Tuesday, 10 June 2014

एहसासों की क़ीमत

जिस्म से चट्टान
कलेजे से जल्लाद हुआ
रूह से शैतान हो जाऊँ
तो माफ़ करना,
हूँ ज़ख्म खाकर
मुस्कुराता
किसी दर्द से न
सिहरता
शायद
मेरी इन्सानियत
दम तोड़ने पर
तुली है,
एहसासों ने मिलकर
है इतना झँझोड़ा
कि एहसासों की क़ीमत
आज़ कुछ ना
बची है…


अनिल आर्य… 

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