शब्दों के जादूगर, अनुशासन की पहचान, धनखड़ जी, आप हैं इस उपवन की शान। अंग्रेजी की बारीकियों को आपने सहज बनाया,
साहित्य के सागर को हर दिल में है बसाया।
किताबों के पन्नों से निकलकर, जीवन जीना सिखाया, कठिन रास्तों पर भी चलना, हमें आपने बताया। एक कुशल प्रशासक और एक कोमल मन के स्वामी,
आपके नेतृत्व में मिली, इस संस्थान को नई सलामी।
वो शेक्सपियर की पंक्तियाँ और वो ग्रामर का सार, आपकी क्लास में दिखता था, ज्ञान का अपरंपार भंडार। कभी डांटा पिता की तरह, कभी दोस्त बन हाथ बढ़ाया,
हर छात्र ने आपमें, एक सच्चा मार्गदर्शक पाया।
आज विदाई की इस बेला में, आँखें थोड़ी नम हैं, पर आपकी दी हुई सीख, खुशियों का मरहम है। सूरज कभी ढलता नहीं, बस नई सुबह लाता है,
आपका ये नया सफर, सुख-समृद्धि की गाथा सुनाता है।
स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, यही हमारी दुआ है, आपकी मेहनत से ही, ये गुलशन आज खिला है। सुरेंद्र धनखड़ जी, आपका नाम गर्व से लिया जाएगा,
ये स्कूल, ये गलियारे, इनकी महक और आपकी मेहनत से, हर छात्र अपनी समृति में आपको पाएगा।
अनिल आर्य...
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