“अपनी जड़ों की पुकार”
दीप जलते थे आँगन–आँगन,
पर आज झिलमिल लाइटें आईं—
तारों से ज्यादा चमक रही हैं
पर-छाया, मन पे छाई ।
तीज की हरियाली फीकी,
सावन सूना–सा लगता,
मोबाइल की चमक में खोकर
लोकगीत अब कौन सुनता?
केक काटे, टोपी पहनी,
खुशियाँ उधार सी आईं—
अपनों के पर्व बेमोल हुए,
यह कैसी आँधी छाई?
कारण सरल, पर गहरे हैं—
आकर्षण, बाज़ार, दिखावा,
पश्चिम की चकाचौंध में
अपना सच लगता भटकावा।
मीडिया ने रंग बदले हैं,
विज्ञापन बने संस्कार,
जो बिकता है वही सुहाए,
मूल्य हुए व्यापार।
पर प्रभाव भी चुप नहीं रहते—
रिश्ते धीरे-धीरे छूट रहे,
संस्कृति के दीप बुझ–बुझकर
आत्मा तक टूट रहे।
पर्व नहीं थे केवल उत्सव,
जीवन–बोध सिखाते थे,
माटी, नारी, ऋतु, प्रकृति—
संतुलन समझाते थे।
अंधानुकरण की इस दौड़ में
पहचान धुँधली होती जाए,
जो अपनी जड़ों से कट जाए
वह वृक्ष कहाँ फल पाए?
न विरोध विदेशी खुशियों से,
न नफरत का कोई भाव—
बस इतना हो स्मरण हमें
संभाल रखो अपना स्वभाव।
सीखो जग से, खुला मन रखो,
पर मत छोड़ो अपना घर,
तीज, दीप, होली, सावन—
यही हमारी असली धरोहर।
आओ फिर से पर्व सजाएँ
पर माटी की खुशबू के साथ,
भारत-भविष्य सुरक्षित होगा,
न छूटेगा अपनों का हाथ।
अनिल आर्य...
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