Tuesday, 11 September 2012

वाद -प्रतिवाद


कभी साया है कभी धूप मुक्कदर मेरा,
                     होता रहता है यूँ ही कर्ज बराबर मेरा,
टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझ मैं,
                     डूब जाता है कभी मुझमे समंदर मेरा......

आ तुझे छावं दूंगा
रहने के लिए नया गाँव दूंगा 

कर्ज न लेने की नौबत आए वो घर दूंगा
तेरा घर खुशियों से भर दूंगा

तेरे किनारे न टूट पाएंगे कभी
तुझे वो साहिल दूंगा

जो न मिली किसी को
वो मंजिल दूंगा

न पड़ेगी खुद में डूबने की जरुरत
न तुझे मैं एकांत दूंगा

तैर जाना जगह डूबने की तुझे
मैं सागर प्रशांत दूंगा........



बावफा था तो मुझे पूछने वाले भी न थे,
                    बेवफा हूँ तो हुआ नाम घर-घर मेरा...

जब तू था बावफा तो बेवफा कोई और
और जब तू बेवफा तो बावफा कोई और

पर ये कोई और है कुछ चीज गजब
कितना भी गम दे कहेगा ये दिल मांगे मोर

यहाँ की बेवफाई में शोहरत
वहां की वफ़ा कुछ चीज और

कर सितम दिखा बाजुओं का दम
इस दिल से नहीं निकल पाएगा लगा ले कितना जोर

हाँ न बन पाऊं तेरा
तू मेरी ये बात और......

किसी सेहरा मैं बिछुड़ गए हैं सब यार मेरे,
                     किसी जंगल मैं भटक गया है दिलदार मेरा...

तेरा यार बनूँ भटका फिरूं
कि किस जंगल मिले वो दिलदार तेरा

खुद खो जाऊं परवाह नहीं
पर वादा ए यार के ढूँढ लाऊंगा प्यार तेरा......


कितने हँसते हुए मौसम अभी आते लेकिन,
                      एक ही धूप ने कुम्हला दिया मंजर मेरा...

दरख़्त बन बगिया रहूँ
धुप तुझे न छू पाए

पतझड़ में भी झडू नहीं
चाहे धुप मुझे कितना तडपाए

मैं ठूँठ बनकर ही खड़ा रहूँ
शर्त ये है कि तू मुस्काए

जाड़ो में तुझे मद्धम धूप मिले
तना हँसता हँसता कट जाए......

बस एक बूँद गैरत की है अब मुझमें बाकी,
                      अब जो छलका तो छलक जायेगा सागर मेरा...

है वो बाजीगरी मुझमें कि 
एक बूँद को समंदर कर दूँ

जँगल हो जाए साफ़ और तुझे मिले जो वो,
एक पल में ऐसा मंजर कर दूँ

और तू खुद को कम न आँक
तेरा करम बरसे तो बंजर को उपजाऊ

और जो नजर हट जाए तो
मैं उपजाऊ को बंजर कर दूँ......


                                        आर्य ' एक दीवाना '
                     
             

1 comment:

  1. kisi khaas ki likhi RED lines ka ans diya hai maine apni GREEN lines main...

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