Wednesday, 25 March 2026

रुद्रा: साहस, स्नेह और सत्य

रुद्रा नाम में अग्नि-सी ज्वाला,
मन में निर्मल गंगाजल धारा।
नन्हे कदमों में अद्भुत शक्ति,
हृदय में प्रेम भरा है सारा।

हँसी तुम्हारी जैसे प्रभात,
अंधियारा पल में हर लेती।
मासूम आँखों की गहराई,
हर थकान को दूर कर देती।

तुममें झलके वीरता की छाया,
भगवान शिव का अंश समाया।
कभी बनते हो तुम शीतल चंद्र,
कभी प्रलय-सा तेज दिखाया।

हर कदम पे हो विजय तुम्हारी,
हर सपना साकार बने।
जीवन-पथ पर बढ़ते जाओ,
हर दिन तुम्हारा उपहार बने।

माता-पिता का गौरव बनो,
कुल का उज्ज्वल मान बनो।
धरती पर तुम दीपक बनकर,
सबके जीवन की पहचान बनो।

जन्मदिवस की हार्दिक वंदना,
गूगा तुम यूँ ही खिलते रहो।
साहस, स्नेह और सत्य के संग,
हर पल आगे बढ़ते रहो।

अनिल आर्य...

Friday, 20 March 2026

नवचेतना का नवरात्र

नवचेतना का नवरात्र

नहीं आडंबर, नहीं बाह्य आकर्षण,
सत्याग्नि में हो आत्मावलोकन।
अंतर की मलिनता आज पिघले,
विचार सुधरें, संस्कार निकले।
आत्म-शुद्धि का यह पावन काल,
मन बने निर्मल, बुद्धि निष्कलुष विशाल।
व्रत न केवल उपवास का नाम,
इंद्रिय-निग्रह ही उसका प्राण।
ऋतु परिवर्तन का सूक्ष्म संकेत,
संयम से साधो तन-मन का क्षेत्र।
सात्त्विक आहार, प्रकृति का वरदान,
शरीर हो शुद्ध, जागे दिव्य ज्ञान।
माँ नहीं मूर्ति, न सीमित आकार,
वह चेतना-शक्ति, व्यापक विस्तार।
उसको जागृत करना ही साधन,
यही है सच्चा देवी-आराधन।
जब चित्त निर्मल, संकल्प प्रखर,
तभी उठता है जीवन उत्तम स्वर।
इच्छाओं पर संयम का अनुशासन,
संकल्प बनें फिर दृढ़ हो वाचन।
व्रत से उपजे धैर्य अपार,
अंतर में जगे सत्य का सार।
नवरात्रि का यह वैदिक संदेश,
स्वयं को जानो, यही उपदेश।
वेद-विहित जीवन, यज्ञमय विचार,
इसी में निहित है उत्कर्ष अपार।
जब अंतर में जागे दिव्य ज्योति-प्रकाश,
तभी सार्थक होता है नवरात्रि का उल्लास।

अनिल आर्य...

Wednesday, 18 March 2026

नवसंवत्सर

वसन्त आया,
जर्जर देह में
फिर जागा स्पन्दन।

सूनी डालों पर
फूटे अंकुर,
मौन धरा में
जागा जीवन।

यह तिथि नहीं,
समय का आवाहन है,
जागो!
भीतर सुप्त अग्नि को
फिर प्रज्वलित करो।

जब भगवान ब्रह्मा ने
प्रथम रश्मि से
रचा विस्तार,
तब से हर वर्ष
एक ही पुकार,
ह्रदय से नव हो जाओ!

नवरात्रि का व्रत,
अंतर में उतरता,
शक्ति बनता,
अहं को गलाता।

जग हँसता है
क्षणिक उन्माद में;
पर मनुष्य!
तू ठहर,
स्वयं के साध,
तम से बाहर आ।

नवसंवत्सर
दीप नहीं केवल,
अग्नि है,
जला दे जड़ता,
गढ़ दे चेतन।

त्याग कर क्लेश,
संशय, मोह,
उठ,
और चल
प्रकाश-पथ पर।

नव हो विचार,
नव हो व्यवहार,
नव हो संकल्प,
यही सच्चा उत्सव।

चल,
स्वयं से आगे,
स्वयं में उतर,
कर,
यहीं से नव आरम्भ।

तभी 
और केवल तभी 
हमारा नववर्ष
सजेगा,
जब अंतर का 
तम मिटेगा,
हर-उर प्रकाश जगेगा।

अनिल आर्य...

