मेरे त्रिलोक
अनायरा अनंत आकाश,
नील विस्तार, उम्मीद की आस—
उसकी दृष्टि में दूर क्षितिज,
जहाँ स्वप्न लेते प्रथम श्वास।
पावनी पानी पाताल,
ज्यों गंगा-जल, शीतल, विशाल—
हर स्पर्श में करुणा बहती,
हर बूँद मिटाए मन का ज्वाल।
रणविजय — शिव रण-भूमि धरा,
कैलाश-सा स्थिर, पर्वत-सा गहरा—
जहाँ संघर्ष भी साधना बने,
और मौन में छुपा हो विजयी पहरा।
मेरा त्रिलोक,
वह धरा भी है, शिखर भी,
आकाश भी है, पाताल भी,
और वह मौन भी,
वाचाल भी।
वह शरारती भी है गंभीर भी,
मन चंचल भी, धरे धीर भी
वह रण भी है, संन्यास भी—
जहाँ पग-पग कर्म की अग्नि जले,
और मन में बसे विश्वास भी।
आशीष हो यह—
आकाश इन्हें दिशा दे सदा,
जल जीवन को निर्मल रखे,
धरती धैर्य और बल दे,
और शिव-तत्त्व सत्य-पथ पर
इनके चरण सदा स्थिर रखे।
मंगल हो। शुभ हो। कल्याण हो।
अनिल आर्य...
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