care in every way.
Her voice is soft like gentle rain,
She feels my joy, she feels my pain.
For all she does, I thank her true,
Mom, my world begins with you.

From Anira Anil arya...

Thursday, 23 October 2025

🌸 भाई दूज का स्नेह गीत 🌸

🌸 भाई दूज का स्नेह गीत 🌸

आज सजे हैं फूल द्वारे, दीप जले हर ओर,
बहना के मन में उमड़ रहा, स्नेह अपार पुरजोर।
थाली में आरती सजी है, रोली - चावल साथ,
नेत्रों में आशीष झिलमिल, अधरों पर सौगात॥

छुटकी की छिटपुट शरारतें, चंचल नयन स्नेह,
बोल में मिठास भरी है, जैसे फागुन मेह।
भाई निहारे स्नेह - दृष्टि, मन हो जाए निहाल,
जैसे पिता का हृदय उमडता, पा कर स्नेह अपार॥

भागी फिरती - पायल बजती, सुख का आता भाव,
उसके पावन पैरों छनके, हर घर आँगन - गाँव।
थाली सजे आराधन से, दीपक झलके साथ,
छोटी बहन के निर्मल मन में, बसता स्नेह-प्रभात॥

भाई आया हँसता-खिलता, मन में भाव अनूप,
बचपन जैसे लौट पड़ा हो, गलियों में लेते सर्दी-धूप।
माँ की गोदी, हँसी पुरानी, यादों का संसार,
बड़ी बहन के आँचल में छिपकर, पा ले माँ-सा प्यार॥

बडकी बोले – “सुखी रहो तुम, पथ में हो उजियार,”
भाई कहे – “तेरे आशीष से, जीवन हो साकार।”
क्षणभर को थम जाए समय, बोले मन बिन-बोल,
इस बंधन में लिपटा रहता, प्रेम अमर अनमोल॥

कहे अनिल आर्य प्रेम यही है, स्नेह यही उपहार,
भाई दूज का यह उत्सव है, जीवन का त्योहार।
जहाँ न द्वेष, न दूरी कोई, बस ममता की रीत,
बहन-भाई के इस स्नेह का, गूँजे मधुर संगीत॥

अनिल आर्य...

Wednesday, 22 October 2025

नन्हे 'शिवा' के नाम

🌸 नन्हे शिवा के नाम 🌸

आया है घर में नया जीवन,
इतना कोमल कि हवा भी ठहर जाए।
नन्हा शिवा —
तेरी साँसों में जैसे किसी प्रार्थना की सुगंध घुली है।

माँ-जी की आँखों में
अब हर सुबह तेरी मुस्कान उतर आती है,
उनके हाथों की लोरी में
सदियों की ममता गूँजती है।

दादा तुझे देखते हैं
तो उनके चेहरे पर समय रुक जाता है।
वे कहते हैं —
“यह तो मेरे आँगन का पुनर्जन्म है।”

बुआ तेरा माथा सहलाती हैं,
जैसे अपने बचपन को फिर से पा लिया हो।
चाचा तेरे रोने में हँसी ढूँढ लेते हैं,
कहते हैं — “यह तो घर की सबसे प्यारी आवाज़ है।”

परी और पावनी —
तेरे संग दो रंगों-सी खिलती हैं।
परी बड़ी है, समझदार, शांत।
दूर से देखती है तुझे अपलक,
जैसे किसी चमत्कार को।
उसकी आँखों में अचरज भी है, स्नेह भी।

पावनी छोटी है, चंचल,
हर पल चाहती है रहना तेरे पास।
गोद में लेना, दुलारना, सुलाना —
तेरे हाथ को थामे रखना ही उसकी दुनिया है।
उसकी हँसी और तेरी किलकारी
एक ही सुर में घुल जाती हैं।

माता रजनी —
अपने नाम को करती सार्थक।
रातों को जागती, निहारती, दुलारती,
तेरे हर स्पर्श को महसूस करती,
अपनी ममता के अमृत से सिंचती है।

पिता अनिल —
तेरे संग बन जाते और भी चंचल।
समय उनके लिए ठहरता नहीं,
वे हर पल तुझे निहारते हैं,
थकते नहीं, बस मुस्कुराते हैं।
उनकी आँखों में इच्छा है —
कि करो नाम रोशन परिवार का,
कि तुझमें गहराए आर्यत्व का गुण,
बनो तुम भी श्रेष्ठ, निर्मल और उज्ज्वल।
 

तू सोता है
तो पूरा घर धीरे बोलता है,
तू जागता है
तो दीवारें भी मुस्कुराने लगती हैं।

शिवा —
तेरा नाम ही शांति है,
तेरा आना ही आशीष,
और तेरे साथ
यह घर हो गया है और भी पूर्ण,
एक-दम परिपूर्ण। 

अनिल आर्य...

