एक इंसान का अकेलापन
सब हैं,
भीड़ है,
आदमी दर आदमी खफा बैठा है,
लेकिन,
मेरा अकेलापन भी है,
वो कुछ जुदा बैठा है,
मैं डरता हूँ,
इसलिए नहीं की मैं अकेला हूँ,
पर इसलिए की न खो जाऊं इस भीड़ मैं,
यहाँ आदमी बहुत हैं,
पर इंसान नहीं मिलता ,
महफ़िल मिल जाती है,
पर जो है महादेव का घर,
वो श्मशान नहीं मिलता,
सुना है,
की आदमी आजकल मरता नहीं है,
पर पता है,
की,
इन्सान
गैरत से भी मर जाता है,
और
बेगैरत जिन्दगी जीने से भी
उसका मन भर जाता है,
उसका जीना
नामुमकिन सा लगता है,
हर पल उसके अन्दर कुछ मरता है,
और मैं ,
अकेला
और मेरा अकेलापन
कौन हैं हम
सोचता हूँ अक्सर मैं,
नहीं पाता हर किसी अपने मैं अपनापन
और
यहाँ तक की इंसान मैं इंसानियत
तो
अपने बाल नौचता हूँ अक्सर मैं,
बैठ जाता हूँ ख़ाक पर,
अपनी औकात अच्छी लगती है,
सोचता हूँ अपनी हर बात अच्छी लगती है,
कोई मिलता नहीं इन्सान
हमें मगर
यहाँ हर सख्श को इंसानियत की बात अच्छी लगती है,
बातें तो सब कर लेते हैं
मगर
हमें बातों मैं वो बात अच्छी लगती है,
जो कह सके शान से और जो कर सके ईमान से
उसकी औकात अच्छी लगती है,
हम दुखी तो बहुत हैं,
पर खुश है कोई
ये हालात अच्छी लगती है,
वो दुनिया है ये की जहाँ,
हर तहजीब और हर फरमान बिकता है,
डरता बहुत हूँ की कहीं वो दिन न आ जाये
की कोई कहे तू कीमत लगा
इस बाजार मैं इंसान बिकता है
कोशिश करके तुम देख लो ज़रा
हमें तो पता है आजकल
थोड़े ऊँचे दामों पर ही सही पर आदमी का ईमान बिकता है,
कामयाबी का मोल यहाँ
हर ईक नाप-तौल यहाँ
ग़र हैसियत कम हो तो आदमी अकेला
नहीं तो संग खानदान बिकता है,
'अनिल' तो नैमत है खुदा कि
बहता है अपनी मस्ती मैं
पर पंखा हर एक दूकान बिकता है,
उस सख्श को हंसी तो आती होगी कभी कभी
अपने ऊपर देखता होगा जब वो अपने ईमान को,
हँसता होगा यकीन भी खुद पर कभी कभी
जब कोई मुसलमां ठुकरा देता है जन्नत के पैगाम को
की नैमत खुदा की जुदा होती है अक्सर
जो छूट गया कहीं पीछे बहुत
काश !
पहचान पाता वो उस मकान को,
समय बीत जाता है अक्सर
मुअज्जिन चिल्लाता रह जाता है अजान को,
कोई मुर्शिद तुम्हे कहे कुछ तो मान लो
और भूल जा तू खुद के ज्ञान को,
कोई जला जायेगा अपनी रौशनी देकर तेरे बुझे दीपक को
पहचान तू उस बुझती लो वाले उस इंसान को,
मंदिर गया
खुदा न था
पर पत्थर की मूरतें बहुत थी
वही हाल तो यहाँ जग मैं
कम्युनिटी हाल मैं
आदमी बहुत
पर इंसान नहीं मिलते ,
नाराज होते हैं
वो
अपनी कमजोरियां सुनकर
की किसी किसी को तो बताने वाले नहीं मिलते
तू तो शुक्रिया अदा कर खुदा का
की तेरी इतनी परवाह करता है कोई ,
और खुद छोड़ दी हमने जहाँ की दौलत
ठुकरा दी ज़न्नत की हकीकत
अब बुलाये खुदा तो न जाऊंगा
की
मैं इंसान ही तो हूँ
बहक जाने की आदत है मेरी ,
बहुत समझाता हूँ अपने अकेलेपन को,
पर ये अन्दर का कोई मेरे बाहर नहीं आता
ये खुश भी नहीं है
पर खुश बहुत है
की कोई तो खुश है
इसे दुखी देखकर ,
