ये तो भेद खोलता है कि कैसे हैं बाबू -शौना???
जिसका हाथ थामा था जीवन भर के लिए,
ज़रूरत में हाथ थामने के लिए वो हाथ हो ना,
जिसके साथ खेले हर खेल बचपन के,
वो बहन -भाई जब पास हों ना,
जो दोस्त कमाए जीवन भर,
नहीं चाहते वो कमाई खोना,
जो रिश्तेदार मुफ्त में बांटते फिरते थे सलाहें,
सलाह देने को वो भी पास हों ना,
तेरा भी क्या रोना कोरोना???
ऐसे चाहने वाले किसी के भी हों ना...
भगवान मेरे जैसे रिश्ते दे सभी को,
जो जान झोंक दे जरा सी आहट पे,
चाहे आए कोरोना,
दूर कभी हों ना.
यही है असली इम्युनिटी,
यही इलाजे कोरोना...
अनिल आर्य...
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