कर्मयोगी को
परवाह
भला क्या
कर्म प्रवाह में बहा चले,
चाहे ढह जाये
मिट्टी सा
या खंडहर सा
निःशेष रहा चले,
पाषाण हृदय
जर्जर शरीर संग
अनथक
धूप के माँह चले,
न चंचलता
हृदय की
न फल कि चिंता
कातर चितवन
यहाँ कहाँ चले,
जो हो
निरा ज्ञानी
नहीं
उसकी सानी
हरदम तलाश वो
छाँह चले,
मैं अज्ञानी
जीवन पानी
अनजाने अनंत कि
गहराइयों के
माँह चले...
अनिल आर्य...
परवाह
भला क्या
कर्म प्रवाह में बहा चले,
चाहे ढह जाये
मिट्टी सा
या खंडहर सा
निःशेष रहा चले,
पाषाण हृदय
जर्जर शरीर संग
अनथक
धूप के माँह चले,
न चंचलता
हृदय की
न फल कि चिंता
कातर चितवन
यहाँ कहाँ चले,
जो हो
निरा ज्ञानी
नहीं
उसकी सानी
हरदम तलाश वो
छाँह चले,
मैं अज्ञानी
जीवन पानी
अनजाने अनंत कि
गहराइयों के
माँह चले...
अनिल आर्य...

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