Tuesday, 9 June 2026

जुमलों का विकास

​विकास या विनाश 


देश को आगे बढ़ाने के जुमले दिए थे,
जनता को मारकर के वो विकास कर रहे,
साहब कहते थे अंधेरा घर-घर का मिटाएंगे
अब फसल जला कर के वो प्रकाश कर रहे।

​सुबह शाम विरोधीयों से लड़ते थे जो बात-बात पर,
साहब ने उनका भी घर तोड़ दिया आम बात पर,
व्यापारीयों मानते थे मसीहा, मनाया जश्न था,
हैं दुकानों के गेट चुनवा रहे, है ये आम बात पर।

​रोजगार के वायदे पे हमने वोट दिया था,
आज छीन लिया वो, जो पहले से हाथ था,
मायने रखता है जनता का दुःख दर्द साहब को ?
रोते-बिलखतों को कब किसका साथ था???

​शिक्षकों पे थोप दी 'TET' की अनिवार्यता यहाँ,
नेताओं की डिग्री का पर मिलता कोई पता कहाँ?
अनपढ़ बनकर जो देश का मुकद्दर लिखते हैं,
वो गुरुओं से माँग रहे योग्यता का प्रमाण यहाँ!




कागजों पर आंकड़े चमका कर मुस्कुराते हैं,
महंगाई की मार से रसोई को रुलाते हैं,
जो टैक्स के बोझ तले घुट-घुट के जी रहा,
उस गरीब की थाली से निवाला भी उठाते हैं।

​सब बेच दिया कौड़ियों के दाम 'मित्रों' को,
धुंधला कर दिया देश के सुनहरे चित्रों को,
अग्निवीर बना कर युवाओं को चार साल का,
मजबूर कर दिया भटकने को वीर-चरित्रों को।

​सच्चाई पर पहरा है, और गोदी में अखबार है,
सवाल जो पूछे कोई, तो वो देशद्रोही गद्दार है,
जुमलों की चाशनी में जहर ऐसा घोला है,
अब तो विकास ही जनता पर सबसे बड़ा प्रहार है!

अनिल आर्य...

Thursday, 4 June 2026

पीला पंजा और हरा ज्ञान

'पीला पंजा' और 'हरा ज्ञान'

विश्व पर्यावरण दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! विशेष रूप से हमारे सेक्टर के उन जांबाज निवासियों को, जिन्होंने सरकारी कागजों की सूखी 'ग्रीन बेल्ट' को अपने खून-पसीने (और पानी के बिल) से सींचकर एक असल, जिंदा पार्क में तब्दील कर दिया था।

​लेकिन साहब, सरकार को 'हरा रंग' सिर्फ तभी पसंद आता है, जब वह रीलों (Reels) में दिखे या उनके विज्ञापनों में चमके। जमीन पर हरा रंग देखने की आदत तंत्र को नहीं है।

​'पीले पंजे' की अनोखी नीति
​जैसे ही सेक्टर वालों के घरों के सामने तितलियां मंडराने लगीं और हवा में थोड़ी ऑक्सीजन घुली, सरकार की सोई हुई आत्मा अचानक जाग गई। उसने अपनी सबसे प्रिय और 'सशक्त' प्रजाति को मैदान में उतारा—जेसीबी का पीला पंजा!

​नीति का नया गणित:

"पर्यावरण बचाने के लिए पहले पर्यावरण को उजाड़ना जरूरी है।" शायद सरकारी फाइलों में यही लिखा है।
​तर्क देखिए:
​जनता खुद पेड़ लगाए, तो वह 'अतिक्रमण' है।
​सरकार करोड़ों का बजट पास करके कागजी पौधे लगाए (जो अगली बारिश में बह जाएं या बिना पानी सूख जाए), तो वह 'पर्यावरण संरक्षण' है।

'पीला पंजा' और 'हरा ज्ञान'

​कागजों पर उग रही थी जो, वो हरियाली नहीं थी,
सेक्टर वालों की वो किस्मत, इतनी भी तो खाली नहीं थी।
सरकार ने तो छोड़ी थी बस, सूखी 'ग्रीन बेल्ट' यहां,
हमने खून पसीना देकर, एक सुंदर बाग उगाया वहां।

