हर रोज़
आ ही पहुँचता है
मेरे दर पर
ग़म
किसी न
किसी बहाने से
लाख़ बदलूँ
मकाँ /
पता
मुक़द्दर
मग़र माथे
सजा है
ढूँढ ही लेता है
मुझे
भरी भीड़ में
एक
ग़म ही तो है
जो
तन्हाई मेँ
साथी बचा है
अनिल आर्य…
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