Sunday, 15 March 2026

घर की अदृश्य नींव...पिता

घर की अदृश्य नींव...पिता

घर की छत दिखती है,
दीवारें भी नज़र आती हैं,
खिड़कियों से आती धूप
आँगन को रोशन करती है।

पर एक चीज़ ऐसी भी होती है
जो दिखाई नहीं देती
पर उसी पर
पूरा घर टिका होता है।
वह है नींव।

पिता भी कुछ ऐसे ही होते हैं।
वे छत की तरह
आँचल फैलाकर नहीं ढकते,
न फूलों की तरह
खुशबू बनकर महकते हैं।

वे तो बस
नींव की तरह
चुपचाप नीचे खड़े रहते हैं।

उनकी हथेलियों की कठोरता में
दिन भर की धूप होती है,
और आँखों की थकान में
परिवार के सपनों की रखवाली।

उन्होंने कभी नहीं कहा
“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”
बस चुपचाप
अपनी इच्छाएँ मोड़ कर रख दीं।

जब तुम छोटे थे,
तो तुम्हें ऊँचा उठाने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा और झुकना सीख लिया।

जब तुम बड़े हुए,
तो तुम्हें आगे बढ़ते देखने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा पीछे रहना स्वीकार लिया।

तुम्हें शायद याद न हो,
पर कई रातें ऐसी थीं
जब घर सो चुका था
और पिता जाग रहे थे।

कभी हिसाब करते हुए,
कभी भविष्य सोचते हुए,
कभी बस
तुम्हारी चिंता करते हुए।

पिता का प्रेम
नदी की तरह शोर नहीं करता,
वह धरती की तरह
सब कुछ सहता है।

वह प्रेम
न माँगा जाता है,
न दिखाया जाता है,
बस निभाया जाता है।

और सच तो यह है,
जब तक पिता साथ होते हैं,
हम समझ ही नहीं पाते
कि हम कितने सुरक्षित हैं।

क्योंकि
जिस प्रेम ने हमें थाम रखा है
वह दिखता नहीं।

वह तो बस
घर की अदृश्य नींव की तरह
चुपचाप कहता है,
“तुम बस खड़े रहो ऊँचे होकर…
मैं नीचे से
तुम्हें गिरने नहीं दूँगा।”

अनिल आर्य...

बंद कमरा

बूढ़ा पिता और बंद कमरा

घर बड़ा था,
कमरे भी बहुत थे,
पर एक कमरा ऐसा था
जो हमेशा बंद रहता था।

उस कमरे में
एक बूढ़ा पिता रहते थे।
सुबह खिड़की से
थोड़ी धूप आती,
दीवारों पर चुपचाप
सरक जाती।

पिता उसी रोशनी में
पुरानी तस्वीरें देखते,
और कभी-कभी
धीरे से मुस्कुरा देते।

एक तस्वीर में
नन्हा सा बच्चा था
कंधों पर बैठा हुआ,
हँसता हुआ।

पिता उँगली फेरते हुए
कहते
“मेरा बेटा…”
फिर दरवाज़े की ओर देखते,
शायद कोई आएगा।

बाहर
घर में रौनक थी,
हँसी थी,
टीवी की आवाज़ थी,
मेहमानों की बातें थीं।
पर वह कमरा
अक्सर बंद ही रहता था।

कभी-कभी
बहू खाना रख जाती,
कहती—
“बाबूजी, खा लेना।”
पिता मुस्कुरा कर कहते
“हाँ बहू, रख दो।”

और फिर
थाली से ज़्यादा
दरवाज़े को देखते रहते।
एक दिन
उन्होंने धीरे से पूछा
“बहू, बेटा घर पर है क्या?”
बहू ने कहा
“हैं तो…
पर बहुत व्यस्त हैं।”