​तितलियां मंडराने ही लगी थीं, हवा भी कुछ सुधर रही थी,
कि अचानक तंत्र की आत्मा, कुंभकर्णी नींद से जग रही थी।
दौड़ा चला आया 'पीला पंजा', जैसे कोई जंग जीतनी हो,
उजाड़ दिया वो सुंदर पार्क, जैसे कोई पुरानी दुश्मनी हो।

​कैसी ये नीति है साहब, कैसा ये विधान है?
जनता लगाए तो अतिक्रमण, सरकार उजाड़े तो महान है!
​सुबह जिसने रौंदा था, पौधों को अपने भारी बूटों से,
दोपहर को वही साहब, ज्ञान बांट रहे थे यू-ट्यूबों से।

एसी कमरे में बैठकर, वो पर्यावरण का मंत्र पढ़ाते हैं,
"एक पेड़ मां के नाम लगाओ", का पावन संदेश सुनाते हैं।
​अरे! कितनी बेशर्म है ये सरकार, और कितना अद्भुत ये ज्ञान है,
एक हाथ में कुल्हाड़ी है, और दूसरे हाथ में संविधान है।

पेड़ तो हम फिर लगा लेंगे साहब, पर ये राज जरा खोल दो,
इस बुलडोज़र के 'बाप' से कैसे बचाएं, बस इतना हमको बोल दो!

अनिल आर्य...

Thursday, 21 May 2026

जनगणना एक अग्निपरीक्षा: "वेदरप्रूफ" शिक्षक

शिक्षकों को समर्पित :

तपती धरती, जलता अंबर, चारों ओर अंगारे हैं,
इस भीषण गर्मी में देखो, निकले भाग्य के मारे हैं।
गले में लटका पास प्रशासन का, हाथों में कुछ कागज हैं,
लू के थपेड़े सहता जाता, फिर भी कदम अग्रसर हैं।

​बिन छतरी के झुलस रही है, उसकी काया बेचारी,
बिन लाठी के गली-गली में, कुत्तों से आफत भारी।
एक हाथ में भारी बस्ता, दूजे हाथ से पसीना पोंछे,
ड्यूटी की मजबूरी ऐसी, जो सारे अरमान नोचे।

​खटखटाता रहा वो दरवाजा, कोई अंदर से बोला नहीं,
बंद किवाड़ों के पीछे से, किसी ने मुखड़ा खोला नहीं।
दूजे दर पर दस्तक दी तो, फटा अचानक कोई बम,
उबलता हुआ बाहर आया, जैसे खौलता हो तेल गरम।

​मुँह पर ही दरवाजा बंद हुआ, अपमान का घूँट पिया उसने,
इस जलते हुए जहान में, कैसा ये फर्ज जिया उसने।
सोच रहा वो घर पर मेरे बच्चे राह देखते होंगे मेरी,
जेठ की सारी छुट्टियां देखो, इस गिनती ने कैसे फेरी।

​जब थककर उसने कदम रोके, तो भीतर का शिक्षक जागा,
वो याद आया जो धूप-धूल से, कभी न पीछे भागा।
गर्मी तो सबके लिए यहाँ, हर कोई बिलख रहा रहकर अंदर,
पर शिक्षक तो 'वेदरप्रूफ' है, सह लेता है हर बवंडर!

​गर्मी से चक्कर सा आया, आँखों के आगे अंधकार सा छाया,
बैठा छज्जे के नीचे, थैले से गर्म पानी पिया, कुछ नहीं खाया।
बोला "दरवाजे बंद करो या दिल में गुस्सा पालो तुम,
मैं फिर भी तुमको गिनूँगा, चाहे जितना गुस्सा उठालो तुम!"

​"मैं राष्ट्र-निर्माता हूँ साहब, मौसम से हार नहीं मानूँगा,
तुम अंगारे बरसाओगे, मैं शांत भाव से गिन जाऊँगा।
मेरी छुट्टियों की राख से ही, कल नया सवेरा महकेगा,
मैं जलूँगा इस तपती धूप में, तब ही तो देश चहकेगा!"

​अनिल आर्य...