और
उसी ने ही बताया मुझे
की मैं कौन हूँ
की मैं क्या हूँ
जिस को मैं जानता न था
आज से पहले ,
करता हूँ जो हद करता हूँ
की काम मैं अजब करता हूँ
मुहब्बत मैं जान देना
और दोस्ती पर
मोहब्बत को कर कुर्बान देना
मुझे तो यही बस आता है
हद मैं रह कर काम करना मुझे कब आता है
'अनिल' की हद होती कहाँ है,
कोई भी काम कम करना हमें हरगिज नहीं आता
जो पिछली पे वापस जाऊं तो मेरी गरिमा मिट जाये
बीती बातों पे गम करना हमें हरगिज नहीं आता,
आता है टूट के हमें बिखर जाना
तेरे बिन भी आता है हमें जीना जानां
तेरे संग भी जीना हमने जाना
जो दीखता है वो देखा सबने
जो न दीखता हो उसकी किसको खबर जानां
पल मुश्किल हमने जाना
43 साल जीना ये भी जाना
हर पल जीना ये भी माना
जीना मुश्किल ये भी जाना जानां
हर दर्द का हमने असर जाना
चाहा की तू न जाने जानां
अनिल के प्रवाह को जाना,
गरिमा के एहसास को जाना,
हर इक चीज ख़ास को जाना जानां
टूटी आस को जाना जानां
आता है टूट के हमें बिखर जाना
ये हमने जाना मेरी जानां ...
अभी हल्की -हल्की बारीश भी है
हवा थोड़ी सर्द भी है
दिल मैं बहुत दर्द भी है
आस - पास कोई शख्स भी है
फूल भी फूल भी धुले-धुले से हैं
उन पर किसी का अक्ष भी हैं
कभी तुम शौख
कभी गुम मिलते हो
हम से आजकल तुम कम मिलते हो
ये बारीशें भी तो तुम सी ही हैं
कम ही आती हैं
और जब भी आती हैं थोड़ी ख़ुशी
बहुत गम लाती हैं
बादल आता है
हमें बहका जाता है
दिल के सोए सब जज्बात जगा जाता है
फिर वो बिजली
जो चमकती बहुत है और बुलाती है मुझे
मैं निकल जाता हूँ बाहर
पर कभी गिरती नहीं मुझ पर ...
जलता हुआ दिल कभी नहीं बुझाती
हर बूँद कुछ सुलगा जाती है
और फिर जलता नहीं मैं एकदम से
बस धुँआ -धुँआ हो जाता हूँ ...
आखिर कौन दुश्मनी निभाती है ये
क्यूँ देर से आती है ये ???
इसका आना अच्छा लगे
आकर मुझे जलाती है ये
तभी तो ये तुम सी लगती है
कितनी अच्छी है ये
पर आती बहुत कम है
जाती हरदम है ...
इसका जाना कब भाता है जानां
काश !
ये हरदम के लिए रूक जाए
प्रलय आये
और डुबो दे मुझे
हाँ मैं डूब जाना चाहता हूँ जानां
तुने कब जाना ???
काश !
ये बिजली हम पर गिर जाये
मेरा जीवन रौशन कर जाये
अब भी बाहर कितना शौर कर रही है ये
पर गिरती नहीं मुझ पर जानां
आता नहीं इसको गिर जाना ???
मैं तड़प-तड़प के मर जाऊं
इसने पर ये कब जाना
ये बादल मुझको बुला रहा
प्यार करना सिखा रहा
रात अँधेरी चढ़ बैठी
किस्मत अपने घर बैठी
हमको ये सब जला रहा
मैं मौत को बुला रहा
न वो आये, न वो आये ...
दोनों रूठ कर बैठी ...
मौत ने कहा अलविदा
उसने कहा हम तुम जुदा
मौत ने कहा जीना होगा
उसने कहा जहर पीना होगा
हमने हंस कर पी लिया
मौत आई
और हंसी बहुत
बोली इतनी जल्दी जी लिया ???
क्यूँ ये जहर पी लिया ???
जा तुझे तड़पना बाकी है
अब तड़प 43 साल
मेरी हालत समझे कौन, किसे बताऊँ हाल ???
to be continued
अनिल आर्य
No comments:
Post a Comment