रोज जीने की नई नई
वज़ह देता हूँ
मैं खुद को ऐसे
सजा देता हूँ …
मकसद नहीं कोई
बस रोतों को
हँसा देता हूँ
तो खुद के ग़म
भुला देता हूँ …
हर-पल हर-सू
मौत को दगा देता हूँ
जिंदगी को जीता देता हूँ
यूँ खुद को मैं
सजा हूँ
खुद को जीने की
नयी नयी वजह देता हूँ
अनिल आर्य …
वज़ह देता हूँ
मैं खुद को ऐसे
सजा देता हूँ …
मकसद नहीं कोई
बस रोतों को
हँसा देता हूँ
तो खुद के ग़म
भुला देता हूँ …
हर-पल हर-सू
मौत को दगा देता हूँ
जिंदगी को जीता देता हूँ
यूँ खुद को मैं
सजा हूँ
खुद को जीने की
नयी नयी वजह देता हूँ
अनिल आर्य …
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