Wednesday, 6 May 2026

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना था,
जो आँखों में पलता रहा,
रात की चादर में चुपके से जलता रहा।
वो कहता, "चल, उड़ते हैं,
जहाँ डर की दीवारें नहीं।"

एक हकीकत थी,
जो सुबह दरवाज़े पर मिलती रही,
चाय के कप में, बस की भीड़ में, थकी हथेलियों में।
वो कहती, "रुक, पहले चलना सीख,
फिर उड़ान भरना।"

सपना पूछता है "क्यों नहीं?"
हकीकत पूछती है "कैसे?"
और मैं,
इन दो सवालों के बीच
रोज़ अपना जवाब गढ़ता हूँ।

एक दिन मैंने देखा,
सपना हकीकत का हाथ पकड़ रहा था।
न वो हवा में था, न वो ज़मीन पर,
दोनों साथ चल रहे थे।

तब समझा,
सपना बिना हकीकत के सिर्फ़ धुंध है,
हकीकत बिना सपने के सिर्फ़ बोझ है।
जब दोनों मिलते हैं,
तभी एक कहानी बनती है,
जिसे हम ज़िंदगी कहते हैं।

अनिल आर्य...

जेन जी

सुबह आँख खुलती नहीं, स्क्रीन जलती है।
अंगूठा पहले जागता है, आदमी बाद में।

देशभक्ति अब पंद्रह सेकंड की रील है,
ज्ञान व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में पैक है,
डॉक्टर गूगल है, वकील यूट्यूब कमेंट है,
और भगवान भी ट्रेंड करे तो ही भगवान है।

हम स्टोरी में पेड़ लगाते हैं,
AC सोलह पर चला कर पर्यावरण बचाते हैं,
दिल्ली की धुंध में मास्क ढूंढते हैं,
पर AQI से ज्यादा फॉलोअर्स गिनते हैं।

EMI पर फोन, EMI पर जूते,
EMI पर वो मुस्कान जो किस्तों में हँसती है।
बच्चा कोटा में है, बाप कोटा में नहीं,
पर दोनों एक ही रेस में थके हुए हैं।

मोहब्बत अब बायो में अपडेट होती है,
'इन अ रिलेशनशिप' से शुरू, 'मूव ऑन' रील पर खत्म।
डेट पर दो लोग, तीन फोन,
एक उसका, एक मेरा, एक फोटो खींचने वाला।
सुबह 'गुड मॉर्निंग जानू', रात 'तुम बदल गए हो',
वफा फुल चाहिए, पर ऑप्शन भी खुले रखने हैं,
ब्रेकअप अब दुख नहीं, कंटेंट है।

शादी अब फंक्शन नहीं, प्रोडक्शन है,
प्री-वेडिंग में प्यार, हल्दी में ड्रोन,
मेहमान कम, कैमरामैन ज्यादा,
और आशीर्वाद की जगह 'टैग कर देना भैया'।

माँ-बाप व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं,
बेटा इंस्टा का टॉपर है,
दोनों एक दूसरे को ज्ञान भेजते हैं,
दोनों ही ब्लू टिक के बाद भी अनरीड हैं।

ऑफिस में हम हसल करते हैं,
लिंक्डइन पर ग्रेटफुल लिखते हैं,
बॉस को स्टोरी से हाइड करते हैं,
और सैलरी को महीने के आखिर में ढूंढते हैं।

खबर अब खबर नहीं, सीरियल है,
एंकर चीखता है, हम चाय पीते हैं,
देश हर रात टीवी पर बचता है,
सुबह मेट्रो में फिर धक्के खाता है।

सच को फैक्ट-चेक चाहिए,
झूठ को बस अच्छा बैकग्राउंड म्यूजिक।
हर कोई आहत है, हर कोई आहत करता है,
हर कोई सलाह देता है, सुनता कोई नहीं।

ये है 2026 का आदमी,
जेब में दुनिया, हाथ में पावरबैंक,
दिल में सन्नाटा, और टाइमलाइन पर शोर,
खुद से अनफॉलो, दुनिया को फॉलो।

अनिल आर्य...

