ज्योत्स्ना सी झिलमिलाती यह अमावस की रात,
अंधकार से जूझता हर दीपक बन जाता प्रभात।
घृत-बाती की लौ में जब श्रद्धा का संगम होता,
मानव मन का हर कोना तब उजियारा होता।
मिटा तमस, जग में फैले शुभ्र ज्योति का सन्देश,
हर हृदय में जग उठे सत्ता, प्रेम, धर्म, उपदेश।
राम लौटे जब अयोध्या, आनन्द उमड़ पड़ा था,
धरती ने दीप सजाए, नभ ने मंगल गा था।
तब से हर वर्ष मनाता भारत यह पर्व महान,
संकल्प, श्रद्धा, स्वच्छता, स्नेह जहाँ के प्राण।
लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती की पूजन में रमता भाव,
कर्म, विद्या, समृद्धि से सजता जीवन गाँव-गाँव।
कण-कण में संस्कृति झलके, दीपों की यह पंक्ति,
संघटन का सन्देश लिए जलती है अविराम शक्ति।
हर जन के जीवन में फैले सुख-शान्ति का उजियार,
हो प्रेम, दया, करुणा का जग में सदा विस्तार।
जन-जन का मंगल गान गूँजे नभ के पार,
हर हृदय बने मंदिर-सा, हर घर हो उत्सार।
हर आत्मा में दीप जले सद्गुण की ज्योति महान,
सर्वमंगलाय शुभं भवतु — यही भारत की पहचान।
🌼 शुभकामना-पहरा : 🌼
हे पाठक! तेरे जीवन में दीपक-सा उजास रहे,
हर दिन तेरा त्यौहार बने, हर क्षण विश्वास रहे।
सफलता तेरे संग चले, समृद्धि तेरे द्वार सजे,
स्नेह-सुगन्धि बिखेरता, तेरा जीवन दीप जले।
॥ शुभ दीपावली, सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥
अनिल आर्य
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