Friday, 27 September 2013

चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों

अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा

साथ चलने का किया इरादा
बदलना होगा
तुम समझ न पाओगी
जज्बात मेरे
काश बदल पाता
सब हालात तेरे
आतप के इन हालातों को
अब बदलना होगा
अपनी - अपनी राह
हमें अब चलना होगा
तुम समझ न पायी
मर्म इस जीवन का
न संभाल सकी
भार इस यौवन का
प्राणी आखिर क्या जाने तमिस्त्रा का
क्या होता है  स्वाद इस सविता का
शायद न समझो अर्थ कभी इस कविता का
और न कर पाओ अंत कभी इस दुविधा का
जिस पल मिले थे
उस हर समृति को अब मुझे बदलना होगा
ठहरना अनिल का काम नहीं
अब मुझे चलना होगा

तेरी न बदल सका माफ़ कर
पर अपनी नियति को बदलना होगा
अंत मैं एक अंतहीन
सच्चाई सुन
तेरा जीवन तेरा है
मंजिल तू खुद ही चुन
एक बात का ध्यान रख
आर्ष वचन का मान रख
जो बोया तूने बबूल
आम कहाँ फिर पायेगा
तेरा किया कर्म हरदम
तेरे आगे आएगा
अनंत कैसे आखिर
अनंत सुख पायेगा
याद रख
जीवन अनंत नहीं
आखिर सबको जलना होगा
मेरी मंजिल दूर बहुत है
अब मुझको चलना होगा
चलो मुसाफिर बन जाएँ फिर हम दोनों
कभी किसी मोड़ पर
दो अनजानों की तरह
फिर मिलना होगा  ….

                 अनिल आर्य  …

No comments:

Post a Comment