Monday, 29 December 2025

समय की तीन आवाजें

समय की तीन आवाज़ें
(तीन वक्ताओं का मंच-पाठ)


अनायरा  (उत्साह व गति – आधुनिक स्वर):

बारह बजे!
घड़ी बोली—
नया साल आया!
धूम- धड़ाका,
शहर जागा—
रोशनी नाची,
दुनिया कहे—
आगे बढ़ो! तेज़ बढ़ो!


पावनी (शांत, गम्भीर – परंपरागत स्वर):

सुना मैंने भी यह शोर,
पर चैत्र की हवा
कुछ कहती है और —
धीरे चलो…
जड़ें देखो…
धरती को समझो,
धड़कन को जानो,
परायों को छोडो,
अपनों को पहचानो।


रणविजय (स्थिर, दृढ़ – विवेक की आवाज़):

रुको!
यह लड़ाई सालों की नहीं,
यह टकराव है,
पर—
समय का नहीं,
समझ का,
स्वर दो
भाव को,
भर दो इस,
घाव को।


अनायरा:
दुनिया रुकती नहीं!
कैलेंडर बदलता है,
योजनाएँ बनती हैं—
यही प्रगति है,
खुशहाली है।

पावनी:
पर बिना ऋतु के ज्ञान,
बिना स्मृति के,
प्रगति भी
खोखली हो जाती है,
लय नहीं पाती है।

रणविजय:
एक हाथ में
ग्रेगोरियन की घड़ी हो,
दूसरे में
भारतीय नववर्ष की मिट्टी,
यही संतुलन है!
यही सामंजस्य भी,
और है, स्थायित्व यही।

अनायरा (थोड़ा ठहरकर):
तो नया साल मनाना गलत नहीं?

पावनी:
नहीं—
उत्सव तो जीवन है।

रणविजय:
गलत है
बस अंधानुकरण।

अनायरा:
जनवरी सिखाती है—
दुनिया से जुड़ना!

पावनी:
चैत्र सिखाता है—
प्रकृति से जुड़ना!

रणविजय:
और विवेक सिखाता है—
दोनों को साथ रखना!
मिलकर चलना,
छोड़ो,
आँखे मलना,
जानो,
यही तो है छलना।

तीनों (एक साथ, ऊँचे स्वर में):
न तो यह छोड़ो,
न उसे नकारो!
इसको भी मानो—
उसको भी जानो!
सच पहचानो

अनायरा:
घड़ी बदले—

पावनी:
ऋतु बदले—

रणविजय:
पर चेतना भी बदले!

तीनों (समापन, दृढ़ स्वर में):
तभी हर नववर्ष
तारीख़ नहीं—
संस्कार बनेगा,
संवेदना बनेगा,
सभ्यता बनेगा!
हर मन जगेगा,
तब—
और 
केवल तब—
नव-वर्ष सजेगा।

अनिल आर्य...

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