Tuesday, 21 October 2025

छठ मइया की अरज

🌅 छठ मइया की अरज 🌅

(कवि – अनिल आर्य)

उषा की लालिमा फूटे, अरुण किरण मुस्काय,
नदिया के जल में झुकती, आस्था सिर झुकाय।
साँझ-सवेरे घाट सजे हैं, गीत गगन तक जाएँ,
छठ मइया की महिमा गाए, सुर भरे सिरमौर गाएँ॥

करवों में अर्घ्य सजे हैं, सिंधूरित हर माँग,
सूरजदेव के स्वागत में, गूँजे मंगल राग।
सात दिनों का संयम जैसे, तप बन जाए प्राण,
हर अर्घ्य में कृतज्ञ हृदय का, झलके सौर सम्मान॥

काँस के पत्ते, गन्ने की छाँव, टोकरी में फल,
धरती, जल, अंबर, अग्नि, वायु — सबमें छिपा संबल।
माटी की गंध, लोक की बोली, स्नेह की सौगात,
छठ है जीवन का उत्सव, श्रद्धा का परिपाठ॥

भोर की बेला आए जब, उगे अरुण-प्रभु लाल,
नारी हाथ जोड़े कहती — “रखियो कुल सँभाल।”
मन में होती मौन प्रार्थना, नयनों में प्रकाश,
सूर्यदेव दें शक्ति-संतति, सुख-समृद्धि-विलास॥

कहे अनिल आर्य सुनो जगत ये, सत्य सनातन वाक्,
आस्था की थाती है यह, श्रम का यही पराक्।
छठ न केवल पर्व भक्ति का — जीवन का उत्साह,
जहाँ श्रम में तप, तप में प्रेम, प्रेम बने इतिहास॥

अनिल आर्य...

🌿 गोवर्धन-गौरव गान 🌿

🌿 गोवर्धन-गौरव गान 🌿

ब्रजभूमि की वह पावन वेला, हरित धरा मुस्काय,
इन्द्र-दर्प दलन हेतु स्वयं, नन्दलाल सुत आय।
कर-कमलों पर गोवर्धन धारण, शैल-शिखर सिरताज,
बालक रूप में ब्रह्म प्रकटे, मानवता का राज॥

वृषभानु-सुता हर्ष भरे, गोकुल गावे गीत,
गोप-गोपिका संग आनंदित, प्रकृति प्रकटे प्रतीत।
वृष्टि-विलय का यह उत्सव, श्रद्धा का आधार,
इन्द्रजाल पर विजय प्रतीक, सन्मार्ग का प्रचार॥

अन्नकूट से भरे पात्र सब, कृतज्ञता का भाव,
अन्नपूर्णा-कृपा से पोषित, जीवन पावे प्रभाव।
धरित्री के प्रति आभार का, यह शुद्ध प्रतीक महान,
हर अन्नकण में ईश्वर दीखे, हर अर्पण में सम्मान॥

प्रकृति-प्रेम का गान यही, हर हृदय में ध्वनित हो,
धर्म, दया और करुणा का, दीप सदैव प्रज्वलित हो।
इस भाव-पर्व के स्वर में गूँजे, आर्य-वाणी अपरिहार्य —
"गोवर्धन है जीवन-उत्थान", कहे कवि अनिल आर्य॥

गोवर्धन-पूजा के अंतर में, छिपा यही संदेश —
मानव-सेवा, प्रकृति-रक्षण, धर्म न तजना देश।
अहम्-त्याग कर प्रेम-पथिक बन, धर सजग मन ध्यान,
‘गोवर्धन’ है उत्थान प्रतीक, श्रद्धा का अभिनन्दन गान॥

अनिल आर्य...

