🌿 गोवर्धन-गौरव गान 🌿
ब्रजभूमि की वह पावन वेला, हरित धरा मुस्काय,
इन्द्र-दर्प दलन हेतु स्वयं, नन्दलाल सुत आय।
कर-कमलों पर गोवर्धन धारण, शैल-शिखर सिरताज,
बालक रूप में ब्रह्म प्रकटे, मानवता का राज॥
वृषभानु-सुता हर्ष भरे, गोकुल गावे गीत,
गोप-गोपिका संग आनंदित, प्रकृति प्रकटे प्रतीत।
वृष्टि-विलय का यह उत्सव, श्रद्धा का आधार,
इन्द्रजाल पर विजय प्रतीक, सन्मार्ग का प्रचार॥
अन्नकूट से भरे पात्र सब, कृतज्ञता का भाव,
अन्नपूर्णा-कृपा से पोषित, जीवन पावे प्रभाव।
धरित्री के प्रति आभार का, यह शुद्ध प्रतीक महान,
हर अन्नकण में ईश्वर दीखे, हर अर्पण में सम्मान॥
प्रकृति-प्रेम का गान यही, हर हृदय में ध्वनित हो,
धर्म, दया और करुणा का, दीप सदैव प्रज्वलित हो।
इस भाव-पर्व के स्वर में गूँजे, आर्य-वाणी अपरिहार्य —
"गोवर्धन है जीवन-उत्थान", कहे कवि अनिल आर्य॥
गोवर्धन-पूजा के अंतर में, छिपा यही संदेश —
मानव-सेवा, प्रकृति-रक्षण, धर्म न तजना देश।
अहम्-त्याग कर प्रेम-पथिक बन, धर सजग मन ध्यान,
‘गोवर्धन’ है उत्थान प्रतीक, श्रद्धा का अभिनन्दन गान॥
अनिल आर्य...
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