Saturday, 10 May 2014

मेरी माँ…

वह 
शान्त, स्नेहमयी 
समय आने पर
मेरी रक्षार्थ  
बन जाये दुर्गा 
लड़ जाए ज़माने से 
भिड़ जाये खुदा से 
बिन किए अपनी परवाह 
मेरी माँ… 

वह 
जो मेरे जीवन 
का आधार 
मुझको करती 
असीमित प्यार 
मेरे इर्द-गिर्द घूमता 
है जिसका सारा संसार 
सब से ज्यादा 
करती है मेरी परवाह 
मेरी माँ...



वह 
हजारों 
जन्म लेकर भी 
जिससे उऋण 
न हो पाऊँ 
हो जाता हूँ 
गदगद 
जब उसका 
अंश कहाऊँ 
करती जग में 
सबसे ज्यादा 
है मेरी परवाह 
मेरी माँ… 

वह 
जिसके प्राण पीकर 
मैंने पाया ये रूप 
जिसकी आँखों से 
देखा जग का स्वरूप 
जिसकी शिक्षा से 
सभ्यता मैने पाई 
जिसके सानिध्य में 
जीने की कला आई 
आज भी मुझे 
छोटा जानकर 
करती बड़ी परवाह 
मेरी माँ…

        अनिल आर्य… 

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