Wednesday, 12 September 2012

पाना-खोना किस्मत,जादू या कुछ और ...

जिन्दगी क्या है  ?

कह दूँ जो माने तू

ग़र कोई पा ले तो कुछ नहीं

और न मिले तो जाने तू ...


जिस से खेला हर कोई

मेरा जीवन वो खिलौना है

और ग़र मिल जाये तो मिटटी से कम

और न मिले तो प्लूटोनियम...


यही तो है जीवन का हाल

क्यों जनाब

क्या है आपका ख्याल  ?


आने को तो कम ही आती है तेरी याद

एक तेरे आने से पहले

एक तेरे जाने के बाद

कभी तो मौसम होता था तेरी यादों का

धरती पे समंदर होता था तेरी यादों का

बहता दरिया थी तेरी याद

दिल मैं जलती थी कोई आग

आजकल हाँ आजकल कम ही आती है तेरी याद

हाँ आज बारिश आई और चली पुरवाई भी

तेरी याद भी आई संग रुसवाई भी

हमें याद आई वो जगहंसाई भी

वो महफ़िल सजनी जिस मैं थी सजनी

और था मेरे जैसा सौदाई भी

न मालूम की वफ़ा कि की बेवफाई भी

ऐसा कम ही होता है जो हुआ उस दिन

कि वो भी हो मेरे साथ और तन्हाई भी

बस आलम कुछ इस कदर है की जिक्र करता हूँ मिलन का

संग खुद आ जाता है जिक्र-ए-जुदाई भी


आर्य तो दीवाना है

क्या जाने

किस राह से बचना है

किस राह पे चलना है

तू तो समझदार है अनिल

पर कहाँ तुझको रुकना है

तेरा तो काम ही चलना है

तू रूका

तो रूक जायेगा जमाना

तुझको तो चलते जाना है

बस चलते जाना

बारिश का बादल तो बस आर्य सा दीवाना है

वो क्या जाने

किस और से चलना है

किस और ठिकाना है

किस और बीहड़ है

किस और जमाना है

किस जगह बरसना है

किस छत को भिगौना है

अरे तू समझ पगले

ये व्यर्थ का रोना है

जिन्दगी बालक का खिलौना है

पा जाये जो किस्मत से

तो भी मिटटी सी कीमत है

हाँ ग़र न मिला तो सोना है

तो मेरी जान ये व्यर्थ का रोना है


दो-दो शक्लें दिखाने वाले आईने

तोड़ दिए हमने

जो चाहते थे छुटकारा

वो पंछी

मुहब्बत के पिंजरे से

छोड दिए हमने

तू कैद न कर

न करने की कौशिश ही कर

उन्मुक्त हो

महसूस कर जहाँ मैं सुकून बहुत है

आसमान बहुत है

अगर कुछ कम है

तो वो तेरा दम है

अपने पंखों को खोल

और आसमान से बोल

की आज तेरा विस्तार नाप लूँ

और कह उस खुदा से

की थोडा बड़ा कर इस जहान को

अब मैं उड़ निकली हूँ

जी करता है ये जहाँ नाप लूँ


फिर तू अकेली नहीं है

नीचे देख

तेरी छाया भी तेरे साथ चली है

की अब मर्जी तेरी

तू उजाले रहेगी

वो पलती चलेगी

तू ऊपर उठेगी वो रोशन रहेगी

तू चलती  चलेगी

वो भी बढती चलेगी

हाँ

तू अन्धकार घिरेगी

तू जिन्दा रहेगी

वो घुट कर मरेगी


और हाँ याद रखना

मैं महफ़िल

मैं तन्हाई

मैं हंसी

मैं रुसवाई

मैं तेरा अक्ष

मैं परछाई हूँ तेरी ...


पाना खोना किस्मत

जादू

या कुछ और ...

जितने शब्द थे

विचार जितने

तुम पे कुर्बान

ये जीवन

जवानी

सब तुझ पे कुर्बान

न बाकि बचा

कुछ और ....




                                                                                        
                                                              अनिल आर्य 

No comments:

Post a Comment