पिता ने सिर हिलाया,
जैसे जवाब पहले से जानते हों।
फिर खिड़की से बाहर देखते हुए बोले
“जब छोटा था ना…
तो मेरे कमरे से बाहर ही नहीं जाता था।
रात को भी
मेरी उँगली पकड़कर सोता था…”
बात यहीं रुक गई।

शाम ढली,
कमरे में अँधेरा उतर आया।
पिता ने
धीरे से दरवाज़े की ओर देखा
और फुसफुसाए
“कोई बात नहीं…
बच्चे बड़े हो जाते हैं।”

कुछ दिनों बाद
वह कमरा खुला।
लोग अंदर आए,
चादरें बदलीं,
सामान हटाया।
चारपाई खाली थी।

दीवार पर
वही पुरानी तस्वीर टंगी थी
जिसमें एक छोटा बच्चा
पिता के कंधों पर हँस रहा था।
और तस्वीर के नीचे
टेबल पर एक कागज़ रखा था।

उस पर बस इतना लिखा था
“कमरा बंद नहीं था बेटा…
बस दरवाज़ा
तुमने कभी खोला नहीं।”

अनिल आर्य...

Tuesday, 10 March 2026

पावनी — जीने की नया फलसफ़ा

पावनी — जीने की नया फलसफ़ा 

नन्ही-सी पावनी, पर मन का आकाश अपार,
हँसी में उसकी झिलमिल करता जीवन का सार।
स्वभाव में ऐसी कोमल स्नेहिल मधुरता बसी,
जिससे मिलते ही हर दुःख स्वतः बन जाए खुशी।

दिल से दिल जोड़ लेना उसकी सहज प्रवृत्ति है,
मिलनसार मुस्कान ही उसकी मधुर सम्पत्ति है।
जहाँ खड़ी हो, वहाँ प्रसन्नता का बसंत उतर आए,
जैसे सूने आँगन में चुपके से कुसुम खिल जाएँ।

मन की धुन पर चलना उसकी सुमधुर नीति है,
बंधन से परे अपनी लय में जीना उसकी प्रीति है।
जो रुचिकर लगे उसे साहस से वह अपनाती है,
छोटी-सी आयु में भी जीवन-पथ समझाती है।

अपनी शर्तों पर जीना कोई इससे सीखे,
निर्मल मन में जैसे स्वच्छ गगन ही दीखे।
सच में पावन जीवन का पावन रस्ता बतलाती है,
जीवन की मधुरतम रीति सरलता से सिखालाती है।

हँसो खुलकर, दिल से जुड़ो, मन की सुनो सदा,
अगर खुलकर जीना जो चाहो बांधो ये फलसफ़ा।
करो वही जो सहज बुद्धि कहती है, कोई हो फिर ख़फ़ा,
जियो ऐसे जैसे पावनी जीती है हर जगह हर दफा।

जन्मदिन पर आशीर्वचन
पावनी, तुम्हारी हँसी सदा मधुमय गान बने,
तुम्हारा चंचल मन सबके लिए वरदान बने।
जहाँ तुम्हारे चरण पड़ें, वहाँ भी स्नेह के सुमन खिलें,
और जो जीवन तुम्हारे संग रहें उन्हें भी सदा मुस्कान मिलें।

अनिल आर्य...

