(कवि – अनिल आर्य)
उषा की लालिमा फूटे, अरुण किरण मुस्काय,
नदिया के जल में झुकती, आस्था सिर झुकाय।
साँझ-सवेरे घाट सजे हैं, गीत गगन तक जाएँ,
छठ मइया की महिमा गाए, सुर भरे सिरमौर गाएँ॥
करवों में अर्घ्य सजे हैं, सिंधूरित हर माँग,
सूरजदेव के स्वागत में, गूँजे मंगल राग।
सात दिनों का संयम जैसे, तप बन जाए प्राण,
हर अर्घ्य में कृतज्ञ हृदय का, झलके सौर सम्मान॥
काँस के पत्ते, गन्ने की छाँव, टोकरी में फल,
धरती, जल, अंबर, अग्नि, वायु — सबमें छिपा संबल।
माटी की गंध, लोक की बोली, स्नेह की सौगात,
छठ है जीवन का उत्सव, श्रद्धा का परिपाठ॥
भोर की बेला आए जब, उगे अरुण-प्रभु लाल,
नारी हाथ जोड़े कहती — “रखियो कुल सँभाल।”
मन में होती मौन प्रार्थना, नयनों में प्रकाश,
सूर्यदेव दें शक्ति-संतति, सुख-समृद्धि-विलास॥
कहे अनिल आर्य सुनो जगत ये, सत्य सनातन वाक्,
आस्था की थाती है यह, श्रम का यही पराक्।
छठ न केवल पर्व भक्ति का — जीवन का उत्साह,
जहाँ श्रम में तप, तप में प्रेम, प्रेम बने इतिहास॥
अनिल आर्य...
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