Thursday, 1 May 2014

जिंदगी में खुशियाँ-खुशियाँ, संभलती नहीं संभाले...

हर कोई नहीं होता
जो करे बेशुमार मुहब्बत
बर्बादियों कि चाहत
हर किसी को नहीं होती…

बेचैनी हर घड़ी कि
पाले तो कौन पाले
जट्ट को फ़िक्र कहाँ सब
हर आफ़त गले लगा ले…

ज़िस्म रूह से हो जुदा जब
तकलीफ़ तो होती होगी
तुम से जुदाई मेरी
कोई मौत को बुला ले…

तुम फफ़क के रो पड़ोगी
जो मैं गम का बस्ता खोला
हैरानगी है होती
जो मेरी हँसी पे आँख नम हैं....

जिंदगी में खुशियाँ-खुशियाँ
संभलती नहीं संभाले ,
ग़मों कि पड़ी कमी है
हर सितमगर से कह दो
जट्ट को वो आजमा लें…


अनिल आर्य… 

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