Sunday, 1 June 2014

मैं एक आईना

मेरे जज्बात मेरी रूह मैं उतर जाते हैँ
और मैं जमाने की हक़ीकत बँया करता हूँ
मुझे केवल " मैं " न समझो
मैं एक आईना हूँ
झांकता ज़माना मुझमें
सूरत नहीं
बस सीरत दिखाने को
आमादा है तबीयत मेरी...
मुझे खुद से मुहब्बत है
दीवानगी की हद तक
है खुदा से गुज़ारिश
मेरे मैं मे
मुझे भी पनाह दे...

अनिल आर्य...

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