Monday, 17 June 2013

Fitrat

आदत न बदली तेरी भी 
फितरत न बदली तेरी क्यूँ ?
पहले दिल जलाया करती थी
अब दिया जलती है मेरी कब्र पर… 
पहले माथे पे शिकन चढ़ाती थी 
अब चादर चढ़ाती है मेरी कब्र पर…. 
पहले जीते जी मुझको मार दिया 
अब मुर्दे को मारे क्यूँ रोज - रोज ?
आदत न बदली तेरी भी 
फितरत न बदली तेरी क्यूँ ?
क्यूँ परेशाँ तू  मेरी राह तके 
क्यूँ परेशाँ  तू मुझको खोज-खोज....
जो बीत चुका 
वो बीत गया 
वापस न फिर आ पायेगा 
ये इतिहास मुड़-मुड़ कर
अपने को फिर दोहरायेगा ... 

अनिल आर्य 

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