Friday, 18 July 2014

मानवता

मानव बनकर,
मानवता की
अमानवीय क़ीमत
चुका रहा हूँ मैं...
सच कहता हूँ
मानव बनकर
पछता रहा हूँ मैं...
जो - जो पाया
सो - सो खोया,
कम हँसा
और ज़्यादा रोया...
अपने नाज़ुक से
हृदय पर
आघात लगा कर ;
जख्मों में
नासूर पिरोया...
दुखों की
पतवार बनाकर
अश्रु - सरिता में ;
बहता जा रहा हूँ मैं,
सच कहता हूँ
मानव बनकर
पछता रहा हूँ मैं...

अनिल आर्य...

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