बंधन

बंधन का उलटा अर्थ

पुरुष बड़ा स्वतंत्र कहा जाता है
बस इतना कि नौकरी छोड़ने का विचार भी
रोटी से अनुमति लेकर ही आता है।
दिन भर दुनिया की धूप में झुलसकर
जब वह घर की ओर लौटता है,
मन बस यही चाहता है
थोड़ी छाँव, दो घड़ी शांति।
उसे लगता है
घर ही उसका विश्राम है,
और बाहर की दुनिया
एक लंबा अनिवार्य बंधन।
पर उधर
वही घर किसी और के लिए
दीवारों का घेरा है।
औरत बरसों से
उसी चौखट के भीतर
दिनों को सिलती रहती है,
और सोचती है
कभी तो बाहर का आकाश देखूँ।
जब नौकरी का दरवाज़ा खुलता है,
उसे लगता है
मानो स्वतंत्रता की हवा मिल गई।
पर अनजाने ही
वह एक नया बंधन
मुस्कुराकर अपना लेती है,
जिसे वह
खुशी से आज़ादी का नाम दे देती है।
जिस रास्ते को पुरुष
अपनी मजबूरी मानता है,
उसी को स्त्री
स्वतंत्रता का द्वार समझती है।
और जिस घर में
पुरुष शरण ढूँढता है,
उसी घर को स्त्री
कभी-कभी बंधन मान बैठती है।
विडम्बना देखिए
दरवाज़ा एक ही है,
बस दिशाएँ बदल जाती हैं।
एक थककर भीतर आना चाहता है,
दूसरी उम्मीद लेकर बाहर जाना चाहती है।
शायद जीवन का सबसे गहरा व्यंग्य यही है
मनुष्य अक्सर
दूसरे के बंधन को ही
अपनी स्वतंत्रता समझ बैठता है।
और सच तो यह है
स्वतंत्र कोई नहीं,
बस हर किसी की जंजीर का
नाम अलग-अलग है।

अनिल आर्य...

Sunday, 8 March 2026

महाशक्ति वंदना

आर्यव्रत की नारी — महाशक्ति वंदना (नारी दिवस)

ऋतम्भरा निमित्त चेतना से निर्मिता,
अंतरिक्ष-रज कण-कण संचित-संहिता।
प्रकृति-प्राण की दिव्य अभिव्यक्ति-अभिव्यक्ता,
सृष्टि-सार की मूर्त परिणति- परिणीता।

ललाट-दीप्ति ज्यों उषा-प्राची,
वाणी सरस्वती-सी सव्या साची।
मृदुल-मेखला मर्यादा-आवृत
सौम्य-सुषमा शील-सुसज्जित।

नयनों में नव-नीलाकाश
हृदय-दीप में वेद-विलास।
स्नेह-सिक्त संवेदना धारा
जीवन-वन की हरित क्यारा।

विश्वसनीयता ज्वलंत ज्वाला
धैर्य-धरा की दृढ़ रखवाला।
सह-अस्तित्व का सत्य संवेग
शांत-ज्वार, दमित उद्वेग।

यज्ञाग्नि-सा तप का विस्तार
ममता-सिन्धु अपरम्पार।
संघर्षों में वज्र-प्रहार
सौम्यता में चन्द्र-प्रसार।

प्रजनन-पोषण सृष्टि-विधान
जीवन-बीज का प्रथम विधान।
पाषाण-खण्ड सम अचल आधार
युग-निर्माण का मौन विस्तार।

अन्तर्मन आलोकित ज्वाला
तम-रजनी को करती काला।
दुर्गा-शक्ति, करुणा-धारा
जग-वंदिता मातृ-उजियारा।

मृत्यु-द्वार से करती पार
नव-जीवन का देती उपहार।
पतिव्रता-तप तेज अपार
धारण करती जग-आधार।

उज्ज्वल, प्रदीप्त, दिव्य विहारी
श्रद्धा-वेद की ज्योति पुजारी।
आर्य-संस्कृति की आधार-धारी
यही तो है आर्यव्रत की नारी।

मातृशक्ति को सप्रेम समर्पित,
अनिल आर्य...

Friday, 6 March 2026

वरदान

मन चाहे नभ के तारे,
दूर क्षितिज का मान;
चाहत अपनी राह बनाती,
रचती नित अभियान।

पर जीवन की रीति निराली,
सब कुछ कहाँ सुहाता;
जो माँगा वह दूर खड़ा,
कुछ और हाथ आ जाता।

क्षण भर मन खिन्न भी होता,
स्वप्नों का टूटे गान;
फिर अंतर से स्वर उठता
यह भी होगा कल्याण।

जो नहीं मिला वह इच्छा थी,
जो मिला वही प्रभु-दान;
प्रभु की गूढ़ व्यवस्था में
छिपा हुआ हित-ज्ञान।

संतोष जहाँ दीपक बनता,
मन पाता विश्राम;
हर प्राप्ति तब लगती जैसे
ईश्वर का शुभ नाम।

