कोई मदहोश हवा सा बहता है
और हम अग्नि से जलते हैं
वो आग बुझाने को तत्पर
हम बुझने पर और सुलगते हैं
जाने क्यों दवा मिली मुझको
जब दुआ से भी न जख्म भरा
उसने तो किया मरहम लेकिन
हो गया हमारा दर्द हरा
आवाज नहीं बन पाए हम
उसने तो हर इक गीत दिया
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................
हम उलझ गए इक उलझन में
और धर्मसंकट ने घेर लिया
जिस हृदय ने हमको अपनाया
मन ने उस से मुह फेर लिया
साहस करके हम बोल उठे
बड़ा कष्ट हुआ पर सीने में
जब मन में इतनी दुविधा हो
क्या मिल जाता हमें जीने में
बेरहम सत्य बोला हमने
और रिश्तों को भय भीत किया
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................
निष्कलंक तुम्हारा है कण कण
अति पावन हृदय सुसज्जित है
तेरे सम्मुख ए मित्र सुनो
हम दागदार अति लज्जित हैं
है अनंत तुम्हारी मर्यादा
और उज्ज्वल है स्वाभिमान तेरा
गरिमा की गरिमा हार गयी
और जीता बस अभिमान मेरा
जिस में हर सरगम का उदगम
क्यों मुझको न संगीत मिला
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................
तेरे साहस को प्रणाम मेरा
इक कटी पतंग को थाम लिया
हर मुश्किल के आने पर भी
कितनी हिम्मत से काम लिया
अपनी पावन नजरों से तुमने
पत्थर को हीरा बना दिया
एहसान है ये तेरा मुझपर
रिश्तों का मतलब सिखा दिया
तेरे जीवन में आ जाने पर
य़ू लगा के ये जग जीत लिया
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................
नतमस्तक हूँ अब जीवन भर
और हाथ बढ़ाये बैठी हूँ
तुझसा कोई मित्र मिले मुझको
ये आस लगाये बैठी हूँ
आनंद में तेरे बोल बसे
तेरी आवाज में आनंद की सूरत है
आवाज उठी है सीने में
गरिमा को तेरी जरुरत है
तू है अपूर्ण बिन आनंद के
आनंद नहीं तेरी प्रीत बिना
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................
इस हृदय में न कोई अभिलाषा
अब चाह नहीं कोई मन में
तेरी आवाज जो गूंजेगी हर सु
जी लेंगे अकेले जीवन में
पाषाण हृदय मांगे तुमसे
बस इतना सा एहसान करो
इस जटिल मित्र को अपनाकर
तुम पत्थर को इंसान करो
दीवानों की इस बस्ती में
क्यू हमें नहीं मनमीत मिला
हम हार गए खुद से लेकिन
इक वैरागी ने मन जीत लिया...................

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