Thursday, 21 May 2026

जनगणना एक अग्निपरीक्षा: "वेदरप्रूफ" शिक्षक

शिक्षकों को समर्पित :

तपती धरती, जलता अंबर, चारों ओर अंगारे हैं,
इस भीषण गर्मी में देखो, निकले भाग्य के मारे हैं।
गले में लटका पास प्रशासन का, हाथों में कुछ कागज हैं,
लू के थपेड़े सहता जाता, फिर भी कदम अग्रसर हैं।

​बिन छतरी के झुलस रही है, उसकी काया बेचारी,
बिन लाठी के गली-गली में, कुत्तों से आफत भारी।
एक हाथ में भारी बस्ता, दूजे हाथ से पसीना पोंछे,
ड्यूटी की मजबूरी ऐसी, जो सारे अरमान नोचे।

​खटखटाता रहा वो दरवाजा, कोई अंदर से बोला नहीं,
बंद किवाड़ों के पीछे से, किसी ने मुखड़ा खोला नहीं।
दूजे दर पर दस्तक दी तो, फटा अचानक कोई बम,
उबलता हुआ बाहर आया, जैसे खौलता हो तेल गरम।

​मुँह पर ही दरवाजा बंद हुआ, अपमान का घूँट पिया उसने,
इस जलते हुए जहान में, कैसा ये फर्ज जिया उसने।
सोच रहा वो घर पर मेरे बच्चे राह देखते होंगे मेरी,
जेठ की सारी छुट्टियां देखो, इस गिनती ने कैसे फेरी।

​जब थककर उसने कदम रोके, तो भीतर का शिक्षक जागा,
वो याद आया जो धूप-धूल से, कभी न पीछे भागा।
गर्मी तो सबके लिए यहाँ, हर कोई बिलख रहा रहकर अंदर,
पर शिक्षक तो 'वेदरप्रूफ' है, सह लेता है हर बवंडर!

​गर्मी से चक्कर सा आया, आँखों के आगे अंधकार सा छाया,
बैठा छज्जे के नीचे, थैले से गर्म पानी पिया, कुछ नहीं खाया।
बोला "दरवाजे बंद करो या दिल में गुस्सा पालो तुम,
मैं फिर भी तुमको गिनूँगा, चाहे जितना गुस्सा उठालो तुम!"

​"मैं राष्ट्र-निर्माता हूँ साहब, मौसम से हार नहीं मानूँगा,
तुम अंगारे बरसाओगे, मैं शांत भाव से गिन जाऊँगा।
मेरी छुट्टियों की राख से ही, कल नया सवेरा महकेगा,
मैं जलूँगा इस तपती धूप में, तब ही तो देश चहकेगा!"

​अनिल आर्य...

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