Monday, 27 April 2026

वर्षगाँठ

पच्चीस वर्षों का यह साथ,

केवल समय नहीं, एक साधना है।

दो अलग रास्तों का मिलकर

एक सुंदर मार्ग बन जाना है।


मामा, आपसे हमने सीखा,

कैसे धैर्य से जिम्मेदारी निभाई जाती है।

और मामी, आपकी मुस्कान ने बताया,

कैसे घर को खुशियों से महकाया जाता है।


कभी संघर्षों की धूप रही, तो कभी खुशियों की छाँव,

पर आप दोनों के कदम कभी डगमगाए नहीं।

एक-दूजे पर विश्वास की वह अटूट डोर ही थी,

जिसने परिवार के आँगन को बिखरने दिया नहीं।


आज इस खास पड़ाव पर,

हम बस इतना ही कहना चाहते हैं,

आप दोनों हमारा अभिमान हैं, हमारा संबल हैं,

इस घर की प्रतिष्ठा और संस्कारों का कलश हैं।


यह साथ चाँदनी की तरह शीतल बना रहे,

माथे का सिंदूर और चेहरे का तेज अमर रहे।

हमारी दुआओं में बस आपका ही नाम है,

आपकी जोड़ी को हमारा सादर प्रणाम है।


पच्चीस वर्ष का यह सफ़र, पावन हुआ अनुष्ठान है,

मामा-मामी का यह प्रेम , कुल का बढ़ाता मान है।

अक्षय रहे अनुराग यह, गंगा-सदृश निर्मल बहे,

सौभाग्य का यह सूर्य अब, नभ में निरंतर ही रहे।


​मामा बने संबल सदा, मामी बनीं रहें ममतामयी,

संसार की हर सुख-छटा, आँगन खड़ी हो नयी-नयी।

प्रतिष्ठा और विश्वास का, स्तंभ यह अविचल रहे,

सद्भाव और सत्कार की, सरिता सदा कल-कल बहे।


​अर्पण हमारा प्रेम है, चरणों में सादर वंदना,

हो पूर्ण जीवन की सभी, मन की मधुरतम कल्पना।

रजत प्रभा यह स्वर्ण बन, चहुँ ओर नित बिखरा करे,

ईश की करुणा-कृपा, इस युगल पर सदा बरसा करे।


​शादी की 25वीं वर्षगाँठ पर आप दोनों को अनंत शुभकामनाएँ, आपका पुत्र : अनिल आर्य...


Monday, 20 April 2026

भ्रातृ-वन्दन एवं भावपूर्ण विदाई

 भ्रातृ-वन्दन एवं भावपूर्ण विदाई

आदरणीय भ्राता वीरेंद्र आर्य जी,

​शब्द मौन हैं, हृदय भाव-विह्वल है और पलकें स्मृतियों के स्नेह से भीगी हुई हैं। आज आपकी इस गौरवशाली सेवानिवृत्ति के अवसर पर, मैं स्वयं को एक विचित्र द्वंद्व में पा रहा हूँ। एक ओर आपके यशस्वी कार्यकाल की पूर्णता का गर्व है, तो दूसरी ओर आपके सान्निध्य के उस अनमोल अध्याय के औपचारिक समापन की टीस।

​आदरणीय आर्यश्रेष्ठ,

​आपने राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों को केवल कक्षाओं में नहीं पढ़ाया, बल्कि अपने जीवन के व्यवहार में उतारकर दिखाया। आपकी अक्षुण्ण सत्यनिष्ठा और हिमोज्ज्वल श्वेत चरित्र मेरे लिए सदैव एक पवित्र प्रकाश-स्तंभ रहे हैं। "आर्य" नाम की जो गरिमा आपने अपने अनुपम परिश्रम से बढ़ाई है, वह हम सबके लिए कुल-गौरव है।

भीगी पलकों से कुछ शब्द:

विदाई की यह वेला है, पर स्नेह का बंधन अटूट है,

कर्तव्यों से निवृत्ति है, पर आत्मीयता की कहाँ छूट है?

राजनीति के हर शास्त्र को, आपने आचरण से संवारा है,

हे अग्रज! आपके व्यक्तित्व ने, हर हृदय को पुकारा है।


​संस्थान के गलियारों में आपकी उपस्थिति, वह अनुशासित मुस्कान और हर कार्य के प्रति आपकी वह अद्वितीय कर्मपरायणता... इन सबकी कमी को कोई भर नहीं पाएगा। आपने केवल सेवा नहीं की, आपने हम सबके भीतर 'श्रेष्ठता' के बीज बोए हैं।

मंगलकामना:

​मैं (अनिल आर्य) ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि निवृत्ति के पश्चात का यह नूतन सवेरा आपके जीवन में असीम शांति, उत्तम स्वास्थ्य और चिर-आनन्द लेकर आए। आप जहाँ रहें, अपनी ज्ञानमयी दीप्ति से हमें आलोकित करते रहें।

विदाई तो एक औपचारिकता है, आप तो सदैव मेरे हृदय के सिंहासन पर विराजमान रहेंगे।

अश्रुपूरित नेत्रों एवं सजल श्रद्धा के साथ,

आपका अनुज,

अनिल आर्य