Monday, 20 October 2025

🌺 दीपावली : जन-जन का मंगल पर्व 🌺

ज्योत्स्ना सी झिलमिलाती यह अमावस की रात,
अंधकार से जूझता हर दीपक बन जाता प्रभात।
घृत-बाती की लौ में जब श्रद्धा का संगम होता,
मानव मन का हर कोना तब उजियारा होता।

मिटा तमस, जग में फैले शुभ्र ज्योति का सन्देश,
हर हृदय में जग उठे सत्‌ता, प्रेम, धर्म, उपदेश।
राम लौटे जब अयोध्या, आनन्द उमड़ पड़ा था,
धरती ने दीप सजाए, नभ ने मंगल गा था।

तब से हर वर्ष मनाता भारत यह पर्व महान,
संकल्प, श्रद्धा, स्वच्छता, स्नेह जहाँ के प्राण।
लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती की पूजन में रमता भाव,
कर्म, विद्या, समृद्धि से सजता जीवन गाँव-गाँव।

कण-कण में संस्कृति झलके, दीपों की यह पंक्ति,
संघटन का सन्देश लिए जलती है अविराम शक्ति।
हर जन के जीवन में फैले सुख-शान्ति का उजियार,
हो प्रेम, दया, करुणा का जग में सदा विस्तार।

जन-जन का मंगल गान गूँजे नभ के पार,
हर हृदय बने मंदिर-सा, हर घर हो उत्सार।
हर आत्मा में दीप जले सद्‌गुण की ज्योति महान,
सर्वमंगलाय शुभं भवतु — यही भारत की पहचान।

🌼 शुभकामना-पहरा : 🌼
हे पाठक! तेरे जीवन में दीपक-सा उजास रहे,
हर दिन तेरा त्यौहार बने, हर क्षण विश्वास रहे।
सफलता तेरे संग चले, समृद्धि तेरे द्वार सजे,
स्नेह-सुगन्धि बिखेरता, तेरा जीवन दीप जले।

॥ शुभ दीपावली, सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥

अनिल आर्य 

Friday, 17 October 2025

💥 “शक्ति – नाम ही जिसकी पहचान है” 💥

💥 “शक्ति – नाम ही जिसकी पहचान है” 💥

शक्ति जीजा जी, आप वो तूफ़ान हैं,
जो रुकावटों को तोड़, खुद नई उड़ान हैं।
आपकी बातों में जोश, निगाहों में नूर है,
आप जैसा व्यक्तित्व वाक़ई भरपूर है।

आपके कदम जहाँ पड़ते हैं, राहें खुद सँवर जाती हैं,
आपकी मौजूदगी से महफ़िलें निखर जाती हैं।
संघर्ष को जिसने हँसकर गले लगाया,
उसका नाम ही ‘शक्ति’ कहलाया!

आज का दिन लाया है खुशियों की बहार,
आपके जीवन में हो सुखों की कतार।
हर सुबह बने नई उम्मीद का आग़ाज़,
हर शाम दे सफलता का अंदाज़।

🔥🌟
जन्मदिन मुबारक हो, शक्ति जीजा जी!
आपकी ऊर्जा, आपका जज़्बा – यही हमारी प्रेरणा है!
🌟🔥

🌟 “जगविन्दर – जीवन का योद्धा” 🌟

🌟 “जगविन्दर – जीवन का योद्धा” 🌟

जगविन्दर, तू नाम नहीं, एक पहचान है,
तेरी हँसी में जोश है, तेरी आँखों में उड़ान है।
हर मुश्किल को मुस्कुरा के तू हराता है,
ज़मीन पर चलते-चलते आसमान छू जाता है।

तेरे कदमों से गूंजती है जीत की गाथा,
तेरे संग हर दिल को मिलती है परिभाषा।
दोस्ती तेरी आग है, जो ठंडे लहू में जान भर दे,
तेरे जज़्बे की लपट, हर सर्द दिल को गर्म कर दे।

जन्मदिन आज तेरी जीत का पर्व बने,
हर ख्वाहिश तेरी हक़ीक़त का स्वर बने।
तू चमके यूँ जैसे सूरज सवेरा करे,
हर साल तेरा नाम जमाना से दूर अंधेरा करे।

🎂🔥 जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ,
वीरता के प्रतीक – मेरे मित्र जगविन्दर! 🔥🎂