एहसासों की क़ीमत
जिस्म से चट्टान
कलेजे से जल्लाद हुआ
रूह से शैतान हो जाऊँ
तो माफ़ करना,
हूँ ज़ख्म खाकर
मुस्कुराता
किसी दर्द से न
सिहरता
शायद
मेरी इन्सानियत
दम तोड़ने पर
तुली है,
एहसासों ने मिलकर
है इतना झँझोड़ा
कि एहसासों की क़ीमत
आज़ कुछ ना
बची है…
अनिल आर्य…
No comments:
Post a Comment