धीरे-धीरे ज्ञात यही
जीवन का पावन मान:
जो चाहा वह आवश्यक नहीं,
जो मिला वही कल्याण।

और यही सरल स्वीकार
देता गहन निदान
प्रभु जो देता प्रेम से,
वही होता है वरदान। 

वरदान क्या वह जो मन को भाए,
या जो हित में सिद्ध हो जाए?
क्षण का सुख अक्सर छल करता,
दूर का कल्याण ही सच बतलाए।

इसलिए जो प्रभु दे निस्संग भाव से,
उसे ही मानो सच्चा दान,
अच्छा लगे हितकर भी होगा?
जो हमें श्रेष्ठ हो - दो प्रभु वही वरदान।

अनिल आर्य...

वरदान

मन चाहे नभ के तारे,
दूर क्षितिज का मान;
चाहत अपनी राह बनाती,
रचती नित अभियान।

पर जीवन की रीति निराली,
सब कुछ कहाँ सुहाता;
जो माँगा वह दूर खड़ा,
कुछ और हाथ आ जाता।

क्षण भर मन खिन्न भी होता,
स्वप्नों का टूटे गान;
फिर अंतर से स्वर उठता
यह भी होगा कल्याण।

जो नहीं मिला वह इच्छा थी,
जो मिला वही प्रभु-दान;
प्रभु की गूढ़ व्यवस्था में
छिपा हुआ हित-ज्ञान।

संतोष जहाँ दीपक बनता,
मन पाता विश्राम;
हर प्राप्ति तब लगती जैसे
ईश्वर का शुभ नाम।

धीरे-धीरे ज्ञात यही
जीवन का पावन मान:
जो चाहा वह आवश्यक नहीं,
जो मिला वही कल्याण।

और यही सरल स्वीकार
देता गहन निदान
प्रभु जो देता प्रेम से,
वही होता है वरदान। 

प्रेम

प्रेम

प्रेम न केवल कोमल पंखुड़ी,
न क्षणिक संदेशों की भाषा;
यह जीवन की गहरी सरगम,
आत्माओं की मौन अभिलाषा।

दिन की चंचल भाग-दौड़ में भी
जब स्मृति सहसा मुस्काए,
मन के अंतरतम आँगन में
एक शीतल दीप जल जाए।

पिता का दृढ़, अडिग विश्वास
पथ को साहस से भर देता,
माता की ममता का आँचल
हर संताप हर लेता।

बहन की हँसी की उजली रेखा
आँगन में मधुमास घोल दे,
भाई का स्नेहिल संबल
जीवन को दृढ़ आधार दे।

और जब संध्या धीरे उतरे,
दिन की थकन नयनों में आए,
प्रिय की एक मृदुल दृष्टि
जीवन को फिर गीत बनाए।

बच्चों की किलकारी में
भविष्य का स्वर्णिम आकाश,
तब मन जान सके सहसा
प्रेम स्वयं एक मधुर निवास।

जहाँ संबंधों की वीणा पर
स्नेह के सुर झंकृत होते,
साधारण दिन उत्सव बनते,
और लय कभी न ख़ोते।

अनिल आर्य...

प्रेम : एक अनुभूति

प्रेम : एक अनुभूति

प्रेम न उच्चरित शब्द है,
न ही चंचल आकर्षण;
यह तो निःशब्द उपासना है,
हृदय से रूह तक का स्पंदन।

नयनों से इसका उद्गम नहीं,
न अधरों पर इसका निवास;
यह तो अंतःकरण की सुगंध है,
जो बन जाती है मधुर अनुभास।

कभी स्मृतियों की स्निग्ध छाया बन
मन-आँगन में उतर आता है,
कभी मृदुल हास की किरण बन
अंतरतम को आलोकित कर जाता है।

जहाँ वाणी मौन हो जाए
और मौन ही संवाद बने,
जहाँ वेदना भी मधुर लगे
वही प्रेम का परम प्रमाण बने।

जिसे एक बार रूह स्पर्श कर ले
वह बंधन कभी क्षीण नहीं होता,
प्रेम जहाँ हृदय में प्रतिष्ठित हो
वहाँ जीवन कभी शून्य नहीं होता।

अनिल आर्य...

