मैंने दिल की सुनी उसने दिमाग की
वरना मैं उनको दिल क्यों देता ?
काश हमें भी खुदा उनकी तरह
दिमाग एक
दिल सौ देता
वो तो समय रहते टूटा सपना हमारा
वरना हकीकत समझ के मैं रो देता
वो हकीकत से दूर हैं
इसलिए सपनों मैं आते हैं
खुद महमाँ हैं
और हमें महमाँ बतलाते हैं
वो आईना नहीं देखते
आईने से कतराते हैं
कहीं दिखला न दे सच्चाई
घबराते हैं
खुद से अकेले में मिलने पर
डर जाते हैं
अपने नकाबपोश चेहरों मैं से
असली भूल जाते हैं…
यही आज के समाज का दस्तूर है
के वो सच्चाई से कोसों दूर है
जो सब को पसंद वो आततायी क्रूर है
ओर जो नापसंद वो बेकसूर है….
अनिल आर्य
वरना मैं उनको दिल क्यों देता ?
काश हमें भी खुदा उनकी तरह
दिमाग एक
दिल सौ देता
वो तो समय रहते टूटा सपना हमारा
वरना हकीकत समझ के मैं रो देता
वो हकीकत से दूर हैं
इसलिए सपनों मैं आते हैं
खुद महमाँ हैं
और हमें महमाँ बतलाते हैं
वो आईना नहीं देखते
आईने से कतराते हैं
कहीं दिखला न दे सच्चाई
घबराते हैं
खुद से अकेले में मिलने पर
डर जाते हैं
अपने नकाबपोश चेहरों मैं से
असली भूल जाते हैं…
यही आज के समाज का दस्तूर है
के वो सच्चाई से कोसों दूर है
जो सब को पसंद वो आततायी क्रूर है
ओर जो नापसंद वो बेकसूर है….
अनिल आर्य

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