इस कविता में मैं माध्यम मात्र हूँ ,
क्योंकि ये किसी ख़ास वाकये पर किसी व्यक्ति विशेष
पर एक अपरिचित मित्र द्वारा पढ़ा गया कसीदा है, ध्यान चाहूँगा …
उस आदमजाद ने
तेरे कद से
तेरी सख्शियत लगा दी,
जो तेरी सख्शियत से
तेरा कद लगाती
तो इस भरी महफ़िल मैं
बस तू ही
आदमकद होता…
साभार:- एक अपरिचित मित्र
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