Saturday, 1 February 2014

मैं सत्य बुनता हूँ…

गहरी सर्द काली रातों में
सब सोते हैं,
मैं जगता हूँ,
मैं सत्य बुनता हूँ…

अचिन्त्य नश्वर प्राणमय
जगत् में
मैं निगूढ़ प्रगाढ़
शाश्वत सत्य चुनता हूँ,
मैं सत्य बुनता हूँ…

अपनी चिन्ता में निमग्न
सत्य-विरत
जगत् रोता है
मैं हंसी चुनता हूँ,
नित्य नया सत्य बुनता हूँ....

     अनिल आर्य … 

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