किसी और के कंधे " गन " रखकर
हम कभी नहीँ करते " वार",
खुल्लम - खुल्ला करते हैं हम
हो दुश्मनी या प्यार,
तिनका लेकर कर पाया क्या
भवसागर कोई पार ?
नहीँ चाहिए उधार की ताक़त
मुनासिब समझूं हार...
किसी और के बूते मैं जंग जीतूं
होगी मुझ पर धिक्कार...
अनिल आर्य...
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