देखे थे जो सपने
रात को,
सुबह को उठकर
तोड़ दिए,
मैं दिये जलाता था
हर रस्ते,
अपने आँगन अँधियारे
छोड़ दिए...
जिस जिसको दिखाया
रस्ता मैंने,
नेकी की जगह
बदी मिली,
जिस जिसको समेटा
बिखरने से,
सबकी बद्दुआएँ
सधी मिली...
रात रात भर
जगे थे,
जिन्हें हम
सुलाने को,
पूरी ताक़त
लगा दिए वो,
मेरी नींद
उड़ाने को...
एक यही सौभाग्य
हासिल हमको,
की जीवन मेँ
दुर्भाग्य मिला,
जिस जिस रस्ते
था मैं दौड़ा,
वो हरदम मंजिल से
दूर खुला...
इस तरह
बाल सफेद किए,
जो भटके रस्ते
तो सैर किए,
जानी जन जन
की सच्चाई,
आये रस्ते बिन
देर किए...
जो पहुँच जाता मंजिल
सीधे सीधे,
तो मज़ा क्या होता
जीने मेँ,
आख़िर इन्सा वो
क्या इन्सा,
जो दर्द न पाले
सीने मेँ...
अनिल आर्य...
No comments:
Post a Comment