Monday, 9 June 2014

दर्द भरी मुस्कान

मुझे तोड़ा तो बहुत है
मेरे अपनों ने
मेरा बेशर्म सा वजूद
पर
बिखरता नहीं है ,
मैं रुकता
ठहरता
सम्भालता हूँ ख़ुदको,
फिर अपना कोई
बना देता
पराया ,
बाहर वालों की
हिम्मत
जो जट्ट से
टकरा लें ,
वो तो रिश्ते
अंदरूनी
जो तड़पा के
न मारें,
ये मुस्कुराहट लबों की
मैं हटने न दूँगा
चाहे मेरे अपने
कहर बरपा लें...

अनिल आर्य...

No comments:

Post a Comment