Wednesday, 6 May 2026

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना, एक हकीकत

एक सपना था,
जो आँखों में पलता रहा,
रात की चादर में चुपके से जलता रहा।
वो कहता, "चल, उड़ते हैं,
जहाँ डर की दीवारें नहीं।"

एक हकीकत थी,
जो सुबह दरवाज़े पर मिलती रही,
चाय के कप में, बस की भीड़ में, थकी हथेलियों में।
वो कहती, "रुक, पहले चलना सीख,
फिर उड़ान भरना।"

सपना पूछता है "क्यों नहीं?"
हकीकत पूछती है "कैसे?"
और मैं,
इन दो सवालों के बीच
रोज़ अपना जवाब गढ़ता हूँ।

एक दिन मैंने देखा,
सपना हकीकत का हाथ पकड़ रहा था।
न वो हवा में था, न वो ज़मीन पर,
दोनों साथ चल रहे थे।

तब समझा,
सपना बिना हकीकत के सिर्फ़ धुंध है,
हकीकत बिना सपने के सिर्फ़ बोझ है।
जब दोनों मिलते हैं,
तभी एक कहानी बनती है,
जिसे हम ज़िंदगी कहते हैं।

अनिल आर्य...

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