अब लम्हों की सिफारिश न कर
तू मुझ से गुजारिश न कर
मैं कलंदर एक दरगाह का
मुझ से तू इबादत न कर
जो बीता भूल जा
अब उसकी शिकायत न कर
अ दिल कुछ भी कर
चंद रोज का मेहमान अनिल
अँधेरे में चरागां से नफ़रत न कर
शान से जी हकीकत में
हकीकत से तिजारत न कर
सपनों से मोहब्बत न कर
जद्दोजहद के जीवन मैं
इतनी हिमाकत न कर


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