Tuesday, 3 March 2026

फाग

फाग — रिश्तों की मिठास

फागुन जब देहरी पर आता है,
सिर्फ़ रंग से ही नहीं,
वो रिश्तों की सूखी डोर को 
पानी के प्रेम से तर कर जाता है।

हल्की सी गुलाल की छुअन,
बरसों की दूरी पिघला देती है,
एक मुस्कान और अनकही बातें,
मन की गाँठ सुलझा देती है।

जो मन में रूठा बैठा था,
रंग उसे बना दें रंगीला,
सूनी पड़ी जिंदगानी,
फाग बना देती सजीला।

न कोई ऊँच-नीच का पर्दा,
न अहंकार की दीवार रहे,
बस अपनापन ऐसे घुले
पिचकारी से प्यार बहे ।

भाई की हँसी में स्नेह घुले,
बहन के गालों पर सजे गुलाल,
शिवा सादगी में हल्दी से सजे,
भाभी -देवर दोनों हों लाल।

बड़ों के चरणों में आदर ग़ुलाल,
छोटों के संग खिलखिलाहट की बात,
रिश्तों की थाली में आज
प्रेम ही सबसे बड़ी सौगात।

फाग यही तो कहता है,
मन की उदासी को तोड़ो,
थोड़ा सा रंग लगाओ
और थोड़ा सा मन को भी जोड़ो।

ऐसा फाग रचे इस बार,
हर घर मधुमय हो जाए,
रंग उतर जाएँ चेहरे से,
पर मिठास सदा के लिए रह जाए। 

अनिल आर्य...

Sunday, 1 March 2026

होली

होली

फाल्गुन की पूर्णिमा जब
चन्द्र श्वेत शंख-सा नभ में बजता है,
तब आर्यभूमि की वाणी
फिर एक पुरातन गाथा कहती है।

जब अधर्म के मद में चूर
हिरण्यकश्यप ने सत्य को ललकारा था,
तब बाल-हृदय में दीप बनकर
प्रह्लाद अडिग खड़ा था।

वरदानों के आवरण में लिपटी
होलिका
जब अग्नि में प्रविष्ट हुई,
तो ज्वालाओं ने भी पहचान लिया
आर्य का सत्य न जलता है,
आर्य की श्रद्धा न झुकती है।

होलिका-दहन केवल लकड़ियों का दाह नहीं,
यह अनार्य वृत्तियों का परित्याग है;
यह भीतर के तम पर
धर्माग्नि का प्रज्वलित राग है।

और जब अग्नि की राख पर
नई प्रभा का स्पर्श उतरता है,
तब ब्रज में स्मृत होती है वह मधुर लीला
जहाँ कृष्ण की वंशी
फाग का वेद गाती थी,
और राधा की मुस्कान
अबीर-सी नभ में छा जाती थी।

वहाँ रंग उच्छृंखल नहीं थे,
वे संस्कारों के सुमन थे;
वहाँ हास्य उद्दंड नहीं था,
वह स्नेह की मर्यादा में बँधा स्पंदन था।

आर्यत्व का अर्थ है 
सत्य पर अडिग रहना,
बल में विनय रखना,
उत्सव में संयम रखना,
और भिन्नता में भी आत्मीयता देखना।

होली हमें यही स्मरण कराती है 
धर्म केवल ग्रंथों में नहीं,
वह आचरण में दीप्त होता है;
रंग केवल देह पर नहीं,
वे चरित्र पर भी चढ़ते हैं।

आओ, इस पावन अवसर पर
अधर्म, द्वेष और अहंकार को अग्नि में समर्पित करें,
और प्रेम, साहस, करुणा व शुचिता के रंगों से
अपने जीवन को आर्यमय करें।

आपका प्रत्येक विचार पावन हो,
प्रत्येक कर्म मर्यादित हो,
और प्रत्येक संबंध स्नेह से सिंचित हो।

आपको एवं आपके परिवार को आर्यत्व से आलोकित, मर्यादित और मंगलमयी होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। 
अनिल आर्य...