Wednesday, 2 October 2013

दूर रहो

कुछ चीजें 
बस देखने तक ही सही हैं 
जी चाहे छूने को 
पर छूने की नहीं हैं… 

इन का काटा 
नहीं मांगता पानी 
हालत हो जाती है खस्ता
   याद आ जाती है नानी … 

ये खूबसूरत मौत के फरिस्ते हैं 
जिनको पाने को हम तरसते हैं 
मौत होती है तब जिन्दगी से प्यारी 
यानि राहू-केतु होते हैं भारी ,
बात मानो रहो इनसे दूर 
वरना मरोगे बेक़सूर … 


                 अनिल आर्य  …. 


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